ब्लैकबोर्ड-'पति गुजरे तो सास तौलिए से मुंह दबाकर मारने लगीं':विदेश ले जाकर पति ने घर से निकाला, स्पर्म लेकर मां बनी- सिंगल मदर की कहानियां

📅 Published: December 18, 2025 | 📂 Category: India National

‘पति की मौत के बाद रेलवे में उनकी जगह मुझे नौकरी मिल गई थी। एक दिन नौकरी से लौटी तो मेरी सास सो रही थी। उस दिन मेरा बेटा पड़ोसी के घर सो रहा था। मैं उसे वहां से लेकर आई, अपने बेड पर सुलाया और खुद भी उसके साथ लेट गई। दिनभर की नौकरी के बाद शरीर थक चुका था, आंख लगने ही वाली थी। तभी अचानक किसी के पैर की आहट सुनाई दी। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, उसने किवाड़ पर टंगा हुआ तौलिया झपट लिया और मेरे मुंह पर डालकर पूरी ताकत से दबाने लगी। मैं चीखते हुए छटपटा रही थी। मेरी चीख सुनकर पड़ोसी जमा हो गए। बिस्तर से उठी तो देखा- मेरी सास ही तौलिए से मेरा मुंह दबा रही थीं। वह जोर-जोर से कह रही थीं- तूने मेरे बेटे को खा लिया। तू मांगलिक है। कुलच्छन है। अब अपने बच्चे को लेकर यहां से भाग जा, नहीं तो तुझे जिंदा नहीं छोड़ूंगी। तभी मकान मालिक भी आ गए। उन्होंने मुझसे कहा- बच्चे को उठाओ और तुरंत इंदौर, अपने मायके निकल जाओ। तुम इस तरह मारी जाओगी, तो मैं पुलिस को गवाही भी नहीं दूंगा। उस दिन के बाद मैं यहां इंदौर आकर रहने लगी।’ यह कहते हुए 63 साल की हेमलता मांडले की आवाज लड़खड़ा जाती है। चश्मे के पीछे से बहते आंसू पोंछते हुए वह कहती हैं- ‘बिना पति की अकेली महिला होना, और उस पर मां बनना… यह सजा मैं हर रोज भुगतती रही।’ ब्लैकबोर्ड में इस बार सिंगल मदर्स की स्याह कहानियां- एक की सास ने उनकी जान लेने की कोशिश की, एक के पति ने विदेश ले जाकर घर से निकाल दिया और एक, रिश्ता न चलने पर डोनर से स्पर्म लेकर मां बनी। हेमलता मांडले इन दिनों अपने बेटे और बहू के साथ इंदौर में रहती हैं। उनका बेटा प्रतीक आईटी कंपनी में काम करता है। हेमलता पति की मौत और उसके बाद के हालात याद करते हुए बार-बार अपने हाथ सहलाती हैं। उन दिनों को सोचकर आज भी उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। वह कहती हैं, ‘पति के साथ जबलपुर में रहती थी। जून 1988 में शादी के एक साल बाद बेटे का जन्म हुआ। सितंबर 1990 की बात है। उस दिन पति ड्यूटी पर जा रहे थे। अचानक बोले- अगर मैं लौटकर न आऊं, तो बेटे के साथ मिलकर मेरे पितरों का श्राद्ध कर लेना।’ मैं घबराकर बोली- ऐसा क्यों कह रहे हो? आप अगली सुबह लौट आना, फिर हम साथ में श्राद्ध करेंगे। मुझे क्या पता था कि अगले ही दिन उन्हीं का श्राद्ध करना पड़ेगा। अगली सुबह खबर मिली कि पति की तबीयत खराब है। सास के साथ अस्पताल पहुंची। कोई सच बताने को तैयार नहीं था। बेचैनी में ऑपरेशन थिएटर तक जा पहुंची। तभी डॉक्टर ने कहा- ‘प्रभाकर मांडले की डेड बॉडी पोस्टमॉर्टम हाउस भेज दी गई है। उनकी हार्ट अटैक से मौत हो गई है।’ प्रभाकर मांडले मेरे ही पति का नाम था। यह सुनते ही मैं बेहोश हो गई। मुझे करीब 36 घंटे बाद होश आया। डॉक्टर ने कहा- इसे तुरंत घर ले जाओ, नहीं तो दो-दो अर्थियां उठानी पड़ेंगी।’ पति की मौत के कुछ महीनों बाद ही रेलवे में उनकी जगह मुझे नौकरी मिल गई। यह कहते हुए वह सामने दीवार पर टंगी बेटे की तस्वीर देखने लगती हैं। कहती हैं, ‘मेरा बेटा उस वक्त सवा साल का था। सास के पास छोड़कर ड्यूटी जाती थी, लेकिन वह उसे दूध तक नहीं पिलाती थीं। बच्चा भूखा रोता रहता था।’ ‘जब पॉटी कर देता, तो सास उसे दो-दो घंटे बाथरूम में खड़ा रखतीं। मैं लौटती तो बिना कपड़ों के, टब-बाल्टी पकड़े मेरा बेटा मुझे देखकर चीखने लगता। इसे उस हाल में देखकर कलेजा फट जाता था।’ सास चाहती थीं कि मैं नौकरी छोड़ दूं, लेकिन नौकरी के सिवा मेरे पास कोई सहारा नहीं था। जब सास ने जान से मारने की कोशिश की, तब मैं इंदौर अपने मायके लौट आई। नौकरी करते हुए बच्चे को संभालना मुश्किल था। मैंने रेलवे अधिकारियों को पत्र लिखकर बच्चे को ऑफिस लाने की अनुमति मांगी। अनुमति मिली। उसके बाद मैं दुधमुंहे बेटे को ड्यूटी पर साथ लेकर जाने लगी- दूसरे कमरे में दूध पिलाकर सुलाती और फिर काम में लग जाती। इस तरह मैंने अपने बच्चे को पाला। बेटा थोड़ा बड़ा हुआ, तो मेरे जीजा उसे स्कूल ले जाते और छोड़ते। मेरे पिता उस वक्त अक्सर कहते- ‘हेमलता, दूसरी शादी कर लो। बुढ़ापे में पति की कमी खलेगी।’ मैं बस यही कहती- जब एक नहीं रहा, तो दूसरा नहीं करूंगी। इस तरह बेटे को देखकर जीती रही। 2019 में बेटे की शादी के दिन खूब रोई थी। बारात के वक्त, जब सब साफा बांध रहे थे, मैंने भी साफा बंधवाया और बेटे से कहा- ‘मैं ही तुम्हारे लिए बाप भी हूं। आज बाप का फर्ज मैं ही निभाऊंगी।’ पति की बहुत याद आती है। उन्हें याद कर आज भी हर रात चुपके से रो लेती हूं। सोचती हूं, ‘जिस उम्र में लड़कियां सजती-संवरती हैं, उसी उम्र में मैं विधवा हो गई। गोद में बेटा भी था।’ उस वक्त जब बस में सफर करती तो महिलाएं बिंदी थमा देतीं- ‘दीदी, आज बिंदी नहीं लगाई?’ उन्हें कैसे बताती कि 26 साल की उम्र में सब छिन गया। यह बात पिता से बताई, तो उन्होंने कहा- ‘छोटी-सी बिंदी लगा लिया करो।’ एक दिन बेटा कहीं से बड़ी, लाल चटकदार बिंदी लाया और मेरे माथे पर लगा दिया। गले लगकर बोला- ‘मां, बिंदी लगाया करो। तुम सुंदर लगती हो।’ इंदौर में इस तरह सिंगल मदर हेमलता की कहानी जानने के बाद दिल्ली पहुंचा। वहां मेरी मुलाकात कनॉट प्लेस स्थित एक एनजीओ में काम कर रहीं रश्मि सहगल से हुई। मिलते ही मैंने पूछा- कितने बच्चे हैं आपके? सुनते ही रश्मि के पांव रुक जाते हैं। कहती हैं, ‘आते-जाते, सब्जी लेते हुए पिछले तीन सालों में यह सवाल कई बार सुन चुकी हूं। अचानक जुबान पर दो बच्चे…आते-आते बात रुक जाती है। फिर बोलती हूं- एक बच्चा। मन ही मन सोचती हूं कि अगर दो बच्चे बोलूंगी तो कई सवाल उठेंगे- कि वे बच्चे कहां हैं, पति क्या करते हैं और कहां हैं…वगैरह।’ ‘फिलहाल, इस वक्त सिर्फ एक बच्चे की मां हूं।’ ‘इस वक्त एक बच्चे की मां?’- मैं उनकी बात समझ नहीं पाया। दोबारा पूछने पर रश्मि कहती हैं, ‘अभी बेटी का फोन आया था। दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की वजह से उसकी ऑनलाइन क्लास चल रही है। पिछले हफ्ते ही उसे बोर्डिंग स्कूल से लेकर लाई हूं। आज घर में मेड आलू-पराठा बना रही थी, तो बेटी बोली- ‘मॉम, आज तो रेस्टोरेंट वाला खाना बन रहा है। आप कब तक आओगी?’ कहां रहती हैं? ‘कई मकान बदलने के बाद इस वक्त अपनी बेटी लॉरिन के साथ ग्रेटर नोएडा में रहती हूं।’ रश्मि आगे कहती हैं, ‘मेरा बेटा माही अपने पापा के साथ रहता है। कहां, मुझे नहीं पता। चार साल से उससे मिली नहीं हूं। बेटे की वजह से कोई फिल्म नहीं देखती- परदे पर बच्चा दिखते ही मुझे वही नजर आता है।’ बेटे की कोई तस्वीर? पूरा मोबाइल खंगालने पर भी रश्मि को बेटे की एक भी फोटो नहीं मिलती। वह कहती हैं, ‘ऐसी कोई रात नहीं गुजरती, जब मेरे आंसुओं से तकिया गीला न हो। आज भी बेटे की कोई खबर नहीं है, फिर भी मां हूं- महसूस होता है कि वह ठीक होगा।’ वह बताती हैं, ‘पति ने बेटे को ले जाते वक्त धमकी दी थी कि वह बेटी को नहीं ले जा रहे, उसी से संतोष करना, वर्ना उसे भी छीन ले जाऊंगा। अब सिर्फ बेटी के लिए जी रही हूं। सिंगल मदर बन गई हूं। कई बार तो सोचकर ही कांप जाती हूं- अगर मुझे कुछ हो गया, तो मेरी 10 साल की बेटी का क्या होगा? मेरा सपना है कि बेटी को पढ़ा-लिखा दूं, उसके लिए एक घर बना दूं, जिसके गेट के बोर्ड पर लिखा हो- ‘लॉरिन हाउस’। ताकि कभी कोई उसे ताना दे, घर से निकाले तो वह कह सके- मेरा अपना भी घर है।’ पति कहां रहते हैं? ‘विदेश… शायद ऑस्ट्रेलिया, अपनी दूसरी पत्नी के साथ।’ रश्मि एक लाइन में जवाब देती हैं और चुप हो जाती हैं। थोड़ी देर बाद कहती हैं- ‘2014 में जहां मैं नौकरी करती थी, वहीं एक कश्मीरी मुस्लिम युवक से मेरी मुलाकात हुई। कुछ समय बाद हमने कश्मीर जाकर शादी कर ली। फिर हम दुबई चले गए। वहां 2015 में सर्जरी से मुझे बेटी पैदा हुई। दूसरे दिन ही अस्पताल से घर आ गई। बच्ची को दूध पिलाने से लेकर डायपर लाने तक सब मुझे ही करना पड़ता। पेट में टांके कच्चे थे, घाव खुल गया और उसमें पस भर गई।’ वह रुकती हैं- ‘उसी वक्त समझ आ गया था कि मैं अकेली हूं। पति का बच्ची से कोई जुड़ाव नहीं था। केवल वह थोड़ी-सी तय रकम दे देते थे। उसी में सब संभालना पड़ता था।’ उसके दो साल बाद, 2017 में बेटे माही का जन्म हुआ। तब लगा कि अब शायद सबकुछ ठीक हो जाएगा। देखभाल के लिए कश्मीर से मेरी सास भी आ गई थीं। वह कहती थीं- ‘तुम्हारे बच्चे मेरे हाथ से कुछ नहीं खाते, तुम ही इन्हें संभालो।’ असल में बच्चों की सारी जिम्मेदारी मुझ पर ही थी। आज भी वह हिजाब मेरे पास है, जिसमें गांठ बांधकर मैं अपने बेटे को पेट से बांधे रखती थी। पेट पर बांधे हुए उसे दूध पिलाती और बेटी को खाना खिलाती।’ भारत कैसे आईं? रश्मि के चेहरे पर हल्की मुस्कान उभर आती है, मानो वह पुराने जख्म को ढक रही हों। कहती हैं- ‘2022 की बात है। उस वक्त हम सिंगापुर रहने लगे थे। वहां रोज दोनों बच्चों को स्कूल छोड़ने जाना पड़ता था। सुबह पति को जगाती तो वह मुझसे झगड़ पड़ते थे। एक दिन मैंने पति से कहा कि मुझे ड्राइविंग सिखा दें, ताकि बच्चों को स्कूल छोड़ सकूं। उसके बाद मैंने ड्राइविंग लाइसेंस के लिए एप्लिकेशन कर दिया। जिस दिन ड्राइविंग टेस्ट था, मेरे पति ने मुझे कार देने से मना कर दिया। मैं कार के सामने खड़ी गिड़गिड़ाती रही- चाबी देने को कहती रही, लेकिन उन्होंने एक नहीं सुनी। जाते वक्त मेरे पैर पर कार चढ़ाते हुए ऑफिस निकल गए। उसी दिन मैंने तय कर लिया- जिस इंसान को मेरी कद्र नहीं, उसके साथ रहना बेकार है। 2023 आते-आते हालात और बिगड़ गए। एक रात पति ने मुझे और मेरी बेटी को घर से निकाल दिया। उन्हें लगा, हर बार की तरह मैं रोऊंगी और सुबह वापस लौट जाऊंगी, लेकिन उस दिन दोस्तों को फोन कर उधार पैसे मांगे। टिकट कराया और बेटी को साथ लेकर दिल्ली आ गई। जो बेटी सिंगापुर के करिकुलम में पढ़ रही थी, उसे दिल्ली में कोई स्कूल एडमिशन देने को तैयार नहीं था। सभी स्कूल बच्चे के पिता की डिटेल्स मांग रहे थे। बड़ी मुश्किल से एक स्कूल में एडमिशन मिला। वहां महीने की फीस 15 हजार थी, जबकि उस वक्त मेरी सैलरी महज 30 हजार। करीब एक साल तक बेटी को पढ़ाया, फिर उस स्कूल ने बेटी को निकाल दिया। उसके बाद बेटी बीमार पड़ने लगी। जो भी बचत का पैसा और गहने थे, बेचकर उसका इलाज कराया। उस दौरान मेरी भी तबीयत काफी खराब हो गई। अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ गई। मैं बेटी को कुछ दिनों के लिए अपनी मां के पास छोड़ने के लिए लाजपत नगर गई, लेकिन मां ने दरवाजा बंद कर लिया और सीधे मना कर दिया- यहां मत आना। बीमार होने की वजह से मेरी नौकरी छूट गई। उस वक्त लोग सलाह दे रहे थे- ‘दूसरी शादी कर लो। बच्ची के चक्कर में जिंदगी क्यों खराब कर रही हो। जिसका बच्चा है, उसे दे दो।’ उन्हें क्या पता, मैं अपनी बेटी के लिए जी रही हूं। उस वक्त बेटी कुछ मांगती, तो कोई बहाना बना लेती। उससे सच बताने की हिम्मत नहीं होती। जब नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाती तो बेटी फोन करके पूछती- ‘मां, नौकरी लगी?’ मैं हंसकर कहती- ‘नहीं बेटा’। मन ही मन सोचती- आज फिर उसे पिज्जा खिलाने और फिल्म दिखाने का वादा पूरा नहीं कर पाऊंगी। ऐसे ही चार महीने गुजर गए। अभी सब ठीक है। आप खुद को अनाथ क्यों कह रहीं? ‘चौथी क्लास में थी, तभी पापा की कैंसर से मौत हो गई थी। इसके बाद मां ने दूसरी शादी कर ली। 5वीं से 10वीं की पढ़ाई तक जैसे-तैसे उसी घर में रही। एक दिन मां मुझे और मेरी बहन को कार में बैठाकर पास के एक अनाथ आश्रम में छोड़ आईं। उसके बाद हम कभी घर नहीं लौटे।’ रश्मि की कहानी के बाद मैं भोपाल लौटा, जहां संयुक्ता बनर्जी से मुलाकात हुई। संयुक्ता बिना शादी के मां बनी हैं। वह बताती हैं, ‘2007 में मैं बॉयफ्रेंड के साथ मुंबई में लिव-इन में रहती थी। मेरे परिवार को सब पता था। बाद में हमने शादी भी की, लेकिन रिश्ता टिक नहीं पाया। मैं वापस भोपाल आ आई और 2014 में हमारा आपसी सहमति से तलाक हो गया।’ संयुक्ता कहती है, ‘तलाक के बाद मेरा मां बनने का सपना अधूरा रह गया। मैंने सोचा एक बच्चा गोद ले लूं। उसके लिए मैंने अप्लाई भी किया, लेकिन सालों तक सफल नहीं हो पाई। तब तक मेरी उम्र 35 साल हो चुकी थी। उसी दौरान पता चला कि बिना पति के स्पर्म डोनर की मदद से भी मां बना जा सकता है। मैंने स्पर्म लेने का फैसला किया और मां बन गई। इस तरह मैं सिंगल मदर हूं।’ ——————————————– 1- ब्लैकबोर्ड- बेटी ने मारा तो घर छोड़ा:बस के नीचे मरने पहुंचे, भाई ने फर्जी साइन से पैसे हड़पे, वृद्धाश्रम में रोज सुबह सोचते हैं- कोई लेने आएगा मेरे बच्चे नहीं हैं। पत्नी की मौत के बाद अकेला हो गया था। मुझे आंख से दिखाई नहीं देता। एक रिश्तेदार के यहां रहने चला गया। वहां बहुत जलील हुआ तो एक दूसरे रिश्तेदार के यहां रहने पहुंचा, लेकिन उन्होंने अपने यहां रखने से साफ मना करा दिया। उस दिन मन में विचार आया कि सब खत्म कर दूं। सोचा कि यमुना में कूद जाऊं। फिर मरने के लिए एक बस डिपो पर गया। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड-पत्नी को लोग कोठेवाली समझते हैं:जीबी रोड का पता देख बच्चों को एडमिशन नहीं मिलता; दोस्त कहते हैं चलो तुम्हारे घर मौज करते हैं हलचल भरी दिल्ली में शाम ढलने लगी थी। मैं शहर के जीबी रोड पहुंची। इसे रेड लाइट एरिया भी कहा जाता है। यह इलाका सेक्स वर्क के लिए बदनाम है। दूर से ही सेक्स वर्कर्स के कोठे नजर आ रहे थे, जिनकी खिड़कियों से सजी-संवरी महिलाएं झांक रही थीं। एक-एक करके ग्राहक बाहर बनी सीढ़ियों से उन कोठों पर जा रहे थे। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें

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