‘उस दिन मेरे बेटे हार्दिक को तेज बुखार था। शरीर टूट रहा था, लेकिन फिर भी उसने कहा- पापा, प्रैक्टिस मिस नहीं कर सकता। वो बिना कुछ खाए घर से निकल गया। जाते-जाते अपनी मां से मुस्कुराकर बोला था-‘मां, मेरी पसंद का खाना बना लेना… लौटकर खाऊंगा।’ मैदान में खेलते-खेलते अचानक वो बड़ा-सा पोल उसके ऊपर आ गिरा। उसका लीवर फट गया था, अंदर ही अंदर काफी खून बह गया था। जब हॉस्पिटल पहुंचा तो चेहरा पीला पड़ चुका था, होठ सूखकर सफेद पड़ गए थे। मैं उसका हाथ पकड़े बैठा हुआ था, दिल को तो उम्मीद थी कि मेरा बेटा मुझे छोड़कर नहीं जा सकता, लेकिन दिमाग सब समझ चुका था। मैं डॉक्टर से बार-बार कह रहा था इंजेक्शन लगाओ, मेरे बेटे को बचा लो। उसकी एक आंख बिल्कुल स्थिर थी, दूसरी धीरे-धीरे घूम रही थी, सांसें टूट रही थीं। मैं समझ गया था कि मेरा बच्चा…. मेरी जान… मेरे हाथों से फिसल रहा है और मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा था।’ ब्लैकबोर्ड में इस बार हरियाणा के उन परिवारों की स्याह कहानी, जिनके बच्चे नेशनल लेवल के खिलाड़ी थे, लेकिन प्रशासन की लापरवाही से अपनी जान गंवा बैठे। हरियाणा के रोहतक जिले का लाखन माजरा गांव में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था। बास्केटबॉल का पोल गिरने से मारे गए हार्दिक के घर गांव के लोग इकट्ठा हुए थे। निर्मला अपने बेटे हार्दिक का नाम ले-लेकर बेहोश हो जा रही थीं। पिता संदीप राठी गुमसुम दरवाजे पर बैठे बाहर की ओर देख रहे थे जैसे किसी के आने का इंतजार हो। जिस आंगन में कभी हार्दिक की बास्केटबॉल प्रैक्टिस की आवाज गूंजती थी, आज वही आंगन मातम में डूबा था। दीवार पर बास्केटबॉल नेट अब खाली था जिसमें बॉल डालने वाला हार्दिक अब इस दुनिया में नहीं था। घर का माहौल भारी, मां का हाल बेहाल, और पिता
संदीप लंबी सांस लेकर बोलते हैं, ‘हार्दिक 6 बार नेशनल लेवल पर खेल चुका था। तीन बार सब-जूनियर लेवल की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। उसका रूटीन किसी प्रोफेशनल एथलीट की तरह था। सुबह 4 बजे स्टेडियम जाता, फिर घर आकर नाश्ता करता और 9 बजे दोबारा प्रैक्टिस पर लौट जाता। शाम को 4 बजे फिर ग्राउंड में होता और रात 8 बजे घर आता। बस एक ही सपना था- देश के लिए गोल्ड मेडल लाना।’ संदीप ये कहते हुए फफक कर रो पड़ते हैं। अपनी हथेलियों की रेखाएं देखते हुए कहते हैं- ‘ मेरा बेटा हमेशा कहता था कि एक दिन दुनिया आपको हार्दिक के पापा के नाम से पहचानेगी। लोग कहेंगे कि देखो, हार्दिक के पापा जा रहे हैं। अब लोग सच में मुझे हार्दिक के पापा कहकर बुलाते हैं, लेकिन ये सब सुनने के लिए वो नहीं है। हमारा घर सूना हो गया है।’ संदीप अपने छोटे बेटे प्रतीक को पास बैठाकर धीमी आवाज में कहते हैं, ‘उस हादसे ने इसे अंदर से तोड़ दिया है। दोनों भाई हर शाम साथ-साथ बास्केटबॉल खेलते थे। खेलते हुए हार्दिक उसकी गलतियां सुधारता, कंधे पर हाथ रखकर हिम्मत बढ़ाता। अब प्रतीक जब स्टेडियम में कदम रखता है, तो हर कोना हार्दिक की याद दिलाता है। हार्दिक की मां खुद को संभाल नहीं पा रहीं। बेटे की तस्वीर देखते-देखते बेहोश हो जाती हैं। होश आता है, तो पहला सवाल यही पूछती है कि हार्दिक कहां है? जैसे उनका मन अभी भी उस एक पल पर अटका हुआ हो, जहां से जिंदगी आगे बढ़ने को तैयार ही नहीं।’ हादसे वाले दिन को याद करते हुए संदीप की आंखें फिर भर आती हैं। वो कहते हैं कि ‘जिस दिन हादसा हुआ वो स्टेडियम में डंकी प्रैक्टिस कर रहा था। वो कहते हैं उसी दौरान हादसा हो गया पोल उसके सीने पर गिर गया और उसने वहीं दम तोड़ दिया। उसका लीवर फट गया था। 20 मिनट में वो अस्पताल पहुंच गया लेकिन डॉक्टर ने कहा कि ये तो स्पॉट पर ही चला गया था।’ संदीप बताते हैं कि स्टेडियम ठीक कराने के लिए हम मंत्री से मिले, मुख्यमंत्री को पत्र भेजा। कहा गया कि एमपी कोटे से 18 लाख रुपए आएंगे। फिर बताया कि 2023 में 12 लाख और भेजे गए हैं, लेकिन सबकुछ अब तक केवल कागजों में हैं। अगर वक्त रहते उस पोल की मरम्मत हो जाती, तो आज हार्दिक हमारे साथ होता। देश ने एक अच्छा खिलाड़ी खो दिया… हमने अपना बेटा।’ संदीप की आवाज थोड़ी तेज होती है, जैसे भीतर जमा हुआ गुस्सा बाहर आ रहा हो। वह कहते हैं, ‘हरियाणा से इतने खिलाड़ी निकलते हैं, इतने मेडल आते हैं… लेकिन कोई नहीं देखता कि उसके पीछे हमारे बच्चों और पूरे परिवारों की कितनी मेहनत होती है। मेडल जीतकर खिलाड़ी लौटते हैं तो सरकार आगे आ जाती है- माला पहनाती है, फोटो खिंचवाती है, लेकिन जब वही खिलाड़ी किसी मुश्किल में फंस जाता है, या उसकी जान चली जाती है… तब उसका परिवार बिल्कुल अकेला रह जाता है।’ हार्दिक के छोटे भाई, प्रतीक राठी कहते हैं- ‘उस दिन हम दोनों भाई मैदान में प्रैक्टिस कर रहे थे। मैं हार्दिक को बॉल पास कर रहा था, उसने कहा तू रहने दे, मैं अकेले प्रैक्टिस कर लूंगा। मैं वहीं आराम करने बैठ गया। तभी अचानक, झटका लगते ही बास्केटबॉल का पोल उसके ऊपर गिर गया।’ प्रतीक की आंखें भर आती हैं और उनकी आवाज टूट जाती है। ‘मेरा भाई मेरे और हमारी टीम के लिए कोच जैसा था। खेलते समय वह मेरी हर गलती पकड़ता और सुधारता था। आज जब वह इस दुनिया में नहीं है, तो मैंने ठान लिया है- अब से बास्केटबॉल उसी के नाम खेलूंगा। उसके सपने पूरे करूंगा। अगले महीने मुझे अपनी पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेलनी है, लेकिन उसके बिना मैदान पर प्रैक्टिस करना बेहद मुश्किल हो रहा है।’ हार्दिक के दोस्त रोहित बताते हैं, ‘उस दिन हार्दिक मैदान पर ड्रिब्लिंग प्रैक्टिस कर रहा था। मैं बिल्कुल उसके पास खड़ा था। जैसे ही उसने रिंग पकड़ी, पोल अचानक टूटकर सीधा उसकी छाती पर गिर गया। तुरंत सभी ने पोल हटाया और उसे अस्पताल के लिए ले गए। रास्ते भर वह बस यही कह रहा था छाती में बहुत दर्द हो रहा है। अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसकी मौत हो गई।’ रोहित की आवाज में टूटन है, लेकिन वे आगे बताते हैं, ‘हम पांच साल से साथ प्रैक्टिस कर रहे थे। वह हमेशा कहता था कि हम दोनों एक साथ भारत के लिए खेलेंगे और देश के लिए मेडल लाएंगे। हमारा मुख्य ठिकाना अब स्टेडियम बन गया था, लेकिन अब वही जगह डर की वजह बन गई है। जब तक स्टेडियम की व्यवस्थाएं पूरी तरह सुरक्षित नहीं होंगी, ऐसे हादसे होते रहेंगे। बास्केटबॉल का दूसरा पोल भी खराब स्थिति में है- वह भी कभी गिर सकता है। इस हादसे के बाद हम अभी तक प्रैक्टिस के लिए मैदान पर नहीं गए हैं।’ रोहित आगे कहते हैं, ‘हार्दिक हमारी टीम का सबसे उम्दा खिलाड़ी था। उसकी ऊंचाई 6 फुट 2 इंच थी। वह टीम का सबसे लंबा, सबसे मजबूत और सबसे समर्पित खिलाड़ी था। टीम को हमेशा साथ लेकर चलता था। उसके बिना हम अपनी टीम की कल्पना भी नहीं कर सकते।’ हार्दिक के कोच मोहित, आंखों में उदासी लिए, याद करते हुए कहते हैं, ‘वह एक अलग ही तरह का खिलाड़ी था। समय का बिल्कुल पाबंद, एक मिनट भी लेट नहीं होता था। बड़े खिलाड़ियों की इज्जत करता और छोटे खिलाड़ियों का हाथ पकड़कर उनके खेल सुधारता। मुझे पूरा भरोसा था कि वह एक दिन देश, अपने गांव और परिवार का नाम रोशन करेगा।’ कोच की आवाज कड़वी हो जाती है और वे कहते हैं, ‘यह हार्दिक की मौत नहीं है; सरकार की लापरवाही के कारण हुआ मर्डर है। अगर सरकार एक इंडोर स्टेडियम तक नहीं बना सकती, तो और क्या कर सकती है? वह बस पांच लाख का मुआवजा देकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रही है। उसका जमीर खत्म हो चुका है, लेकिन हम नहीं झुकेंगे। हम चंदा इकट्ठा करके हार्दिक के नाम पर इंडोर स्टेडियम बनवाएंगे।’ मोहित एक और याद साझा करते हुए कहते हैं, ‘अप्रैल का महीना था। राष्ट्रीय स्तर के मुकाबले में हमारा मैच दिल्ली की टीम से था। यह तीसरे स्थान के लिए मुकाबला था। उस दिन हार्दिक के पैर में सूजन थी, लेकिन उसने कहा- ‘हमें यह मैच जीतना है।’ ‘वह मैदान पर बिल्कुल अलग लेवल पर खेल रहा था। अंत में हमने एकतरफा जीत दर्ज की और यह पूरी तरह हार्दिक की बदौलत था। सच कहूं तो ऐसे खिलाड़ी रोज पैदा नहीं होते, लेकिन हम उन्हें इतनी आसानी से खो देते हैं, सिर्फ इसलिए कि स्टेडियम का पोल टूटा हुआ है और सरकारें आंखें मूंदे सो रही हैं।’ पांच अंतरराष्ट्रीय स्तर के मैच खेल चुके हार्दिक के गांव के वरिष्ठ खिलाड़ी नरेंद्र याद करते हैं, ‘हार्दिक एक अनुशासित खिलाड़ी था। उसकी बॉडी, चाल, हर पहलू इस खेल के लिए पूरी तरह फिट था। मैं खुद पांच अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुका हूं, लेकिन कह सकता हूं कि हार्दिक मुझसे भी आगे जाने वाला खिलाड़ी था। वह कभी प्रैक्टिस से नहीं भागता था, बीमार होने पर भी। उसके समर्पण और मेहनत ने हम सभी को प्रेरित किया।’ नरेंद्र आगे बताते हैं, ‘हमारे लाखन माजरा स्टेडियम से अब तक 10-12 अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी निकले हैं और 30-40 खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय स्तर पर खेला है। इसे ‘खेल गांव’ कहा जाता है। कुछ खिलाड़ी आर्मी या नेवी में हैं, लेकिन इस मैदान की अनदेखी सरकार ने की है। अगर स्टेडियम का रखरखाव समय पर किया गया होता, तो आज हार्दिक हमारे बीच होता।’ उन्होंने पूरे देश की तस्वीर भी उजागर करते हुए कहा, ‘अगर आज पूरे देश में 100 बास्केटबॉल कोर्ट हैं, तो करीब 80 असुरक्षित स्थिति में हैं। हमारी सरकार से गुजारिश है कि इस हादसे से सबक ले और इस मैदान की मरम्मत कराई जाए। यहां बास्केटबॉल, कबड्डी और हॉकी के कई खिलाड़ी देश का नाम रोशन कर चुके हैं, लेकिन बास्केटबॉल के लिए कभी सरकारी कोच नहीं आया। हम सीनियर खिलाड़ी ही जूनियर्स को ट्रेनिंग देते हैं और स्टेडियम का रखरखाव भी खुद करते हैं। अगर यहां सरकारी कोच हो, तो खिलाड़ी और ऊंचाइयों तक पहुंच सकते हैं।’ हार्दिक को याद करते हुए उनकी दादी संतोष भावुक हो उठती हैं। आंखों में आंसू भरे हुए वे कहती हैं, ‘जब भी हार्दिक खेलकर आता, सबसे पहले मुझे ही अपनी जीत और मेहनत के बारे में बताता। मेरे हाथ से दी गई हर चीज वह बड़े प्यार से खाता था। वह बचपन से ही खेल के पीछे पागल था। तीन साल का था तभी से अपने पिता को साथ लेकर बॉल खेलता था। हमने सोचा था कि एक दिन वह खेल के जरिए बड़ा अफसर बनेगा और गांव का नाम रोशन करेगा… लेकिन ऐसा नहीं हुआ।’ हार्दिक के घर पर मौजूद गांव के बाकी लोग भी उसकी अच्छाइयों को याद करते हैं। वे बताते हैं, ‘वह सिर्फ एक खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि एक नेक इंसान था। रास्ते में यदि कोई बुजुर्ग मिलता, तो वह उन्हें अपनी स्कूटी से घर तक पहुंचा देता था।’ बहादुरगढ़ में अमन के घर का माहौल भी गम से भारी था। हार्दिक की मौत से ठीक एक दिन पहले अमन पर भी बास्केटबॉल कोर्ट का पोल गिर गया था। उनके पिता सुरेश आंखों में दर्द और भावुकता लिए हमें घटना सुनाते हैं। ‘उस दिन घर में मेहमान आए हुए थे, खुशी का माहौल था। अमन स्कूल से आया था और ट्रेनिंग के लिए स्टेडियम जाना चाहता था, लेकिन मैं और उसके बड़े भाई ने उसे रोक दिया। मां ने भी कहा, ‘आज मत जाओ,’ लेकिन वह नहीं माना,’ सुरेश की आवाज कांपती है। वे आगे बताते हैं, ‘अमन रोज शहीद ब्रिगेडियर होशियार सिंह स्टेडियम में प्रैक्टिस करता था। उसका एक ही सपना था- ओलिंपिक में भारत का नाम रोशन करना।’ सुरेश याद करते हैं कि उस दिन उन्हें अस्पताल से फोन आया, ‘आपके लड़के के साथ दुर्घटना हो गई है। स्टेडियम से उसे सिविल अस्पताल ले जाया गया है। आप लोग जल्दी आ जाइए।’ ‘अस्पताल पहुंचे ही थे कि डॉक्टरों ने उसे तुरंत रोहतक पीजीआई रेफर कर दिया। वहां हमें अल्ट्रासाउंड कराने को कहा। हम एक घंटे तक उसी में उलझे रहे। जब तक अल्ट्रासाउंड हुआ, उसके पेट में काफी ब्लीडिंग हो चुकी थी। रिपोर्ट आई, लेकिन तब तक उसकी जान चली गई। अगर समय पर इलाज मिलता, तो मेरा बच्चा आज जीवित होता,’ सुरेश का गला भर आता है। वे आगे अफसोस जताते हैं, ‘उस दिन मेरा बेटा मुझसे पानी मांग रहा था, लेकिन डॉक्टर की अनुमति के बिना उसे नहीं दे सकता था। जब डॉक्टर से बात करके पानी देने गया, तब तक उसकी जान चली गई थी। आखिरी बार उसे पानी भी नहीं पिला सका।’ सुरेश का गुस्सा डॉक्टरों और प्रशासन पर है। ‘जब उसकी मौत हो गई, डॉक्टर अपनी गलती छिपाने में लगे रहे। उसे आईसीयू में भर्ती कर दिया और 24 घंटे केवल कागजी कार्रवाई में उलझे रहे। यहां तक कि उसकी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में उसका जेंडर बदल दिया गया। उम्र को 15 साल की जगह 25 साल लिखा गया और हादसे का समय भी बदल दिया गया। अधिकारी अपनी गलती छिपाने के लिए उसे क्रिकेट खिलाड़ी दिखा रहे थे, जबकि वह हर वक्त बास्केटबॉल लेकर घूमता था।’ सुरेश अपनी आवाज में दर्द के साथ कहते हैं, ‘सच यही है कि मेरे बेटे की मौत पीजीआई में डॉक्टरों की लापरवाही और खेल प्रशासन की बदइंतजामी से हुई। मैं राजनीति नहीं चाहता। बस उसे न्याय मिले। निष्पक्ष जांच हो, सीसीटीवी फुटेज को जांचा जाए और जिम्मेदारों को सजा मिले।’ अमन की बड़ी बहन मानसी हाथ में बास्केटबॉल लिए बैठी हैं। उनकी आंखों में दर्द और यादें दोनों झलक रही हैं। मानसी कहती हैं, ‘अमन दिन-रात इसी बॉल के साथ रहता था। जिस दिन उसने पहला मेडल जीता, वह सबसे पहले मुझे ही दिखाने आया। उसकी आंखों में खुशी ऐसी चमक रही थी, जो कभी भूल नहीं सकती।’ ‘वह स्कूल में हमेशा अच्छे नंबर लाता और खाने-पीने में हर चीज पसंद करता था। उस दिन उसे देखकर मैं बहुत घबरा गई थी। मैंने अपने मोजे उतारकर उसके पैर में पहनाए थे।’ कहते-कहते मानसी फफककर रो पड़ती हैं। अमन के चचेरे भाई रोहित की आवाज में गुस्सा और दर्द दोनों झलकते हैं। वह कहते हैं, ‘अमन के इलाज में लापरवाही हुई। हमें अस्पताल में अल्ट्रासाउंड के लिए एक घंटे तक इंतजार करना पड़ा। वहां मौजूद डॉक्टर की ओर से कोई ध्यान नहीं दिया गया। अंत में जब रिपोर्ट आई, उसी डॉक्टर ने कहा कि यह गंभीर मामला था,’ रोहित की आंखें भर आती हैं। ‘मैं मेडिकल लाइन से जुड़ा हूं, मुझे समझ में आ गया था कि अमन की मौत हो चुकी है। डॉक्टरों ने अपनी गलती छिपाने के लिए उसे सीपीआर दिया और वेंटिलेटर पर रखा। हाथ में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट दिखाते हुए रोहित कहते हैं, ‘इसमें अस्पताल ले जाने का समय, उम्र और जेंडर सब गलत लिखा गया है। आखिर इतना सब कैसे गलत हो सकता है?’ अमन की दादी कहती हैं कि जिस दिन यह हादसा हुआ, उसी दिन घर में खुशी का माहौल था। उस दिन सब उसे स्टेडियम जाने से रोक रहे थे, लेकिन नहीं माना। किसे पता था उसका आखिरी दिन होगा। हाथ में उसकी तस्वीर लेकर रोते हुए दादी कहती हैं कि वो मुझे ‘मम्मा’ कहकर बुलाता था। उसकी आवाज, उसकी हंसी, उसकी शरारतें सब अब यादें बन गए। हमारा सहारा, हमारा चिराग, हमारा अमन हमें छोड़कर चला गया। —————————————— 1- ब्लैकबोर्ड- बेटी ने मारा तो घर छोड़ा:बस के नीचे मरने पहुंचे, भाई ने फर्जी साइन से पैसे हड़पे, वृद्धाश्रम में रोज सुबह सोचते हैं- कोई लेने आएगा मेरे बच्चे नहीं हैं। पत्नी की मौत के बाद अकेला हो गया था। मुझे आंख से दिखाई नहीं देता। एक रिश्तेदार के यहां रहने चला गया। वहां बहुत जलील हुआ तो एक दूसरे रिश्तेदार के यहां रहने पहुंचा, लेकिन उन्होंने अपने यहां रखने से साफ मना करा दिया। उस दिन मन में विचार आया कि सब खत्म कर दूं। सोचा कि यमुना में कूद जाऊं। फिर मरने के लिए एक बस डिपो पर गया। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड-पत्नी को लोग कोठेवाली समझते हैं:जीबी रोड का पता देख बच्चों को एडमिशन नहीं मिलता; दोस्त कहते हैं चलो तुम्हारे घर मौज करते हैं हलचल भरी दिल्ली में शाम ढलने लगी थी। मैं शहर के जीबी रोड पहुंची। इसे रेड लाइट एरिया भी कहा जाता है। यह इलाका सेक्स वर्क के लिए बदनाम है। दूर से ही सेक्स वर्कर्स के कोठे नजर आ रहे थे, जिनकी खिड़कियों से सजी-संवरी महिलाएं झांक रही थीं। एक-एक करके ग्राहक बाहर बनी सीढ़ियों से उन कोठों पर जा रहे थे। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
ब्लैकबोर्ड- बेटा मर चुका था, मैंने डॉक्टर से कहा-इंजेक्शन लगाओ:चैंपियन बेटा कहता था-दुनिया आपको ‘हार्दिक के पापा’ पुकारेगी, सच भी हुआ लेकिन उसके मरने पर
📅 Published: December 4, 2025 |
📂 Category: India National
