बिहार के दरभंगा जिले का रहने वाला मैं मुकेश कुशवाहा। मुझ पर 17 साल की लड़की के रेप और पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा चला। वो लड़की मेरे दोस्त की प्रेमिका थी। दोस्त ने उसे प्रेग्नेंट किया था, लेकिन मुकदमा मुझ पर चला। थानेदारों ने ऐसा केस बनाया कि बेकसूर को जेल भेज दिया गया। सेशन कोर्ट ने 20 साल की सजा सुनाई। मुकदमा लड़ने में मेरी जमीनें बिक गईं। मेरे पापा का सारा काम-धंधा बर्बाद हो गया। मुझ पर ‘रेप आरोपी’ का ठप्पा लग गया। तब मैं 20 साल का था। जवानी में जेल गया। लगा कि अब शायद बुढ़ापे में ही बाहर आ पाऊंगा। आऊंगा भी या नहीं, पता नहीं। मामला हाईकोर्ट पहुंचा। वहां एक ऑडियो ने पूरे केस को पलट दिया और 5 साल बाद मैं बाइज्जत बरी हो गया। मुकदमा लड़ते मेरी जिंदगी तबाह हो गई। मेरी पढ़ाई छूट गई। बिना किसी अपराध के मैं सालों जेल में रहा। दरअसल, बात 2020 की है। दरभंगा शहर से 55 किलोमीटर दूर मेरा गांव है- मौजमपुर। यहीं मेरे दो भाई, एक बहन और मम्मी-पापा समेत पांच लोगों का परिवार रहता था। कोरोना का समय था। एक दिन पता चला कि पड़ोस की 17 साल की लड़की 3 महीने से प्रेग्नेंट है। उस लड़की का मेरे दोस्त दिनेश से संबंध था। दिनेश मेरे बचपन का दोस्त था। हम दोनों साथ में स्कूल जाते थे। साथ खेलते-कूदते। एक ही थाली में खाने वाले जिगरी दोस्त…। दिनेश की प्रेमिका के प्रेग्नेंट होने की बात आग की तरह गांव में फैल गई। लड़की के घर वालों ने दिनेश के खिलाफ पंचायत बुलाई। गांव में ही एक मैदान है, जहां राम जानकी, दुर्गा जी और हनुमान जी का मंदिर है। इसी मैदान में 400 लोगों की पंचायत बैठी। लड़की का परिवार और गांव वाले जमा हुए। उस वक्त मेरे पापा और चाचा, दोनों लुधियाना में थे। पंचायत ने लड़की से पूछा- ‘तुम्हारा किसके साथ संबंध है। तुम्हारे पेट में किसका बच्चा है?’ लड़की कांपते हुए सिर झुकाए बोली- ‘मेरे पेट में दिनेश का बच्चा है। हम दोनों का डेढ़ साल से संबंध है।’ उसके बाद पंचायत ने दिनेश से पूछा- ‘लड़की जो बोल रही है वो सच है?’ दिनेश ने भी हामी भरते हुए कहा- ‘हम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं।’ ये सुनते ही पंचायत उठ कर चली गई। लड़की उस वक्त दरभंगा शहर में रहकर आईटीआई की पढ़ाई कर रही थी। दिनेश भी वहीं रहता था। दूसरे दिन फिर पंचायत बैठी। लड़की के घर वालों ने कहा कि दिनेश को हमारी बेटी से शादी करनी होगी। पंचायत के दबाव में दिनेश के घर वाले राजी हो गए। तभी पंचायत के गंगा और विष्णु महतो जैसे कुछ लोगों ने कहा- इन दोनों की शादी नहीं हो सकती। दोनों एक ही समाज के हैं। दिनेश के दोस्त मुकेश कुशवाहा का भी इसमें हाथ है। उसे भी बुलाओ। उसके बाद मैं भागा-भागा पंचायत में गया। मुझे देखते ही वो लड़की भरी सभा में चीख पड़ी-’मेरा संबंध दिनेश से है, मुकेश से नहीं। ये बच्चा भी दिनेश का है।’ तब गंगा, विष्णु ने कहा- ‘दिनेश और मुकेश के परिवार को लड़की के परिवार वालों को 12 लाख रुपए देने होंगे। 6 लाख दिनेश का परिवार और 6 लाख मुकेश का परिवार देगा। यह शादी नहीं हो सकती। लड़की का बच्चा गिराया जाएगा।’ ये सुनते ही मेरे पैरों चले जमीन खिसक गई। मैंने चीखते हुए पंचायत से कहा- मेरा इस लड़की से कोई लेना-देना नहीं है। लड़की भी तो कह रही है कि उसका मेरे दोस्त दिनेश से संबंध था। वही उसका प्रेमी है और उसके बच्चे का बाप भी। मैं तो दो साल बाद इस लड़की को देख रहा हूं। उस पर मुझे थप्पड़ जड़ते हुए गंगा, विष्णु महतो ने कहा- ‘होशियारी मत करो। चुपचाप 6 लाख रुपए दो और मामला खत्म करो।’ मैंने हाथ जोड़कर उन लोगों से कहा कि मेरे पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं है, 6 लाख रुपए कहां से लाऊंगा? जब मेरी कोई गलती ही नहीं है तो मैं पैसे क्यों भरूंगा? तब वहां बैठे कुछ बुजुर्गों ने मुझे मारना शुरू कर दिया। पंचायत ने सख्त लहजे में आदेश दिया कि ‘पहले एक लाख रुपए का बॉन्ड भरो। तब हम लोग तय करेंगे कि तुम निर्दोष हो या नहीं। देखेंगे कि इस लड़की के बच्चे का क्या करना है।’ उस दिन दिनेश के परिवार ने लड़की के परिवार को 6 लाख रुपए दिए। उसके बाद पंचायत खत्म हो गई। दरअसल, गंगा, विष्णु महतो की नाराजगी की वजह कुछ और थी। दोनों के घर के पास ही एक 20 डिसमिल जमीन थी। जिसपर उनके और हमारे दोनों परिवार की दावेदारी थी। मेरे पापा-चाचा ने खेती के लिए वो जमीन खरीद ली। तभी उन लोगों ने हमें बर्बाद करने की कसम खा ली थी। कुछ दिनों बाद मेरी मां उसी खेत में भिंडी तोड़ने गई थीं। अचानक गंगा-विष्णु महतो का परिवार वहां पहुंचा गया और मां को गाली देने लगा, मारपीट करने लगा। गाली देने लगे। मां रोती-बिलखती घर आईं। मैं फौरन मां के साथ बहेड़ा थाने पहुंचा। थाना प्रभारी को पूरा मामला बताया और FIR दर्ज कराई। तकरीबन 44 दिन तक मामला थाने में रहा। बाद में थाना प्रभारी और गांव वालों की तरफ से दबाव बनाया जाने लगा कि मैं केस वापस ले लूं। 8 सितंबर 2020 की बात है। रात का समय था। बहेड़ी थाने की पुलिस मुझे घर से उठाकर ले गई। जब मैंने पूछा कि मेरा कसूर क्या है? तब थानेदार ने कहा- ‘तुमने अपने गांव की लड़की के साथ रेप किया है। वह नाबालिग तीन महीने से प्रेग्नेंट है। उसके पेट में तुम्हारा बच्चा है। तुम अब उससे शादी करने से इनकार कर रहे हो। उसके साथ मारपीट कर रहे हो। उस लड़की ने थाने में आकर यह बयान दर्ज कराया है।’ ये सुनते ही मैं जमीन पर बैठ गया। थानेदार से कहा कि ये सब झूठ है। मेरा लड़की से कोई संबंध नहीं है। उसका संबंध तो दिनेश के साथ है। उसने भरी पंचायत में ये बात कबूली भी है। मैं तो बस दिनेश का दोस्त हूं। उस बात पर थानेदार मुझ पर आग-बबूला हो गया। कहने लगा कि अब कोर्ट में अपनी कहानी सुनाना, तब तक हवालात में सड़ो। पुलिस ने चार दिन तक मुझे हवालात में रखा। फिर पॉक्सो एक्ट और धारा 376 के तहत रेप का मुकदमा दर्ज करके मुझे दरभंगा के बेनीपुर सब-जेल भेज दिया। मैं उस समय 12वीं में फेल हो गया था। दूसरी बार परीक्षा की तैयारी कर रहा था। इसी बीच, इस केस में मुझे फंसाकर दरभंगा जेल भेज दिया गया। जब घर वालों को पता चला कि मुझ पर मुकदमा कर दिया गया है, तो मां भागती हुईं विष्णु-गंगा महतो के घर गईं। उनके पैर पकड़कर गिड़गिड़ाने लगीं, लेकिन उन लोगों ने मां को दुत्कार कर भगा दिया। उस वक्त पापा और चाचा लुधियाना में थी। कोरोना की वजह से ट्रेन नहीं मिल रही थी। खबर मिलते ही आनन-फानन में वो लोग बस से निकले। 12,000 रुपए देकर तीन दिन बाद घर पहुंचे। तब तक मुझे दरभंगा जेल भेज दिया गया था। पहले दिन वहां बंद कैदियों ने मुझसे पूछा- ‘कितने साल के हो।’ मैंने सिर झुकाकर कहा- 20 साल। क्या किए हो? रेप केस में मुझे अंदर कर दिया गया है। वे हंसते हुए कहने लगे-’जवानी में गलती करोगे तो यही सब होगा।’ कैसे समझाता कि झूठे मुकदमे में फंसाया गया हूं। वहां के कैदी मुझे बहुत मारते थे। ये बात मेरे घर वालों को पता चली। उन्होंने कैदियों को 15 हजार रुपए दिए, तब जाकर मेरे साथ मारपीट बंद हुई। मैं जेल की कैंटीन में खाना बनाता था। कोर्ट में साढ़े तीन साल तक स्पीड ट्रायल चली। हर महीने 5 से 10 तारीखें पड़ती थीं। एक तारीख का खर्च 5 हजार रुपए होता था। यानी हर महीने 50 हजार का खर्च। पापा-चाचा 10-10 किलोमीटर पैदल चलकर कोर्ट जाते, ताकि आने-जाने का खर्च बच जाए। जब पैसे खत्म हो गए, तब घरवालों ने अनाज बेचकर मुकदमा लड़ा। उसके बाद जमीनें बेचनी शुरू कर दी। एक समय ऐसा भी आया कि घर में खाने के लिए अनाज खत्म हो गया। मेरा परिवार दिन में खाता तो रात के लिए तरसता। रात में खाता तो दिन में चूल्हा ठंडा पड़ा रहता था। पापा-मम्मी जब जेल में मुझसे मिलने आते, तो फूट-फूटकर रोते। मां कहती कि घर-दुआर सब तहस-नहस होने लगा है। मैं जेल में बैठा यही सोचता कि अब तो पूरी जिंदगी खत्म हो गई। बाहर की दुनिया देखने की उमर में जेल आ गया। मैं जेल में बमुश्किल से 2 घंटे सो पाता। नींद नहीं आती थी। उस दौरान मैंने तीन बार जमानत के लिए अर्जी लगाई। तीनों बार खारिज कर दी गई। मेरे विरोधियों ने तीन-तीन वकील लगाए थे। साल 2024 में दरभंगा सेशन कोर्ट ने मुझे पॉक्सो एक्ट के तहत 20 साल और धारा 376 के तहत 10 साल की जेल की सजा सुनाई। इसके बाद 10 दिन तक मैंने कुछ नहीं खाया। हर दिन जेल में अपनी उम्र गिनता था। सोचता था कि अब कभी बाहर नहीं जा पाऊंगा। दिन-रात रोता। इसी बीच, दिल्ली में मेरे चाचा के एक जानने वाले ने उन्हें बताया कि गांव में चिंटू सिंह नाम के एक समाजसेवी हैं। वो मामले में कुछ कर सकते हैं। पापा और चाचा फौरन उनके पास पहुंचे। चिंटू सिंह की कोशिशों से मामला पटना हाईकोर्ट पहुंचा। 2025 में कोर्ट ने पूरे मामले को फिर से जांच करने का आदेश दिया। तब जाकर मामले की सीआईडी जांच हुई। कोर्ट में पूरी बात आई, तो मामले की असलियत से पर्दा उठा। जांच में पंचायत का एक 57 मिनट का ऑडियो क्लिप भी मिली, जिसमें 12 लाख रुपए में डील करने की बात कही गई थी। लड़की के साथ रेप का फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट बनवाया गया था। जिसमें दावा किया गया था कि लड़की के प्राइवेट पार्ट पर मेरा सीमन मिला है। जबकि हकीकत में लड़की का अबॉर्शन करवा दिया गया था। मेडिकल रिपोर्ट में ऐसी महिला डॉक्टर का नाम लिखा गया था, जो हकीकत में थी ही नहीं। मामले में लापरवाही देखते हुए पटना हाईकोर्ट ने एसएचओ, एसडीपीओ और इन्वेस्टिगेटिव ऑफिसर को सस्पेंड करने का आदेश दिया और मुझे बाइज्जत बरी कर दिया। जब मैं जेल से निकलकर घर आया, तो पापा रोते हुए बोले- मुझे तो लगा था कि अब तुम कभी नहीं निकल पाओगे। ऐसा लग रहा था कि एक बेटे से हाथ धो लिया। आज भले ही जेल से बाहर आ गया हू्ं, लेकिन मेरा सब कुछ बर्बाद हो गया है। जिस लड़का-लड़की का मामला था, उनकी तो अलग-अलग जगह शादी हो गई है और मैं बर्बाद हो गया। मेरा जेल में 5 साल बर्बाद हो गया। मेरी जमीनें बिक गईं। पापा का सब काम-धंधा चौपट हो गया। 10 लाख रुपए का कर्ज है। मेरे 5 साल कौन लौटाएगा? जिस उम्र में मैं कुछ बनता। नौकरी-चाकरी करता, उस उम्र में फर्जी मुकदमे में जेल चला गया…। मैंने सरकार से मुआवजा देने की मांग की है। मेरा एक कमरे का मकान है। जितना पैसा मुकदमे में फूंका, उतने में तो एक घर आबाद हो जाता। अब बहन की शादी करनी है। ये सारी चीजें सोच-सोचकर आज नींद नहीं आती। खैर… भगवान ऐसी दोस्ती किसी को न दें। दिनेश की दोस्ती ने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी। मैं जिंदा होते हुए भी मरा हुआ महसूस करता हूं। अब कुछ दिनों से मां-बाप को देख पा रहा। फिर से उठ खड़ा होने की कोशिश कर रहा हूं। (मुकेश कुशवाहा ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर नीरज झा से साझा किए हैं) ————————————————– 1- संडे जज्बात-रिश्तेदार की लाश लेकर आया, मेरे गाल छूने लगा:लाशें जलाने के कारण शादी नहीं हुई- पति के बिना जी लूंगी, लाशों के बिना नहीं मैं टुम्पा दास- पश्चिम बंगाल में डोम समुदाय की पहली महिला हूं, जो पिछले कई सालों से कोलकाता के बड़िपुर गांव के श्मशान में लाशें जला रही हूं। पता नहीं भारत में कोई और महिला यह काम करती है या नहीं, पर मैंने यही रास्ता चुना… और यह रास्ता आसान नहीं था। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-मैं मुर्दा बनकर अर्थी पर भीतर-ही-भीतर मुस्कुरा रहा था:लोग ‘राम नाम सत्य है’ बोले तो सोचा- सत्य तो मैं ही हूं, थोड़ी देर में उठकर साबित करूंगा मेरा नाम मोहनलाल है। बिहार के गयाजी के गांव पोची का रहने वाला हूं। विश्व में शायद अकेला ऐसा इंसान हूं, जिसने जिंदा रहते अपनी शव यात्रा देखी। यह बात चंद करीबी लोगों को ही पता थी। मरने का यह सारा नाटक किसी खास वजह से किया गया था। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
संडे जज्बात-दोस्त की प्रेमिका प्रेग्नेंट हुई, रेप केस मुझपर चला:पंचायत ने 6 लाख में सौदा किया- 5 साल जेल रहा, अब बाइज्जत बरी
📅 Published: December 28, 2025 |
📂 Category: India National
