मैं टुम्पा दास- पश्चिम बंगाल में डोम समुदाय की पहली महिला हूं, जो पिछले कई सालों से कोलकाता के बड़िपुर गांव के श्मशान में लाशें जला रही हूं। पता नहीं भारत में कोई और महिला यह काम करती है या नहीं, पर मैंने यही रास्ता चुना… और यह रास्ता आसान नहीं था। हर दिन यहां छह-सात लाशें आती हैं। कई चेहरे भूल जाती हूं, लेकिन कुछ चेहरे दिमाग में घर कर जाते हैं। एक दिन एक छोटी-सी बच्ची की लाश मेरे सामने लाई गई, उस पल को याद कर आज भी कांप जाती हूं। उस दिन चिता जलाते वक्त मेरा हाथ थरथरा गया था। यहां कई बार मेरे साथ बदतमीजी हुई। एक शख्स ने मेरा फोन नंबर मांगा और बेहिचक कहा- ‘मेरे साथ चलो… बिस्तर पर।’ दूसरे ने बिना इजाजत मेरा गाल छू लिया। उस दिन श्मशान की आग से ज्यादा, मेरे अंदर की आग भड़क उठी- और बवाल इतना कि सब देखते रह गए। इसी तरह इस काम की कालिख मैंने चेहरे पर नहीं, किस्मत पर भी झेली। लाशें जलाने के कारण मेरी शादी नहीं हो पाई। लोग कहते- ‘ऐसी औरत को हम बहू नहीं बनाएंगे।’ मैंने दुनिया की तिरछी नजरें, गंदी बातें और अकेलापन सब झेला… लेकिन इस काम को नहीं छोड़ा। दरअसल, पिता की चिता बुझी भी नहीं थी कि जीवन ने मेरे सामने एक और आग रख दी- श्मशान में डोम का खाली पड़ा काम। 2014 था वह साल, जब घर में रोटी के लिए भी जद्दोजहद थी। श्मशान की देखभाल करने वाले लोग हमारी हालत जानते थे। उन्होंने एक दिन कहा- ‘टुम्पा, यह काम संभाल ले… वर्ना घर कैसे चलेगा?’ उनकी बात सुनकर मेरे अंदर कुछ टूट भी गया और कुछ जाग भी उठा। मैंने बिना सोचे ‘हां’ कह दिया। तब नहीं जानती थी कि यह ‘हां’ मेरे खिलाफ पूरे गांव की दीवार बना देगी। लोगों ने मुझे ताने मारे, आंखें तरेरीं, बातें उड़ाई- ‘लड़की होकर डोम का काम करेगी? श्मशान का काम करेगी?’ मैं खुद से पूछती- अगर लड़के ये काम कर सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं? आखिर सोचिए जरा, मौत की राख में औरत-मर्द का फर्क बचता ही कहां है? मैंने तय कर लिया कि लाश जलाऊंगी। जब मां को बताया, तो वह डर गईं। कहने लगीं- ‘लोग तुझे इस काम के लिए कभी स्वीकार नहीं करेंगे। तू भारी लकड़ियां भला कैसे उठाएगी? चिता कैसे सजा पाएगी?’ उनका डर जायज था, लेकिन मेरी मजबूरी उससे भी बड़ी। मैंने मां का हाथ पकड़ा और कहा- ‘एक बार यह काम करने दो, मां… हमारे पास जिंदा रहने का कोई और रास्ता नहीं है।’ दरअसल, उस वक्त बतौर नर्स मुझे सिर्फ 4,000 रुपए मिलते थे। उसमें से आधा रास्ते में खत्म हो जाता था। चार लोगों का गुजारा 2,000 रुपए में कैसे होता? बहुत समझाने के बाद मां का चेहरा पिघला, और उसी दिन मैंने तय कर लिया कि चाहे कितनी ही बातें बनें, मैं पीछे नहीं हटूंगी। जिस दिन पहली बार चिता के सामने खड़ी हुई, उस दिन मुझे शव से नहीं, दुनिया की नजरों से डर लग रहा था। मेरी उम्र तब सिर्फ 22 साल थी- एक ऐसी उम्र, जब ज्यादातर लड़कियां कॉलेज, सपनों या किसी नई नौकरी में होती हैं, लेकिन मैं उस सुबह श्मशान में खड़ी थी, हाथों में लकड़ियां और सिर पर दुनिया की अनगिनत निगाहों का बोझ लिए। सुबह के ठीक 10 बजे पहला शव आया। दिल में एक अजीब सी कंपकंपी थी। डर शव का नहीं था… लोगों की उस फुसफुसाहट का था, जो मेरे पीछे लगातार दौड़ रही थी- ‘लड़की है… कैसे करेगी चिता का काम?’ शुरुआत में मां भी साथ आती थीं। उन्होंने पिता को यह काम करते देखा था- हर रस्म, हर तकनीक, लकड़ी रखने का सही तरीका। चिता सजाते वक्त वह धीरे से समझातीं- ‘चिता सजाना आसान नहीं है…’ मैं सीख रही थी। हाथों पर छाले पड़ते, धुएं से आंखें जलतीं, पर दिल में बस एक ही बात थी- घर चलाना है… हार नहीं माननी। लेकिन असली आग तो लोग लगाते थे। जब भी कोई शव लेकर आता और देखता कि चिता एक लड़की सजा रही है- वे हाथ के इशारे से मुझे रोक देते। ‘न-न… तुमसे नहीं होगा। हम खुद कर लेंगे।’ कुछ लोग तो यह मानते थे कि औरत के हाथों से जली चिता से आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। हर बार ऐसा होता, और हर बार मैं घर लौटकर फूट-फूटकर रोती। ‘अगर ये यूं ही चलता रहा… तो नौकरी भी चली जाएगी… और इज्जत भी,’ यही सोचकर रातें कटीं। गांव की गलियों में तो लोग मुझे देखकर रास्ता बदलने लगे। औरतें अपने बच्चे खींचकर पास से हटा लेतीं। कहतीं- ‘वो डोम का काम करती है… अब अछूत हो गई है।’ कुछ गांव वाले समझाने भी आते- ‘तू लड़की है, कैसे करेगी ये काम? रात-रात भर ड्यूटी लगती है… अगर कोई शराब पी कर आ गया, या किसी की नीयत खराब हो गई, तब?’ उनकी बातों से दिल रोता था… पर हाथ नहीं रुके। धीरे-धीरे, साल बीते…लकड़ियों का बोझ उठाते-उठाते मेरे कंधे मजबूत हो गए। और लोगों का अपमान सहते-सहते दिल भी। फिर एक दिन अचानक कुछ बदल गया- लोग पूछने लगे, ‘बिटिया, आज कौन-सी लकड़ी बढ़िया रहेगी?’ ‘चिता कैसे जमानी है?’ मुझे स्वीकार कर लिया गया। जब इस काम में हाथ जमने लगा, तभी असली डर सामने आया- वही जिसकी सालों से लोग फुसफुसाकर चेतावनी देते थे। एक दिन मैं चिता सजा रही थी। एक आदमी मदद के बहाने मेरे पास आया। कुछ क्षण बाद- धीरे से वह मेरा गाल छूने लगा। उसके स्पर्श ने जैसे मेरे भीतर आग भड़का दी। मैंने उसका हाथ झटके से पकड़ा और पूरी ताकत से चिल्लाई। ‘बाहर निकलो यहां से!’ श्मशान की दीवारें भी जैसे मेरी आवाज से कांप उठीं। वह लड़खड़ाता हुआ श्मशान से बाहर चला गया। लाश जल जाने के बाद मैंने उसे दोबारा बुलाया और खूब खरी-खोटी सुनाई। उस दिन उसके रिश्तेदारों ने भी उसे खूब डांटा। लेकिन यह अकेली घटना नहीं थी। कुछ लोग शराब पीकर आते हैं- और नशे में उनका असली चेहरा दिख जाता है। एक दिन लाश के साथ एक शराबी आया था। वह मुझसे मेरा फोन नंबर मांगने लगा। बहुत बुरा लगा। मैंने कहा- ‘क्या समझते हो खुद को? मैं लड़की हूं, गरीब हूं, लेकिन मेहनत करके खाती हूं… किसी की रहम पर नहीं जिंदा हूं।’ लेकिन सबसे गंदी घटना तो वह थी, जिसे आज भी सोचकर गुस्सा आता है। एक शव आया था और उसके साथ आने वालों में एक आदमी ने उस दिन मेरी तरफ पैसे आगे बढ़ाए और इशारे में कहा- ‘आज मेरे साथ चलो… ज्यादा पैसे दूंगा। यहां कितना मिलता होगा?’ उस पल मेरा खून उबला। गुस्से में चिल्लाई- ‘मेरी मजबूरी का फायदा उठाना चाहते हो? यहां से दफा हो जाओ!’ श्मशान में ऐसे लोग अक्सर आते हैं। हर लाश के साथ एक नई कहानी, एक नया इम्तिहान। लेकिन आज… मैं वैसी लड़की नहीं हूं जो चुपचाप सब सह लूं। बदतमीजी, अब एक सेकेंड बर्दाश्त नहीं करती। उसी वक्त श्मशान से बाहर करती हूं। कई बार यह देखकर बड़ा अफसोस होता है कि कुछ लोग पिता की लाश लेकर आते हैं और उनकी प्रॉपर्टी में हिस्से के लिए श्मशान पर ही झगड़ने लगते हैं। वह सब देखकर कई बार तो इस दुनिया से नफरत हुई। सोचती हूं कि आखिर सबको एक दिन यहीं आना है। लेकिन कुछ लाशें भारी लगती हैं… जो बिना उम्र की सांसें पूरी किए आ जाती हैं। उस वक्त श्मशान में आने वाले हर चेहरे पर एक अलग ही टूटन होती है- किसी की आंखें पथराई होती हैं, तो किसी का गला सूख जाता है। मैं रोज यह सब देखती हूं। कुछ शव ऐसे आते हैं, जिन्हें देखते ही दिल बैठ जाता है। लगता है- ‘इसकी उम्र ही क्या थी। ऐसे परिवारों से मैं आज भी बख्शीश नहीं ले पाती। हाथ अपने-आप रुक जाते हैं। लेकिन एक दिन…एक लाश ने मुझे बिल्कुल तोड़ दिया। वह एक छोटी बच्ची थी। इतनी प्यारी, इतनी सुंदर- जैसे नींद में हो और किसी भी पल आंखें खोल देगी। जब मैं उसकी चिता सजाने लगी, तो मेरे हाथ कांपने लगे। 10 साल के काम में ऐसा कभी नहीं हुआ था। मुझे लग रहा था- ‘अभी उठ जाएगी…’ उस दिन मैं चिता के पास खड़ी-खड़ी रो रही थी। अगर उस रात भगवान सचमुच सामने खड़े होकर मुझसे एक वरदान मांगने को कहते, तो मैं बिना सोचे कह देती- ‘इस बच्ची की जिंदगी लौटा दो…’ वह दिन, वह चेहरा… वह नन्हा सा शरीर- आज भी मेरे भीतर कहीं जलता रहता है। यही मेरा रोज की जिंदगी है- लाशें आती हैं, और मैं उन्हें विदा करती हूं। सुबह 8 बजे से शाम 7 बजे तक वही आग, वही राख, वही आखिरी यात्रा। इस तरह श्मशान में आग तो हर दिन जलती है, पर कुछ लाशें…सालों बाद भी नहीं बुझती। यही नहीं, लाशों की आग ने मेरी जिन्दगी को मोड़ दिया। इस आग की वजह से मेरी शादी नहीं हुई। मां ने कितनी कोशिशें कीं- रिश्ते देखे, समझाया, मनाया। लोग आते, मुस्कुराते, फिर जैसे ही पता चलता कि मैं महिला होकर लाश जलाती हूं तो वे शादी से पलट जाते। मां जब कारण पूछतीं, तो वही सुनतीं- ‘श्मशान में काम करने वाली लड़की को हम बहू नहीं बनाएंगे।’ हर बार यह बातें सुनकर मैं चौंक जाती। सोचती- आखिर लोग डोम के साथ रात बिता सकते हैं, लेकिन उसे जीवन साथी नहीं बना सकते। वर्षों तक यह सिलसिला चलता रहा। आखिरकार मेरा शादी से मोह ही खत्म हो गया। मैंने कसम खा ली- डोम का काम नहीं छोड़ूंगी। चाहे शादी हो या न हो। आखिर, यही वह काम था, जिसने मुझे और मेरे परिवार को संभाला, बुरे वक्त में सहारा दिया। किसी आदमी के लिए तो मैं इसे नहीं छोड़ सकती। अब यह काम मेरा जीवन बन गया है। लाशों के साथ काम करते हुए मुझे सुकून मिलता है। तय कर लिया है- पति के बिना जिंदगी बिता लूंगी, लेकिन लाशों के बिना नहीं। लाशें शिकायत नहीं करतीं। जैसे भी जलाओ, पलटकर जवाब नहीं देतीं। उन्हें पता नहीं होता कि उनके साथ क्या हो रहा है। हां, अब जब अपने काम से मशहूर हो गई हूं तो शादी के रिश्ते आने लगे हैं, लेकिन साफ मना कर देती हूं- ‘जब जरूरत थी तब तो किसी ने साथ नहीं दिया, अब शादी नहीं करूंगी।’ और मैं… जमाने की शिकायतों से इतना थक चुकी हूं कि कई बार मन करता है- जिस आग को इतने सालों से जलाती आई हूं, एक दिन उसी में समा जाऊं। दरअसल, इस कहानी की शुरुआत 2014 से हुई थी। मेरे पापा इसी श्मशान में लाश जलाते थे। वो दिन आज भी आंखों के सामने है। उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई और वह हमारे बीच नहीं रहे। उस वक्त मैं बड़िपुर से बाहर एक नर्सिंग होम में काम कर रही थी। जितने पैसे मिलते, उनमें से आधा तो बस आने-जाने में ही खर्च हो जाते। पापा के गुजरने के बाद तो घर मेरे लिए हर दिन एक नई लड़ाई बन गया। हमारे पास खाने के लिए सिर्फ दो किलो चावल बचा था। दो महीने के भीतर मां भी बिस्तर पर पड़ गईं- बीपी और डायबिटीज ने उन्हें जकड़ लिया। बड़ी बहन, जो तलाकशुदा और प्रेग्नेंट थी, घर में ही रहती थीं। और मैं… मैं अचानक पूरे घर की जिम्मेदारी अपने कंधों पर महसूस कर रही थी। पापा थे तो कोई मुश्किल नहीं आती थी। उनके बिना हर चीज अधूरी लगती है। वे जितना कमाते, हमारे खाने-पीने और खुशियों में लगा देते। भात, चिकन, मछली, फल- लगभग हर दूसरे-तीसरे दिन। कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी। लेकिन, लाश जलाने के कारण गांव में पापा को सम्मान नहीं मिलता था। इस वजह से उन्होंने मुझसे एक दिन कहा- ‘बेटी, नर्स बनो। पढ़ाई में मन लगाओ, इससे तुम्हारी और हमारे परिवार की इज्जत बढ़ेगी।’ मैंने उनकी बात मानी, दिन-रात मेहनत की और आखिरकार नर्स बन गई। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। मैं कभी नहीं सोच सकती थी कि एक दिन मुझे अपने पापा का ही काम करना पड़ेगा। वही श्मशान, वही आग, वही चिता… और उन्हीं की राह पर चलने को मजबूर। (टुम्पा दास ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए हैं।) ———————————————— 1-संडे जज्बात-मैं मुर्दा बनकर अर्थी पर भीतर-ही-भीतर मुस्कुरा रहा था:लोग ‘राम नाम सत्य है’ बोले तो सोचा- सत्य तो मैं ही हूं, थोड़ी देर में उठकर साबित करूंगा मेरा नाम मोहनलाल है। बिहार के गयाजी के गांव पोची का रहने वाला हूं। विश्व में शायद अकेला ऐसा इंसान हूं, जिसने जिंदा रहते अपनी शव यात्रा देखी। यह बात चंद करीबी लोगों को ही पता थी। मरने का यह सारा नाटक किसी खास वजह से किया गया था। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-फौजी विधवा की 8 साल के देवर से शादी:मैं मेजर जनरल थी, उसकी बात सुनकर कांप गई; मन करता है कैसे भी उससे मिल लूं अस्पताल में इलाज के दौरान एक युवा सिपाही की मौत हो गई। वह शादीशुदा था और उसकी विधवा पत्नी की उम्र लगभग 22 साल थी। सिपाही की मौत के बाद एक दिन उसकी पत्नी रोते हुए मेरे पास आई। कहने लगी कि मुझे बचा लीजिए। मेरे ससुराल वाले और मायके के लोग मेरी शादी देवर से कराने जा रहे हैं। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
संडे जज्बात-रिश्तेदार की लाश लाया था, मेरे गाल छूने लगा:मैं लाशें जलाती हूं- लाशों से डर नहीं लगता, वे पलटकर जवाब नहीं देतीं
📅 Published: December 7, 2025 |
📂 Category: India National
