संडे जज्बात-कंगना सांसद है तो मैं भी पंजाबी शेरनी हूं:उसने 100 रुपए मेरी कीमत लगाई, उससे लड़ने के लिए मैंने जमीन बेची, 7.5 लाख कर्ज लिया

📅 Published: January 4, 2026 | 📂 Category: India National

वाहेगुरु गुरु जी का खालसा। वाहेगुरु जी की फतह। मैं वही महिंदर कौर हूं, जिसे कंगना रनोट ने 100-100 रुपए लेकर किसान आंदोलन में जाने वाली महिला कहा था। कंगना बीबी ने बाकायदा मेरी फोटो शेयर कर लिखा था कि ‘यह वही दादी हैं जो 100 रुपए में परफॉर्मेंस के लिए उपलब्ध हैं।’ बीबी ये जान ले कि 80-82 साल की बुढ़िया रुपए के लिए आंदोलन में नहीं जाती थी, बल्कि अपने बेटे और पंजाबियों की जायदाद बचाने की खातिर वहां जाती थी। मैं खुद बठिंडा के गांव महेंद्रगढ़ जंडियां के किसान परिवार से हूं। पिछले पांच साल से भाजपा सांसद कंगना के खिलाफ मुकदमा लड़ रही हूं और जब तक उसे सजा नहीं मिल जाती मैं लड़ती रहूंगी। जब तक उसे सबक नहीं सिखा देती, तब तक अदालत जाती रहूंगी। कंगना के शब्दों ने मेरे समेत तमाम पंजाबियों के दिलों पर चोट की है। मैं तो अनपढ़ हूं। मुझे तो अपनी उम्र भी नहीं पता। आजादी के वक्त दो साल की थी, उस हिसाब से अब मेरी उम्र करीब 82 साल होगी। जब हमें पता लगा कि मीडिया के जरिए कंगना ने ऐसा कहा है तो पंजाबियों का खून खौल गया। सभी एक हो गए। हमारे पूरे गांव में इस बारे में मीटिंग हुई। गांव ने फैसला लिया कि इस पर मानहानि का केस करो। इसे बोलने की तमीज सिखाई जाए। ऐसे तो हर कोई उठकर हमें कुछ भी बोल देगा। जिन्होंने यह फैसला लिया वो मेरे बच्चे जैसे थे, उन्होंने मुझे मां बना लिया। पूरा पंजाब ही इस मसले पर एक हो गया। किसान जत्थेबंदियों को विदेशों तक से फोन आए कि मानहानि का केस किया जाए। मैं पंजाब और पंजाबियों के लिए लड़ रही हूं। किसान यूनियन की जड़े विदेशों तक फैली हैं, सहायता भी आई थी। हमारे बच्चे जो विदेशों में बैठे हैं उनका खून खौल गया। इसलिए मैंने केस किया। मेरे तीन बेटियां हैं, उन्होंने मुझे जाने से मना किया, लेकिन मैं नहीं रुकी। फिर मुझे किसी ने रोका भी नहीं। कंगना पर केस के चक्कर में कुल साढ़े सात लाख कर्ज है मुझ पर। साहूकार का 62,000 का कर्ज अलग से है। बैंक वालों ने हम पर केस कर रखा है। ट्रैक्टर नहीं है हमारे पास, किराए पर लेते हैं हर साल। मेरी कुछ जमीन राजस्थान में भी है, जो मेरे ही रिश्तेदारों ने हड़प ली है। उसका भी केस चल रहा है। चाहे कंगना वाला मामला हो या मेरी जायदाद का मामला हो, दोनों में ही वकील को पैसे देने पड़ते हैं। वकील बात करने तक के पैसे लेता है। जमीन बेचकर उसे लाखों रुपए दिए हैं मैंने। कुछ कर्ज लिया, कुछ जमीन बेची। कंगना वाले मामले में किसान जत्थेबंदियों ने भी मेरी मदद की है। इस सोमवार यानी पांच जनवरी को कोर्ट में तारीख है। कंगना कोर्ट में पेश होगी। मैंने आज तक उसे देखा नहीं है। उससे मिलना चाहती हूं। देखना चाहती हूं कि आखिर वो कितनी बड़ी शेरनी है, जिसने शेर किसान बेटे की शेरनी मां को गलत शब्द बोले हैं। वो जवान है, भाजपा सांसद है, पैसे वाली है, एक्ट्रेस है। फिर भी मेरे सामने क्यों नहीं आती है, उसे किस बात का डर है। वो तो सिक्योरिटी साथ लेकर घूमती है। मैं तो गरीबनी हूं, बूढ़ी हूं, किसान परिवार से हूं, लेकिन पांच साल में मैंने हार नहीं मानी। खाली हाथ अदालत के मैदान में जाती हूं। मुझे तो उससे या उसकी सरकार से डर नहीं लगता। मैं उससे पूछना चाहती हूं कि क्या कोई किसान 100 रुपए की खातिर आंदोलन में जाएगा? उसे लगता है हम उसे मार देंगे। अगर वो शेरनी है तो सामने तो आए, पीछे क्यों हट रही है। वो तो छिप रही है, हम तो नहीं छिप रहे। मेरे मन में रोष है कि वो इतनी पढ़ी-लिखी होकर भी, बड़े नेताओं को खुश करने के लिए और टिकट लेने के लालच में हमें आतंकवादी और माओवादी कहती है। उसने कहा कि इंदिरा के दंगों के वक्त हमें मच्छर जैसे मसल दिया गया। हम अन्नदाता हैं। हमारा उगाया अन्न सारा देश खाता है, कंगना भी खाती है। फिर भी हमें कीड़ा-मकोड़ा समझती है। मुझे दुख है कि जिसे खेती किसानी के बारे में जरा सा भी नहीं पता, वो महिला किसानों के खिलाफ ऐसी बातें करती है। बसता हुआ पंजाब कंगना को अच्छा नहीं लगता है। कंगना मुझसे माफी मांगे। एकबार मुझसे पूछे तो सही कि मैं उसे माफ करूंगी या नहीं। उसने जज से माफी मांगी है, मेरे तो मत्थे ही नहीं लगी। पांच साल अकेले अदालत में धक्के खाने के बाद अब माफी का सवाल ही पैदा नहीं होता है। माफी का वक्त अब निकल चुका है। वो नाक रगड़ कर भी माफी मांगे तो मैं माफ नहीं करूंगी। जितनी बारी मैं अदालत गई हूं उतनी बार वो आए। मिले तो सही मुझसे, मेरे सामने तो आए। मैं उसे सबक सिखाना चाहती हूं। अक्ल देना चाहती हूं। कंगना को ये पता चलना चाहिए कि किसी कौम को ऐसे छेड़ना आसान नहीं। बीबी कंगना थोड़ा जुबान पर लगाम रख, कौड़े बचन न बोल। संभल कर बोल, अभी भी स्याणी बन जा। मैं फिर उसे यही कहूंगी कि वह जियूंदी बसती रहे बीबी, लेकिन अदालत आए कम से कम। मेरे पास कुल 12 किले (जमीन नापने की इकाई) जमीन है। एक बेटा है। मैंने रातों को अपने बेटे को खेतों में काम करते हुए और पानी देते हुए देखा है। मैं खुद इस उम्र में धान बोती हूं। बेटा फसल उगाने से लेकर उसे मंडी तक गिराने तक का काम खुद करता है। इतनी मेहनत कौन कर लेगा। मैं तो इस उम्र में भी सारा काम खुद करती हूं। चाय बनाती हूं, खाना बनाती हूं। बारिश, आंधी, तूफान, सर्दी, गर्मी कुछ हो हम खेत में ही रहते हैं। किसान कहां रुकता है। मेरे इकलौते बेटे को चार महीने पहले खेत में धान बोते हुए सांप ने काट लिया। जहर उसके खून में आ गया था। वह बिस्तर पर पड़ा है। चार महीने के बाद अब कहीं जाकर डॉक्टर ने कहा है कि खतरे की कोई बात नहीं है। किसान आंदोलन पर मैं अपनी बहू के साथ गई थी। मेरी बहू भी बराबर मेरे साथ 200 दिन तक वहां बैठी थी। वहां उसे ऐसी सर्दी लगी कि निमोनिया हो गया, जो संभला ही नहीं। आखिरकार वो मर गई। बेटा बिस्तर पर है, बहू मर गई, उनका कोई बच्चा नहीं है। मेरा घर देखो कैसा है, अभी तक बना नहीं है। हम अनपढ़ ही सही, लेकिन शेरनियां हैं। दरअसल, मोदी सरकार जब काले कानून लेकर आई थी तब हर दिन हमारे गांव के गुरुद्वारे में अनाउंसमेंट होने लगी। गांव की पंचायत और किसान जत्थेबंदी के प्रधान ने इन कानूनों का और इसका किसानों पर असर का पंजाबी में तर्जुमा करके हमें बताया। तब हमें पता लगा कि यह क्या बला है। हम हर दिन गुरुद्वारे जाने लगे, वहां इन कानूनों के बारे में बताया जाता था। हमें बताया गया कि तुम्हारे बच्चों को जमीनों से बेदखल किया जा रहा है। तुमसे तुम्हारी ही जमीन पर दिहाड़ी पर काम करवाया जाएगा। तुम्हें लगता है कि हम किसान दिहाड़ी मजदूरी कर सकेंगे। जब हमें समझ आ गया कि यह क्या कानून है, उसके बाद हम सबने दिल्ली की राह पकड़ ली। जब बेटे धरने पर बैठे हों तो माएं कहां से घर बैठ जाएंगी। हम अणखी पंजाबी हैं। क्या बच्चे, क्या औरतें सभी अपने बेटों की जायदाद की खातिर घर से निकल गईं। वहां हमें गर्मी लगी, बारिश आई, धुंध रही, सर्दी हुई। ऐसा कौन सा दुख था जो हमने नहीं सहा। बारिशों में हम ट्रालियों में बैठे। आंधी में हमारे तंबू उखड़ गए, हमने फिर लगा लिए। दुख ऐसा था कि हमसे सहा तो नहीं जाता था, लेकिन हम डटे रहे। वहां कौन सी हमारी हवेलियां थीं, लेकिन हम औरतें फिर से उसे लगा देती थीं। सरकारों ने बुढ़ापे में वक्त डाला, लेकिन भगवान ने साथ दिया। हमें वो वक्त कभी भूलेगा नहीं जो इस सरकार ने हम पर डाला और कंगना बोलती है कि हम सौ सौ रुपए लेकर आंदोलन में आए हैं। हम वहां घूमने या किसी एश परस्ती में नहीं गए थे। बल्कि हम पर वक्त पड़ गया था ऐसा। कंगना खुद तो इश्क की छांव में थी और पैसों में खेल रही थी। हमारे पास कैसी छांव और कैसा पैसा। हम तो दाने उगाएंगे तो खाएंगे और देश को खिलाएंगे। पता नहीं कंगना क्यों पंजाब का बुरा चाहती है। सरकार जनता की सुख मनाए जनता है तभी वो राज कर सकेंगे। मेरे सामने की बात है, मैं 200 दिन तक किसान आंदोलन में बैठी हूं। कितने किसान मेरे सामने मर गए। मैंने रोती हुई माएं देखी हैं। मुझे नहीं भूलते वो सब। मरते दम तक कंगना से अदालत में लड़ूंगी। पीछे नहीं हटूंगी। (महिंदर कौर ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए हैं) ——————————————– 1- संडे जज्बात-दोस्त की प्रेमिका प्रेग्नेंट हुई, रेप केस मुझपर चला:पंचायत ने 6 लाख में सौदा किया- 5 साल जेल रहा, अब बाइज्जत बरी बिहार के दरभंगा जिले का रहने वाला मैं मुकेश कुशवाहा। मुझ पर 17 साल की लड़की के रेप और पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा चला। वो लड़की मेरे दोस्त की प्रेमिका थी। दोस्त ने उसे प्रेग्नेंट किया था, लेकिन मुकदमा मुझ पर चला। पूरी खबर यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-रिश्तेदार की लाश लेकर आया, मेरे गाल छूने लगा:लाशें जलाने के कारण शादी नहीं हुई- पति के बिना जी लूंगी, लाशों के बिना नहीं मैं टुम्पा दास- पश्चिम बंगाल में डोम समुदाय की पहली महिला हूं, जो पिछले कई सालों से कोलकाता के बड़िपुर गांव के श्मशान में लाशें जला रही हूं। पता नहीं भारत में कोई और महिला यह काम करती है या नहीं, पर मैंने यही रास्ता चुना… और यह रास्ता आसान नहीं था। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें

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