ब्लैकबोर्ड- रंग-रूप पर तंज से साइको किलर बनी महिला:पहले चार सुंदर बच्चों को मारा, फिर अपना बच्चा भी मार दिया

📅 Published: December 11, 2025 | 📂 Category: India National

‘जिस टब में मेरी बेटी विधि की जान गई, वह टब आमतौर पर खाली रहता था। पूनम ने मेरी बच्ची को बहलाकर टब में पानी भरवाया, फिर टब खींचकर अंदर ले गई। जैसे ही मौका मिला, पूनम ने कसकर मेरी बेटी की गर्दन दबोची और पानी में डुबो दिया। छटपटाते हुए मेरी बच्ची की जान चली गई। टब के पानी में वो कुरकुरे तैर रहे थे,जो मेरी बच्ची खा रही थी।’, ये कहते हुए 6 साल की विधि के पापा संदीप रो पड़े। ब्लैकबोर्ड में इस बार उस महिला की स्याह कहानी, जिसके रंग-रूप पर तंज ने उसे भीतर से इतना तोड़ा कि वो साइको किलर बन गई और बच्चों को मारने लगी। सोनीपत में संदीप के घर के बाहर सन्नाटा फैला हुआ है। 1 दिसंबर को इस घर में 6 साल की बच्ची की मौत हुई है। घर के अंदर पहुंचने पर एक अजीब सी खामोशी महसूस हुई। यहां मेरी मुलाकात सबसे पहले संदीप से हुई। आंखों में आंसू लिए संदीप कहते हैं कि पूनम मेरी चचेरी बहन है, उसने मेरी बच्ची को मार दिया, वो साइको किलर है। 1 दिसंबर को संदीप बारात में जाने के लिए तैयार हो रहे थे। विधि उनके पास खेल रही थी। वह बताते हैं, ‘सोचा साथ ले जाऊं… फिर जाने क्यों कह दिया कि घर पर मम्मी के साथ खेलो। कुछ ही दूर पहुंचे थे कि फोन आया- विधि गायब है। ‘मैं भागते हुए घर पहुंचा, एक-एक कमरा देखा, कहीं नहीं मिली। उसकी मां का दिल बैठ गया; आखिर में हम उस कमरे में गए जहां बच्चे कभी जाते ही नहीं थे। वहां पानी भरे टब में मेरी बेटी की लाश पड़ी थी।’ संदीप बहुत धीमे, लेकिन साफ शब्दों में कहते हैं, ‘वह साइको नहीं… बहुत होशियार है। विधि को मारने से पहले चूड़ियां उतार दीं, ताकि फिंगरप्रिंट न आएं। गला दबाने के लिए उसकी जर्सी का इस्तेमाल किया। नीचे आई तो कपड़े गीले थे- यहीं गलती कर गई। किसी को बोली बच्चे ने उल्टी कर दी, किसी से कहा दूध गिर गया, किसी से कहा पीरियड्स… हर किसी के सामने अलग कहानी। यही बदलते बयान इसे ले डूबे।’ वह फुसफुसाते हैं, ‘इसे बर्दाश्त नहीं था कि कोई बच्ची बड़ी होकर उससे ज्यादा सुंदर बने… इसलिए एक-एक कर खत्म कर दिया। खुद को बचाने के लिए वह अजीब नाटक करती रही- कभी अलमारी में आग, कभी सूट फाड़ना, कभी पंखे से लटकने का ढोंग। घर में कैमरा लगते ही सब रुक गया, तब समझ आया कि साया नहीं, उसका छल था।’ खुद को संभालते हुए संदीप बताते हैं, ‘ये पहली बार नहीं था… 2021 में पूनम ने मेरी बच्ची पर गर्म चाय उड़ेली थी। साफ दिख रहा था कि जान-बूझकर किया।’ ‘उसने अपने बेटे को भी मार दिया था, ताकि किसी को उस पर शक न हो। 2023 में मेरी भांजी की लाश भी उसी हौद में मिली थी, जिसमें पूनम का अपना बेटा भी डूब गया था। हमने सोचा बच्चे खेलते-खेलते गिर गए होंगे… उसका बेटा भी मरा था, इसलिए किसी को शक नहीं हुआ’। संदीप से मिलने के बाद मैं पूनम के मायके पानीपत पहुंची। उस घर के दरवाजे पर कदम रखते ही एक ऐसी खामोशी महसूस होती है, जैसे दीवारें भी किसी अनकहे डर से सिमट गई हों। भीतर उनके ताई के बेटे सुरेंद्र बैठे थे- चेहरे पर थकान, आंखों में गुस्सा और आवाज में दर्द। सुरेंद्र धीमी आवाज में कहते हैं, ‘पूनम… बचपन से सुनती आई थी कि वो अपने भाई-बहनों से कम सुंदर है। शादी के बाद लोग कहते- जेठानी उससे कई गुना सुंदर है। जब बच्चे हुए तो उनकी भी तुलना… कौन गोरा, कौन सांवला। वो कुछ नहीं बोलती थी, पर हर तंज उसकी रग-रग में उतर जाता था।’’ यह बातचीत चल ही रही थी कि उनकी पत्नी पारुल भी आकर बैठ गईं। उन्होंने गहरी सांस ली, जैसे किसी भारी सच को फिर से उठाने वाली हों। पारुल कहती हैं, ‘उसके मन में तो शुरू से ही सुंदरता का डर बैठा था- कौन अच्छा दिखता है, कौन नहीं। घर में लोग उसकी दूसरे से तुलना करते थे… गोरे, सांवले की बात उसके दिमाग में घर कर गई थी। शादी के बाद जेठानी की सुंदरता उसकी आंखों में जैसे कील बनकर ठोक दी गई थी।’ पारुल का गला भर आया- ‘वो दुबली थी… लोग कहते, इस पर कपड़ा नहीं जंचता। शरीर ठीक नहीं है। ऐसी बातें इंसान को बाहर से नहीं, भीतर से घुन की तरह खा जाती हैं। शायद उसके मन में डर था कि कहीं उसके बच्चे का भी वैसा ही न मजाक बने।’ सुरेंद्र ने थके हुए चेहरे पर हाथ फेरा, जैसे किसी ऐसे रिश्ते को याद कर रहे हों, जो अब सच के बोझ से टूट चुका है। वह कहते हैं, ‘पूनम… हमारे ही खून की थी,’ उन्होंने धीमे स्वर में कहा। ‘मेरे पिताजी और उसके पिताजी सगे भाई… हमारी मांएं सगी बहनें। दोहरी रिश्तेदारी- पूनम मेरी चाची की बेटी भी थी और मौसी की भी। घर की ही बच्ची।’ वो कुछ पल चुप रहे, फिर बोले- ‘पर बचपन से उसमें एक अजीब-सा गुस्सा था… ऐसा जो बोलता नहीं था, सिर्फ भीतर-भीतर घुटता रहता था। पढ़ी-लिखी थी- एमए, बीएड। दिखने में शांत, समझदार। समाज में उठती-बैठती थी, लेकिन अंदर एक खामोशी थी… ऐसी खामोशी जिसमें कुछ दबा रहता है।’ सुरेंद्र बताते हैं, ‘पूनम ने कभी किसी से बदजबानी नहीं की, मगर अगर किसी से नाराजगी हो गई, तो उससे हमेशा के लिए बात करना बंद कर देती थी। उसकी यही आदत थी- ‘जैसे लोगों को अपने मन से काट देना ही उसका सबसे बड़ा हथियार हो।’ सुरेंद्र उस मनहूस रात को याद करते हैं, जिस दिन पूनम ने उनके भाई दीपक की बेटी जिया को मारा। वह बताते हैं- रात करीब साढ़े 3 बजे उनकी पत्नी ने देखा था, पूनम पशुओं के बाड़े की तरफ गई और कुछ देर बाद वापस लौटी। पूनम उन दिनों मायके में ही थी; ससुराल में किसी बात को लेकर मामूली कलह हुई थी और वह पिछले चार-पांच महीनों से यहीं थी। उसने उस दिन कहा था- ‘जिया ने उसे अपने साथ सोने को बुलाया है।’ लेकिन घर में किसी को नहीं पता था कि जिया ने सच में बुलाया था या वह खुद चली गई। जिया, दीपक की नौ साल की बेटी- चंचल, गोरी-सुंदर लड़की घर की धड़कन थी। उसी शाम उसने अपने कमरे में नई अलमारी रखवाई थी और देर रात तक कपड़े जमाने में मग्न थी। सुबह जिया की मां उसे जगाने गई तो बिस्तर खाली मिला। कमरे में सिर्फ पूनम और उसका बेटा सो रहे थे। जिया न कमरे में थी, न घर में, जबकि दरवाजा अंदर से बंद था। सबने सोचा शायद वह छत पर होगी- पर वहां भी नहीं। तभी दीपक की नजर छत के नीचे बने पशु-हौद पर पड़ी- पानी की सतह पर जिया का कपड़ा तैर रहा था। पास जाकर देखा- हौद के अंदर जिया का शव पड़ा था। सुरेंद्र कहते हैं- वे उस रात नौकरी पर नाइट शिफ्ट में थे। खबर मिलते ही घर दौड़े। तभी उनकी पत्नी ने उन्हें अलग ले जाकर बताया- रात में उसने पूनम को उसी हौद की तरफ जाते देखा था। उसके हाथ में कुछ था, पर अंधेरा इतना घना था कि पहचान न सकी। सुरेंद्र बताते हैं कि जैसे ही उन्हें यह सब पता चला, उनका शक सीधे पूनम पर गया। उनके मन में 2023 की वह भयावह याद भी कौंधी, जब पूनम का बेटा और उसकी ननद की बेटी पानी की टंकी में गिरकर मारे गए थे। सुरेंद्र कहते हैं- उन्हें तब भी लगा था कि पूनम किसी तांत्रिक या अंधविश्वास के जाल में फंस गई है; ‘मुक्ति-कर्म-पाप’ जैसे शब्द बोलती थी। तीनों मौतें एकादशी के दिन हुईं, और हर बार बच्चे पानी में डुबोए गए- उन्हें यह कभी संयोग नहीं लगा। सुरेंद्र साफ कहते हैं- लोग पूनम को ‘साइको’ कह रहे हैं, लेकिन वह पागल नहीं थी। ‘जिस औरत ने शक हटाने के लिए अपने बेटे को पहले मारने का फैसला कर लिया हो, वह पागल नहीं- ठंडे दिमाग से चाल चलने वाली है।’ वे हौद के पास खड़े होकर बताते हैं- पत्नी की बात पर किसी ने यकीन नहीं किया। सबने कहा, ‘लड़की नींद में गिर गई होगी।’ सुरेंद्र यहीं रुकते हैं। आवाज भारी हो जाती है। फिर धीमे से कहते हैं- ‘जब उसने खुद कबूल किया कि जिया को उसी ने मारा है, तभी सबको यकीन हुआ कि हम झूठ नहीं बोल रहे थे। पुलिस जब उसे लेकर आई, उसके चेहरे पर न डर था, न पछतावा। वह ऐसे खड़ी थी- जैसे कुछ हुआ ही न हो।’ सुरेंद्र की पत्नी पारुल भी वही बात दोहराती हैं। वह हौद की तरफ उंगली उठाती हैं- ‘पूनम इसी रास्ते से गई थी… हमारी गुड़िया वहीं मिली थी।’ कहते-कहते उनकी आवाज कांपने लगती है। ‘मुझे उसी रात समझ आ गया था कि यह काम उसी ने किया है, पर मेरी बात मानने वाला कोई नहीं था। सबको लगा कि बच्ची नींद में गिर गई होगी। हम तो रात में कई बार पशुओं को देखने जाते हैं, इसलिए जब मैंने उसे जाते देखा, मैंने भी सोचा होगा किसी काम से गई है।’ पारुल गहरी सांस लेकर रुकती हैं, ‘अगर उस रात किसी ने मेरी बात सुन ली होती, तो शायद कहानी यहीं खत्म हो जाती, लेकिन नहीं- वो तो कई बच्चों की जिंदगी लेकर ही रुकी। और आज भी उसके चेहरे पर एक पल को भी पछतावा नहीं।’ वे कहती हैं कि पूरे परिवार को अब साफ दिखता है कि पूनम अपने दुख, जलन, तुलना और अंधविश्वास के बोझ में धीरे-धीरे इतनी डूबती चली गई कि एक दिन इंसानियत की आखिरी रेखा भी पार कर गई। वहीं, जिया की मां प्रिया उस अलमारी की तरफ इशारा करती हैं- वही, जिसकी शेल्फों में जिया ने उस रात बड़े चाव से अपने कपड़े सजाए थे। प्रिया की उंगलियां अलमारी के हैंडल पर रुक जाती हैं। ‘यही अलमारी वह खुद के लिए लेकर आई थी… कपड़े जमाते-जमाते ही पूनम के पास सोने चली गई थी,’ उनकी आवाज टूटती है। वह बताती हैं कि पूनम जिया की सुंदरता की शिकायत भी प्यार की तरह करती थी- कहती थी कि जैसे-जैसे बड़ी हो रही है और भी खूबसूरत होती जा रही है…’ प्रिया बातचीत करते हुए जिया के कमरे में ले जाती हैं। बिस्तर की तरफ उंगली उठाते हुए धीरे से कहती हैं- ‘यहीं वह पूनम के साथ सोई थी उस रात।’ यह कहते ही उनकी आंखें छलक आती हैं। वह आगे कहती हैं- ‘बेटी की मौत के बाद भी पूनम ऐसे आती-जाती रही जैसे कुछ हुआ ही न हो। हमसे हंसकर बात करती, हमारे बीच बैठती… हमें कभी नहीं लगा कि उसी ने हमारी बच्ची का सब कुछ छीन लिया है।’ वे खिड़की की तरफ देखती हैं, जैसे जिया की परछाईं वहीं कहीं हो। ‘मेरी बेटी तो शाम के बाद अंधेरे में बाहर कदम भी नहीं रखती थी। बाथरूम तक मुझे साथ ले जाती थी। मैं समझ नहीं पाई…पूनम के मन में यह भाव बचपन से बैठा था कि वह सुंदर नहीं है- और शायद वही हीनता धीरे-धीरे उसके भीतर सुंदर बच्चों के खिलाफ जहर बनकर जमती चली गई।’ पूनम की मां दरवाजे की चौखट पकड़कर खड़ी थीं। धीमे से बोलीं, ‘शादी से पहले मेरी बच्ची बिल्कुल ठीक थी… कभी किसी ने उसकी शिकायत नहीं की। हमारे घर में तो वह हंसती-बोलती, सबकी चहेती थी।’ उनकी आंखें फर्श पर टिक जाती हैं, आवाज और भारी हो जाती है- ‘जो कुछ भी हुआ… शादी के बाद हुआ। हमें तो अंदाजा भी नहीं था कि उसके मन में कौन-सा तूफान पल रहा है, कौन-सी आग उसे भीतर से खा रही है। वह कभी कुछ बोली ही नहीं… और हम समझते रहे कि सब ठीक है।’ मां के होंठ सख्त हो जाते हैं, जैसे दर्द गुस्से में बदल गया हो- ‘लेकिन उसने जैसा किया है… अब वैसा ही भोगेगी। हमने उसे जन्म दिया था, ये पाप नहीं… ये अंधेरा उसने खुद चुना। अब उसकी सजा भी उसे ही काटनी होगी।’ पुलिस के मुताबिक, पूनम की कहानी किसी साधारण अपराध की नहीं, बल्कि सुंदरता को लेकर जन्मी नफरत की दास्तान है। जांच में सामने आया कि उसे खूबसूरत बच्चों से चिढ़ होती थी- इतनी गहरी, इतनी खतरनाक कि उसने सबसे पहले निशाना अपने ही घर के मासूमों को बनाया। शक न उठे, इसलिए उसने अपने ही बेटे को पानी में डुबोकर मार दिया- ठंडे दिमाग से, बिल्कुल उसी तरीके से जैसे बाकी बच्चियों को। कुल चार बच्चे… चार मासूम जिनकी एक-एक सांस उसने अपनी जलन में घोंट दी। और हर बार उसने वही बच्चियां चुनीं जिन्हें वह अपने से ज्यादा सुंदर मानती थी। पुलिस वालों के मुताबिक, उसके भीतर एक डर सालों से सड़ता रहा- ‘ये बच्चियां बड़ी होकर मुझसे सुंदर न हो जाएं।’ (नोट- पुलिस ने पूनम के बयान दर्ज किए हैं, लेकिन अभी यह साबित नहीं हुआ है कि महिला साइको किलर ही है। जांच-पड़ताल जारी है) ——————————————– 1- ब्लैकबोर्ड- बेटी ने मारा तो घर छोड़ा:बस के नीचे मरने पहुंचे, भाई ने फर्जी साइन से पैसे हड़पे, वृद्धाश्रम में रोज सुबह सोचते हैं- कोई लेने आएगा मेरे बच्चे नहीं हैं। पत्नी की मौत के बाद अकेला हो गया था। मुझे आंख से दिखाई नहीं देता। एक रिश्तेदार के यहां रहने चला गया। वहां बहुत जलील हुआ तो एक दूसरे रिश्तेदार के यहां रहने पहुंचा, लेकिन उन्होंने अपने यहां रखने से साफ मना करा दिया। उस दिन मन में विचार आया कि सब खत्म कर दूं। सोचा कि यमुना में कूद जाऊं। फिर मरने के लिए एक बस डिपो पर गया। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड-पत्नी को लोग कोठेवाली समझते हैं:जीबी रोड का पता देख बच्चों को एडमिशन नहीं मिलता; दोस्त कहते हैं चलो तुम्हारे घर मौज करते हैं हलचल भरी दिल्ली में शाम ढलने लगी थी। मैं शहर के जीबी रोड पहुंची। इसे रेड लाइट एरिया भी कहा जाता है। यह इलाका सेक्स वर्क के लिए बदनाम है। दूर से ही सेक्स वर्कर्स के कोठे नजर आ रहे थे, जिनकी खिड़कियों से सजी-संवरी महिलाएं झांक रही थीं। एक-एक करके ग्राहक बाहर बनी सीढ़ियों से उन कोठों पर जा रहे थे। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें

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