14 दिसंबर 1931 यानी आज से ठीक 94 साल पहले। बंगाल में इंटेलिजेंस ब्यूरो ऑफिस में एक कश्मकश भरी गहमागहमी थी। पुलिस के सामने 14 और 15 साल की दो लड़कियां थीं, जिन्होंने कुछ घंटे पहले ही एक अंग्रेज डीएम को घर में घुसकर गोली मारी थी। बेखौफ लड़कियों ने कबूल किया- हमने भगत सिंह की फांसी का बदला लेने के लिए डीएम का वध किया है। इस घटना की 95वीं सालगिरह पर जानिए इतिहास के पन्नों में दबा आजादी की लड़ाई का एक अनोखा किस्सा… साल 1929। बंगाल के चिटागोंग (चटगांव) के कोमिला तालुका के एक स्कूल में 12 साल की सुनीति चौधरी पढ़ती थी। वो अपने आस-पास स्वतंत्रता सेनानियों के विरोध और अंग्रेजों के अत्याचार को देखती और बेचैन होती। इन्हीं दिनों सुनीति की मुलाकात स्कूल की सीनियर शांति घोष से हुई, जिन्होंने उसी साल छात्री संघ की स्थापना की थी। जिससे लड़कियां भी देश की लड़ाई में योगदान दे सकें। शांति उम्र में दो साल बड़ी प्रफुल्ल नंदिनी ब्रह्मा के संपर्क में थी, जो जुगांतर पार्टी की सदस्य थीं। जुगांतर पार्टी एक सीक्रेट सोसाइटी थी, जो हथियार के दम पर अंग्रेजों को भारत से खदेड़ना चाहती थी। नंदिनी ब्रह्मा ने छात्री संघ की लड़कियों को लाठी भांजने, चाकू और तलवार चलाने की ट्रेनिंग का इंतजाम किया। शांति और सुनीति अब हथियार चलाने की ट्रेनिंग देने के साथ ऐसी किताबें और साहित्य भी पढ़ने लगीं, जो अन्य क्रांतिकारियों के कारनामे बताती थीं। सरकार ने ऐसे साहित्य को प्रतिबंधित कर दिया था, फिर भी इस सीक्रेट सोसाइटी में सब उपलब्ध था। सुनीति को सबसे ज्यादा बम बनाने में एक्सपर्ट उल्लासकर दत्त ने प्रभावित किया था। दत्त कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में केमिस्ट्री के छात्र थे, पर बंगालियों की भर्त्सना करने वाले एक प्रोफेसर को धक्का देकर गिरा देने के कारण उनको कॉलेज से निकाल दिया गया था। साल 1908 में मुजफ्फरपुर में मानिकटोला बम कांड में खुदीराम बोस और अरबिंदो घोष पर केस चला था। इस कांड के लिए दत्त ने बम बनाया था जिसके लिए उन्होंने 12 साल अंडमान जेल में कालेपानी की सजा काटी। दत्त से प्रेरणा लेकर सुनीति ने गोला, बारूद, बम को समझना शुरू किया। जुगांतर पार्टी में पुरुष हमले करते और अंडरग्राउंड हो जाते थे। छात्री संघ की जो सबसे होनहार लड़कियां थीं, उन्हें पुरुष क्रांतिकारियों को सूचना, पैसे और हथियार मुहैया करवाने की जिम्मेदारी मिलती थी। लेकिन ब्रह्मा, शांति और सुनीति ने भी फ्रंट पर जाने की मांग की। सुनीति का तर्क था कि अगर उन्हें एक्शन का मौका ही नहीं मिलेगा, तो लाठी, तलवार भांजने का औचित्य ही क्या है। आखिरकार अंडरग्राउंड सीनियर लीडर वीरेंद्र भट्टाचार्जी ने इन तीनों लड़कियों का सीक्रेट इंटरव्यू लिया और इन्हें प्रैक्टिकल ट्रेनिंग की इजाजत दे दी। त्रिपुरा छात्र संघ के प्रेसिडेंट अखिल चंद्र नंदी ने इन्हें ट्रेनिंग देनी शुरू की। रोज ये घर से स्कूल के लिए निकलतीं, लेकिन स्कूल के बजाय शहर की आबादी से दूर मैनमती पहाड़ी पर बंदूक चलाने की ट्रेनिंग करने लगीं। ट्रेनर नंदी के सामने चुनौती थी कि क्या ये लड़कियां रिवॉल्वर का झटका संभाल पाएंगीं। सुनीति के हाथ में छोटा बेल्जियन रिवॉल्वर आया तो पता चला कि उसकी तर्जनी उंगली ट्रिगर तक ही नहीं पहुंच पा रही थी। सुनीति ने बीच की उंगली से बंदूक चलाने की प्रैक्टिस की। इसी दौरान 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी दे दी गई। उन पर हत्या और कोर्ट में बम फेंकने का आरोप था। फांसी पर झूलने से पहले भगत सिंह ने कहा था कि असल क्रांतिकारी सेना तो भारत के गांव और कारखानों में है। इन्हीं क्रांतिकारियों में शांति और सुनीति भी थीं, जिन्होंने अंग्रेजों से बदला लेने की ठान ली। 6 मई 1931 को त्रिपुरा जिला छात्री संघ के एनुअल कॉन्फ्रेंस में नेताजी सुभाष चंद्र बोस चीफ गेस्ट थे। लड़कियों की परेड का नेतृत्व सुनीति कर रही थीं। परेड के बाद सुनीति को हथियार चलाने में ट्रेंड लड़कियों का मुखिया बना दिया गया और फायर आर्म्स की कस्टडी भी उन्हें दे दी गई। परेड के बाद ब्रह्मा ने नेताजी से पूछा कि युद्ध में महिलाओं का कर्तव्य क्या होना चाहिए। नेताजी ने कहा, ‘तुम लोगों को फ्रंट पे देख कर मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी।’ जब शांति ने नेताजी से ऑटोग्राफ मांगा तो उन्होंने लिख कर दिया, ‘हे मात्रशक्ति, अपने सम्मान के लिए अपने हाथ में शस्त्र उठाओ।’ 6 मार्च 1930 को चार्ल्स ज्योफ्री बकलैंड स्टीवंस नाम के अंग्रेज अफसर को त्रिपुरा जिले का डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट बनाया गया। इसी का एक सब डिवीजन कोमिला था। इसी दौरान 12 मार्च 1930 को पूरे देश में गांधी जी का नमक सत्याग्रह शुरू हो गया। 4 मई को गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया। सरकार ने पूरे देश में क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी शुरू कर दी। स्टीवंस सिर्फ गिरफ्तार करने पर नहीं रुका। उसने निहत्थे स्वतंत्रता सेनानियों को टॉर्चर करना शुरू कर दिया। पुलिस को छूट दे दी कि वो सेनानियों के परिवार की महिलाओं के साथ अत्याचार करे। महिलाओं के बलात्कार तक करवाने के आरोप लगे। अपनी सुरक्षा के नाम पर उसने ऑफिस जाना छोड़ दिया और पुलिस के संरक्षण में बंगले से ही प्रताड़ना के फरमान जारी करता रहा। स्टीवंस पर खुद भी महिलाओं के शारीरिक शोषण के आरोप लगे। कोमिला में जुगांतर पार्टी का हर कार्यकर्ता स्टीवंस को मारने को तैयार था, लेकिन उसके बंगले के अंदर जा पाना बेहद मुश्किल था। शांति और सुनीति ने स्टीवंस को मारने की जिम्मेदारी खुद ले ली। 14 दिसंबर 1931। डीएम के बंगले के बाहर सड़क पर एक बैलगाड़ी रुकती है और उसमे से खिलखिलाती हुई शांति और सुनीति उतर कर सिक्योरिटी गार्ड तक पहुंचती हैं। कद-काठी और पहनावे से वे स्कूल की छात्राएं लग भी रही थीं। गार्ड से उन्होंने स्टीवंस से मिलने की अनुमति मांगी। कारण पूछने पर उन्होंने विनम्रता पूर्वक अंग्रेजी में लिखा एक एप्लिकेशन लेटर दिखाया। बताया कि अपने स्कूल में तैराकी प्रतियोगिता आयोजित करने की अनुमति लेने के लिए साहब से मिलना जरूरी है। पुलिस को स्कूल की लड़कियों पर कोई शक नहीं हुआ। उनकी तलाशी लिए बिना उन्हें बंगले के अंदर जाने दिया गया। स्टीवंस अपने कार्यालय में अपने सब डिविजनल अफसर नेपाल सेन के साथ बैठा हुआ था। बाहर बैठे अर्दली को इन्होंने एक पर्ची साहब तक पहुंचाने का आग्रह किया। पर्ची पढ़ कर दोनों बाहर आ गए। किसी को नहीं पता था कि शॉल के अंदर दोनों ने एक-एक रिवॉल्वर छुपा रखी थी। डीएम साहब को उन्होंने योर मैजेस्टी से संबोधित किया। एप्लिकेशन में दोनों ने नाम बदल कर साइन किया था। शायद उन्हें आशा थी कि वे गोली मारने के बाद बच के निकल जाएंगी। साहब ने तैराकी प्रतियोगिता की अनुमति दे दी। लड़कियों ने मुस्कुराते हुए आग्रह किया कि वे एप्लिकेशन पर अनुमति का नोट लिख कर साइन कर दें। साहब और सेन ऑफिस के अंदर गए और साइन करने के बाद स्टीवंस अकेले बाहर आ गया। जब वो बाहर आया तो उसने देखा कि लड़कियां एकदम गंभीर मुद्रा में हैं। उनके शॉल उतरे हुए हैं और दोनों के हाथ में रिवॉल्वर है जो उसके सीने पर तनी है। बिना पलक झपके दोनों ने एक साथ ट्रिगर दबा दिया। स्टीवंस ऑन द स्पॉट मारा गया। गोली चलने की आवाज सुनते ही पुलिस ने दोनों को घेर लिया। दोनों ने भागने की कोशिश भी नहीं की। वे पिटाई और प्रताड़ना के लिए तैयार थीं। दर्द को बर्दाश्त करने के लिए वे ट्रेनिंग के तौर पर अपनी उंगलियों में सुई चुभोया करती थीं। वे जानती थीं कि उनके साथ क्या सलूक किया जाएगा। वो किसी भी सूरत में अपनी पार्टी और संघ का नाम उगलने वाली नहीं थीं। पूरे बंगाल में दोनों के साहस की सूचना पैम्फलेट के जरिए फैलने लगी। सुनीति की मेजर की वर्दी में फोटो को लोगों ने बहुत सराहा। उस फोटो पर बांग्ला में लिखा था, ‘ध्वस्त कर देने की ज्वाला मेरे खून में दहक रही है।’ ये ज्वाला सरकार को ध्वस्त करने की थी। फाइल नंबर 223/19 तैयार की जा चुकी थी। मुस्कुराते, राष्ट्रगान गाते दोनों जेल गईं और कोर्ट रूम में 3 जजों का सामना किया। आईबी की रिपोर्ट में दर्ज है कि शांति और सुनीति हत्या करने के बाद शांत और निर्भीक थीं। कोर्ट में जब इन्हें बैठने के लिए कुर्सी नहीं दी गई, तो ये जज की तरफ पीठ करके 9 दिनों तक चली सुनवाई में खड़ी रहीं। इनका एकमात्र अफसोस ये था कि इन्हें कोर्ट ने नाबालिग होने के नाते फांसी की सजा के बदले उम्रकैद की सजा दी थी। पहली गोली सुनीति ने चलाई थी, लिहाजा उसे जेल की थर्ड क्लास कोठरी में रखा गया जहां चोर-उचक्कों को रखा जाता था। शांति को सेकेंड क्लास कोठरी में क्रांतिकारियों के साथ कैद किया गया। साल 1939 में कांग्रेस की राज्य सरकार ने राजनैतिक कैदियों को रिहा नहीं करने पर रिजाइन कर दिया। लिहाजा 7 साल की कैद के बाद देश के अन्य कैदियों के साथ दोनों को रिहा कर दिया गया। दोनों के साहस का खामियाजा दोनों के परिवार को झेलना पड़ा। दोनों के पिता की पेंशन रोक दी गई। सुनीति के दोनों भाइयों को बिना ट्रायल के जेल में रखा गया। बड़ा भाई जेल में ही था जब छोटे भाई को छोड़ दिया गया। घर की हालत बदहाल थी। छोटे भाई को कलकत्ता की गलियों में ठेला लगाने पर मजबूर होना पड़ा। कुछ दिनों में उसकी मौत हो गई। दोनों ने रिवॉल्वर छोड़ कर कलम पकड़ लिया था। शांति ने बंगाली विमेंस कॉलेज से पढ़ाई पूरी की और कम्युनिस्ट पार्टी की कार्यकर्ता बन गईं। आजादी के बाद वो कांग्रेस में आ गईं और 1952 से लेकर 1968 तक पश्चिम बंगाल की विधानसभा में चुन कर आती रहीं। सुनीति डॉक्टर बनीं। उन्हें भी विधायक बनने का प्रस्ताव था, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। वे अपना क्लिनिक चलाती रहीं और अपने लकवाग्रस्त माता-पिता की देखभाल करती रहीं। वो जीवनभर लेडी मां के नाम से जानी गईं। दोनों के जन्म में एक-एक साल का अंतर था और दोनों के स्वर्गवास में भी एक ही वर्ष का अंतर था। 1988 में सुनीति और 1989 में शांति का निधन हुआ। ———- ये खबर भी पढ़िए… जब 3 हजार चीनी सैनिकों से भिड़ गए 120 बहादुर:एक इंच पीछे नहीं हटे, पोजिशन पर जमी लाशें मिलीं; रेजांग-ला की लड़ाई नवंबर 1962। भारत और चीन के बीच जंग जारी थी। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी LAC के नजदीक लद्दाख के रेजांग ला में 13 कुमाऊं बटालियन की चार्ली कंपनी तैनात थी। माइनस 30 डिग्री की तूफानी हवाओं से बचने के लिए जवानों के पास ढंग के स्वेटर और दस्ताने तक नहीं थे। पूरी खबर पढ़िए
जब दो स्कूली लड़कियों ने अंग्रेज डीएम को गोली मारी:रिवॉल्वर में उंगली छोटी पड़ रही थी; कहा- ये भगत सिंह की फांसी का बदला
📅 Published: December 14, 2025 |
📂 Category: India National
