‘अगर हम ही बांग्लादेशी हैं तो पहले दिन ही क्यों नहीं उजाड़ दिया? हिंदुओं को टारगेट क्यों नहीं करते? बस हमें मुसलमान होने की वजह से निशाना बनाया जा रहा है। अगर इतनी ही नफरत है, तो एक गोली मारकर खत्म कर दो न। कम से कम ऐसी जिल्लत तो नहीं देखनी पड़ेगी। कम से कम बेघर होकर सड़क पर मरने-जीने की नौबत नहीं आएगी न।’ असम में नागांव जिले के लुटीमारी इलाके में रहने वाली रुबीना बेगम (बदला हुआ नाम) के घर 29 नवंबर को बुलडोजर चलाया गया। इस इलाके में करीब 1,700 परिवार रहते थे। रुबीना बेगम की तरह ही बाकी लोग भी प्रशासन की कार्रवाई से नाराज हैं। प्रशासन का कहना है कि बुलडोजर फॉरेस्ट के लिए रिजर्व 795 हेक्टेयर जमीन से अतिक्रमण हटाने के लिए चलाया गया है। जबकि लोग आरोप लगा रहे हैं कि सिर्फ बांग्ला भाषी मुसलमानों के घर गिराए गए। सरकारी जमीन पर बने हिंदुओं और ईसाई के घर को हाथ भी नहीं लगाया। अब प्रशासन ने बेघर हुए लोगों को कहीं बसाने का भी इंतजाम नहीं किया। असम में बुलडोजर कार्रवाई का ये पहला मामला नहीं है। 2016 में BJP के सत्ता में आने के बाद से सरकारी जमीन खाली कराने की कई कार्रवाइयों पर भेदभाव के आरोप लगते रहे हैं। असम राजस्व विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, बीते 9 साल में राज्य में करीब 17,600 परिवारों को सरकारी जमीन से हटाया गया। इनमें ज्यादातर मुस्लिम ही थे। असम में सरकारी जमीन खाली कराने को लेकर पिछली कई बुलडोजर कार्रवाई पर भेदभाव के आरोप क्यों लग रहे हैं? असम सरकार का इस मामले पर क्या कहना है? ये समझने के लिए दैनिक भास्कर की टीम ग्राउंड पर पहुंची। सबसे पहले उस इलाके का हाल, जहां कार्रवाई हुई
असम की राजधानी गुवाहाटी से 120 किलोमीटर दूर नागांव जिला है। लगभग 35 लाख आबादी वाला नागांव मुस्लिम बहुल जिला है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, यहां करीब 55% मुस्लिम आबादी है। 29 और 30 नवंबर को जिले के कामपुर उपखंड में आने वाले लुटीमारी इलाके में प्रशासन ने बुलडोजर चलाया। 3 दिसंबर को जब हमारी टीम इलाके में पहुंची, तब कई घरों का मलबा पड़ा मिला। जगह-जगह ईट पत्थरों का ढेर था, जहां टूटे पड़े चूल्हे और रोजमर्रा में इस्तेमाल का सामान बिखरा था। इलाके में सन्नाटा पसरा हुआ था। नागांव प्रशासन ने तीन महीने पहले सितंबर में ही इन परिवारों को नोटिस देकर इलाका खाली करने के लिए कहा था। शुरुआत में दो महीने का समय दिया गया, लेकिन स्थानीय लोगों की अपील पर प्रशासन ने एक महीने का वक्त और बढ़ा दिया। 29 नवंबर को जब भारी पुलिस बल के साथ नागांव प्रशासन जमीन खाली कराने पहुंचा, तब तक लगभग 1100 से ज्यादा परिवार खुद ही घरों को तोड़कर वहां से जा चुके थे। वहीं बाकी के मकान 29 और 30 नवंबर को प्रशासन ने ढहा दिए। सीएम बोले- JCB सबका बदला लेगा
नागांव में हुई कार्रवाई के बाद 30 नवंबर को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट किया। कैप्शन में लिखा था- ‘बांस का, होलोंग का, सिमुल का, सबका बदला लेगा तेरा JCB! लुटीमारी रिजर्व फॉरेस्ट में JCB ऐसे घुसी जैसे कोई पर्सनल दुश्मनी हो और 1,441 गैर-कानूनी स्ट्रक्चर हटा दिए। कोई हंगामा नहीं। कल ये आखिरी 13 घरों और सुपारी के बागों के लिए वापस आएगा।‘ ‘हम बांग्लादेशी तो इतने साल रहने क्यों दिया’
इस कार्रवाई को लेकर लोग नाराज हैं। रुबीना बेगम कहती हैं कि वे कई सालों से यहीं रह रही हैं। रुबीना का दावा है कि वे बंगाली मुस्लिम नहीं बल्कि असमिया मुसलमान ही हैं। वे कहती हैं, ‘उन्होंने हमें इतने सालों तक क्यों रहने दिया? क्यों बिजली-पानी की सुविधा दी? क्यों राशन कार्ड दिया? क्यों वोटर कार्ड बनवाया? आधार कार्ड क्यों दिया? बैंक अकाउंट क्यों खुलवाया?‘ ‘क्या मैं असम की नागरिक नहीं? हमें बांग्लादेशी कह देते हैं। अगर यहां कोई बांग्लादेशी है तो मैं खुद उन्हें पकड़वाने में मदद करूंगी।’ रुबीना की तरह कई और भी लोग हैं, जो दावा करते हैं कि वे इस जमीन पर बीते 50 से 60 सालों से रह रहे थे, लेकिन अब अचानक प्रशासन ने उन्हें हटा दिया। 40 साल के करीम (बदला हुआ नाम) दावा करते हैं, ‘मेरा जन्म यहीं हुआ था। सिर्फ मुसलमान होने की वजह से हमारे साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है।’ वे BJP और कांग्रेस दोनों पर राजनीति का आरोप लगाते हुए कहते हैं, ‘सिर्फ राजनीति के कारण दोनों सियासी दल हमें फुटबॉल की तरह इधर से उधर लात मार रहे हैं।‘ करीम आगे कहते हैं, ‘हमारा घर-बार बर्बाद हो चुका है। कुछ लोग खेतों में तो कुछ पेड़ों के नीचे रहने को मजबूर हैं। हम भी एक कैंप लगाकर रह रहे थे, लेकिन प्रशासन ने आकर उसे भी जला दिया। खाने-पीने तक का कोई जुगाड़ नहीं है। हम छोटे-छोटे बच्चों को गोद में लिए भटक रहे हैं।‘ वे सरकार से पुनर्स्थापना की मांग करते हुए कहते हैं, ‘हम यहीं पैदा हुए और जिंदगी भर यहीं रहे। सरकार से गुजारिश है कि वह जांच करे कि कहीं और हमारी जमीन है या हम भूमिहीन हैं। इसके साथ ही हमारी नागरिकता का फैसला भी कर दे।‘ सील-छाप मारकर बांग्लादेश भेज दो, छत तो मिल जाएगी
आइशा (बदला हुआ नाम) भी कार्रवाई के बाद लोगों को कहीं और नहीं बसाए जाने से नाराज हैं। वे कहती हैं, ‘अगर हम बांग्लादेशी ही हैं तो थप्पड़ मारकर, गाली देकर, सील-छाप मारकर बांग्लादेश भेज दो। कम से कम वहां तो कोई छत मिल जाएगी। यहां तो इंसानियत भी नहीं बची है।‘ आइशा भी असम के CM हिमंत बिस्व सरमा से कहीं और बसाने की अपील करती हैं। वे कहती हैं, ‘अगर हमने गलती की, अवैध कब्जा किया तो हमें उजाड़ दो, लेकिन अब हमें बसाओ भी। आज यहां बेघर हुई प्रेग्नेंट महिलाएं हैं। छोटे-छोटे बच्चे और बूढ़े मां-बाप हैं। आखिर अब ये लोग कहां जाएंगे। हम सड़क पर आ गए हैं। पेड़ों के नीचे आसरा लिए हुए हैं। असम में क्या अब हम इंसान की तरह जी भी नहीं सकते।‘ NRC भी हुआ, लेकिन फिर भी घर तोड़ दिया
साइबेआलम (बदला हुआ नाम) को बच्चों की पढ़ाई की चिंता है। वे कहते हैं कि उन्हें सभी सरकारी सुविधाएं मिल रही थीं। सरकार ने इंदिरा आवास योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी हर सुविधा दी। स्कूल, पानी का कनेक्शन और बिजली का कनेक्शन भी दिया। अब अचानक बेघर होने के चलते बच्चों की पढ़ाई नहीं हो पा रही है। वे कहते हैं, ‘अभी हम अपने बच्चों को लेकर जानवरों की तरह रह रहे हैं। न पीने के लिए पानी है और न खाने का कोई इंतजाम। हमारे बच्चे शिक्षा के अधिकार तक से भी वंचित हो रहे हैं। अगर हम भारतीय हैं, तो हमें फिर से क्यों नहीं बसाया जा रहा है?‘ साइबेआलम दावा करते हैं कि उनका NRC भी इसी जमीन का हुआ था, लेकिन फिर भी उनके साथ अन्याय हुआ है। AIUDF विधायक बोले- मदद भी नहीं करने दे रहा प्रशासन
3 दिसंबर को नागांव के धींग विधानसभा क्षेत्र से AIUDF विधायक अमीनुल इस्लाम भी लुटीमारी पहुंचे। वे पहलगाम हमले के बाद विवादित बयान को लेकर NSA की धाराओं में जेल जा चुके हैं। 28 नवंबर को ही उन्हें रिहाई मिली है। वे लुटीमारी में बेघर हुए लोगों से बात करने पहुंचे थे। अमीनुल कहते हैं कि ठंड में लोगों को कोई मदद नहीं मिल रही। कहीं शरण लें तो पुलिस पिटाई कर देती है। रात को तारपोलिन से आश्रय लेने पर आग लगा दी जाती है। सरकार ने इन्हें जिंदा मारने के इरादे से छोड़ दिया है। किसी ने इंसानियत के नाम पर चावल लाने की कोशिश की तो उसे गिरफ्तार कर लिया गया। अमीनुल दावा करते हैं कि लुटीमारी का इलाका 1972 से डी-रिजर्व्ड फॉरेस्ट घोषित था। इसके बाद ही लोग यहां बस गए। पिछली सरकार ने इसे फिर से रिजर्व फॉरेस्ट घोषित कर दिया, जबकि लोग पहले से ही यहां रह रहे थे। वे आगे कहते हैं, ‘ये लोग भारतीय नागरिक हैं। आजादी से पहले से ही असम में रह रहे हैं। उनके पास दस्तावेज मौजूद हैं, यहां एक भी बांग्लादेशी नहीं है, लेकिन सरकार मुसलमानों को संदिग्ध बताकर अत्याचार कर रही है।’ अतिक्रमण के नाम पर बांग्ला भाषी मुसलमानों पर कार्रवाई
नागांव के सोशल एक्टिविस्ट इस्लाम काजी भी कार्रवाई में भेदभाव होने की बात करते हैं। वे कहते हैं कि लुटीमारी के आस-पास कई गांव फॉरेस्ट रिजर्व में आते हैं। यहां ज्यादातर हिंदू और कुछ ईसाई परिवार रहते हैं। इसीलिए इन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। वे कहते हैं, ’असम में सरकारी जमीन खाली कराने के नाम पर सिर्फ बांग्ला भाषी मुसलमानों के घरों पर कार्रवाई हो रही है। नागांव, सोनापुर, गोलपारा, होजाई जैसी कितनी जगहों पर बीते कुछ सालों में कार्रवाई की गई। सभी जगह धर्म देखकर ही कार्रवाई हो रही है।’ असम के CM हिमंत पर आरोप लगाते हुए काजी कहते हैं, खुद मुख्यमंत्री बांग्ला भाषी मुसलमानों को मियां (स्लैंग) मुसलमान बोलते हैं। वे मंच से इन कार्रवाइयों को सही ठहराते हैं। असम में 38 से 40% मुस्लिम आबादी है, लेकिन हिमंत सरकार चाहती है कि ये आबादी डर के साए में रहे। काजी सरकार पर विरोध की आवाज दबाने का भी आरोप लगाते हैं। वे कहते हैं, ’इन बुलडोजर कार्रवाइयों में लगातार मानवाधिकारों का हनन हो रहा है। विरोध करने वालों पर सरकार झूठे केस लगाकर दबाने की कोशिश करती है। काजी गुवाहाटी हाईकोर्ट पर भी सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं, ’अर्जी लगाने पर कोर्ट इन कार्रवाई को सही ठहरा देता है। हालांकि कोर्ट ने कहा है कि लोगों के लिए दूसरी जगह रहने का इंतजाम किया जाए, मगर असम सरकार ये नहीं कर रही। हमें सरकारी जमीन खाली कराने से दिक्कत नहीं है, लेकिन सिर्फ मुसलमानों को बेदखल किया जाना और दूसरी जगह न देना गलत है।’ प्रशासन बोला- फॉरेस्ट रिजर्व एरिया में कोई भी कब्जा अवैध
लोगों के आरोपों को लेकर हमने लोकल प्रशासन से बात करने की कोशिश की। लुटीमारी कामपुर सर्किल ऑफिस में आता है। कामपुर सर्किल ऑफिसर अनन्या लाहकर से हमने बात करने की कोशिश की। उन्होंने हमारा कॉल नहीं उठाया और मैसेज का भी जवाब नहीं दिया। हालांकि सर्किल ऑफिस में एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बात की। उन्होंने बताया, ‘लगभग 1,700 परिवारों ने कई सालों से आरक्षित 5,962 बीघा वन भूमि पर कब्जा कर रखा था। इन परिवारों ने धीरे-धीरे इकोलॉजिकली सेंसिटिव जोन में बस्तियां बना लीं। फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के नोटिस के बाद भी लोग हटने को तैयार नहीं थे।’ कार्रवाई में धर्म के आधार पर भेदभाव के आरोपों को अधिकारी गलत बताते हैं। वे दावा करते हैं कि बिना किसी भेदभाव के कब्जा करने वालों पर कार्रवाई की गई। फॉरेस्ट रिजर्व एरिया के अंदर किसी भी तरह का कब्जा अवैध माना जाता है। BJP बोली- घुसपैठियों को कांग्रेस ने बसाया
असम सरकार पर मुस्लिम विरोधी कार्रवाई के आरोपों को लेकर हमने डिप्टी स्पीकर नुमल मोमिन से बात की। वे जमीन खाली कराने की कार्रवाई को जायज ठहराते हैं। वे कहते हैं कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करने वालों को हटाना पूरी तरह न्यायोचित है। सरकार के रुख को लेकर नुमल मोमिन कहते हैं, ‘संदिग्ध तत्वों और बाहरी घुसपैठियों को असम के किसी भी हिस्से में बसने की अनुमति नहीं दी जाएगी। CM हिमंत ने ये साहसी कदम उठाया है, जो चुनाव के बाद भी जारी रहना चाहिए। असम की जनता ने हमें वोट देकर सत्ता सौंपी है, ताकि हम जमीन की रक्षा करें और ये कदम जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप ही है।‘ नुमल मोमिन मानते हैं कि ये कदम बहुत पहले उठाया जाना चाहिए था, लेकिन देर से आए दुरुस्त आए। दस्तावेजों और सरकारी सुविधाओं के सवाल पर नुमल मोमिन कहते हैं, ‘ये लोग सरकारी जमीन पर ही अतिक्रमण करके बैठे थे। जो सुविधाएं उन्हें मिलीं, वे कांग्रेस सरकार की नीतियों का नतीजा हैं। कांग्रेस का मकसद असम को इस्लामिक स्टेट में बदलना था, इसलिए बांग्लादेश से आए घुसपैठिए मुसलमानों को जमीन, दस्तावेज और सुविधाएं देकर बसाया गया।‘ नागांव में पहले भी बंगाली मुस्लिमों के घरों पर बुलडोजर चला
नागांव में इससे पहले भी बड़ी बुलडोजर कार्रवाई हो चुकी हैं। फरवरी 2023 में नागांव जिले के बुरहा चापोरी वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में दो दिनों तक कार्रवाई हुई। तब भी आरोप लगे थे कि सिर्फ 2,500 से ज्यादा बंगाली मुस्लिम परिवारों के घरों, आंगनवाड़ी केंद्रों और स्कूलों को ध्वस्त किया गया। 19 दिसंबर 2022 को बटद्रवा में करीब 500 परिवारों के घरों, स्कूलों और मस्जिदों पर बुलडोजर चला। यहां भी बंगाली मुस्लिम परिवारों पर कार्रवाई करने के आरोप लगे थे।
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ये खबर भी पढ़ें… कैसे ढह गया इंडिगो का सिस्टम, क्राइसिस की इनसाइड स्टोरी ‘मैं करीब 10 साल से एयरलाइन इंडस्ट्री में काम कर रहा हूं। आज तक इतना बड़ा संकट नहीं देखा। मुझे लगता है कि इंडिगो की दिक्कत किसी दूसरे की नहीं, बल्कि कंपनी की खुद की बनाई हुई है। मैंने अपने कई साथी पायलट से भी बात की, तब इस नतीजे पर पहुंचा हूं।’ 34 साल के पायलट कैप्टन रोहित सक्सेना (बदला हुआ नाम) एयरलाइन कंपनी इंडिगो में 3 साल से काम कर रहे हैं। रोहित को 5 हजार फ्लाइंग अवर्स का अनुभव है। पढ़िए पूरी खबर…
‘सिर्फ मुसलमानों के घर तोड़े, अब हमें गोली मार दो‘:बंगाली मुस्लिमों पर बुलडोजर एक्शन सवालों में, हिंदुओं-ईसाइयों को क्यों छोड़ दिया
📅 Published: December 12, 2025 |
📂 Category: India National
