सेक्स वर्कर्स बोलीं- मम्मी-पापा के डॉक्यूमेंट कहां से लाएं:SIR के बाद हमें बांग्लादेशी कहकर भगा देंगे, चुनाव आयोग बताए हम क्या करें

📅 Published: December 11, 2025 | 📂 Category: India National

‘मैं सेक्स वर्कर हूं। मां भी यही काम करती थीं। अब्बू बिहार में रहते थे। मैं छोटी थी, तभी उनका इंतकाल हो गया। मां की उम्र अब 85 साल है। वे 16-17 साल की थीं, जब पश्चिम बंगाल आ गई थीं। बीएलओ SIR के फॉर्म भरवाने घर आ रहे हैं। हमारे पास वोटर आईडी और आधार कार्ड है, लेकिन उन्हें 2002 के डॉक्युमेंट चाहिए। हमारे पास तो नहीं हैं। पता नहीं क्या होगा, शायद हमें बांग्लादेशी कहेंगे और भगा देंगे।’ पश्चिम बंगाल में आसनसोल के लच्छीपुर में रहने वालीं फातिमा आखिरी की दो लाइनें हंसते हुए कहती हैं। हालांकि उनकी हंसी अगले ही पल गायब हो जाती है। फातिमा का घर लच्छीपुर की एक तंग गली में है। परिवार में मां और दो बेटियां हैं। उनकी फिक्र वोटर लिस्ट से नाम कटने को लेकर है। डर है कि ऐसा हुआ तो सरकारी सुविधाएं मिलनी बंद हो जाएंगी और उन्हें घुसपैठिया बता दिया जाएगा। पश्चिम बंगाल में SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की आज आखिरी तारीख है। सेक्स वर्कर्स का डर एक नियम की वजह से है। दरअसल, वोटर लिस्ट अपडेट करने की प्रक्रिया में 2002 की वोटर लिस्ट को आधार बनाया गया है। वोटर को साबित करना पड़ रहा है कि उसका, उसके माता-पिता या रिश्तेदार का नाम 2002 की लिस्ट में मौजूद था। लच्छीपुर रेड लाइट एरिया है। यहां की वोटर लिस्ट में दर्ज करीब 400 महिलाएं सेक्स वर्कर्स हैं। ये एक बार यहां आईं और फिर घर नहीं लौट पाईं। कई ऐसी हैं, जिन्हें बांग्लादेश से लाकर बेच दिया गया। उनके पास वोटर आईडी और आधार कार्ड तो हैं, लेकिन पुराने डॉक्यूमेंट नहीं हैं। इस परेशानी पर हमने सेक्स वर्कर्स सलमा, नूरी, फातिमा और सुमित्रा से बात की। हम सेक्स वर्कर्स की पहचान उजागर नहीं करना चाहते, इसलिए सभी नाम बदले गए हैं। लच्छीपुर की तंग गलियां 400 सेक्स वर्कर्स का घर
पश्चिम बर्धवान जिले का आसनसोल कोल बेल्ट इलाका है। ओडिशा और झारखंड से सटा है, इसलिए यहां मजदूरों की आवाजाही ज्यादा है। यहीं जीटी रोड के किनारे लच्छीपुर बसा है। बीएलओ मोहम्मद एजाज अहमद करीब एक महीने से घर-घर जाकर SIR के फॉर्म भरवा रहे हैं। मोहम्मद एजाज अहमद बताते हैं कि लच्छीपुर में रहने वाली महिलाएं रातभर जागती हैं, इसलिए दिन में सोती हैं। दिन में उनसे मिलने और फॉर्म भरवाने में बहुत मुश्किल आई। तंग गलियों से होते हुए एजाज हमें कुछ सेक्स वर्कर्स के घर ले गए, ताकि उनकी परेशानी सामने आ सके। पहली कहानी सलमा की
‘बांग्लादेश से हूं, SIR फॉर्म मिला, लेकिन जमा नहीं किया’
35 साल की सलमा बीते 14 साल से लच्छीपुर में रह रही हैं। घर के नाम पर एक छोटा सा कमरा है। इसमें सिर्फ एक बेड और किचन का सामान रखा है। सलमा बताती हैं, ‘15 साल पहले भारत आई थी। तब उम्र सिर्फ 20 साल थी। मेरे गांव के एक शख्स ने कहा था कि भारत में काम दिला देगा।’ ‘मुझे लगा थोड़े पैसे कमाऊंगी। गांव का आदमी था, इसलिए भरोसा कर लिया। जरा भी अंदाजा नहीं था वह यहां लाकर बेच देगा। इसके बाद न कभी घर लौट पाई और न यहां शादी की।’ SIR की वजह से वापस बांग्लादेश भेजे जाने का डर नहीं लगता? सलमा जवाब देती हैं, ‘मुझे किसी बात का डर नहीं है। यहां इतने लंबे वक्त से रह रही हूं। दो बार वोट भी डाला है। मुझे तो यहां बेचा गया है। मैं क्या करूं।’ सलमा ने हमसे कहा कि उसने शादी नहीं की है, लेकिन बीएलओ एजाज बताते हैं कि सलमा ने बनारस के एक शख्स से शादी की है। उसके बच्चे भी हैं। पति के पास पासपोर्ट हैं। सलमा यह बात किसी को बताना नहीं चाहती। मैं यहां 20 साल से आ रहा हूं, इसलिए सभी के बारे में जानता हूं। सलमा बांग्लादेशी हैं तो उनका वोटर आईडी कैसे बन गया? इसका जवाब बीएलओ मोहित कुमार सिंह देते हैं। वे बताते हैं- आधार कार्ड बनाने के लिए पार्षद, विधायक या सांसद के लेटर पैड पर सिर्फ लिखकर देना होता है कि फलां आदमी फलां जगह से ताल्लुक रखता है। इससे आधार कार्ड बन जाता है और आधार कार्ड से वोटर आईडी कार्ड बनवा लेते हैं। दूसरी कहानी नूरी और फातिमा की
पुराने कागज नहीं, बेटियों के लिए डर लग रहा
85 साल की नूरी अब चल नहीं पातीं। लच्छीपुर आई थीं तब करीब 16-17 साल की थीं। बेटी फातिमा का जन्म भी लच्छीपुर में ही हुआ। अब फातिमा की भी दो बेटियां हैं। नूरी कहती हैं, ‘लच्छीपुर आते ही ये काम (सेक्स वर्क) शुरू कर दिया था। पूरी जिंदगी यहीं निकल गई। मेरे पति बिहार में मेरे ही शहर से थे। उस वक्त वोटर आईडी की जरूरत नहीं होती थी। ऐसे ही कागज से वोट देते थे। यहां मेरा वोटर आईडी बना। पति की मौत के बाद नाम कट गया। मुझे समझ नहीं आया ऐसा क्यों हआ। अब मेरे पास 2002 का कोई कागज नहीं है।’ इतना कहकर नूरी चुप हो जाती हैं। उन्हें खामोश देख बगल में बैठीं नूरी की बेटी फातिमा बोलने लगती हैं। वे बताती हैं, ‘SIR की प्रोसेस शुरू होने के बाद मैं अब्बू के कागज लेने गांव गई थी। घर के कागज ले भी आई, लेकिन परेशानी नाम से हैं। अब्बू आसनसोल में किसी और नाम से रहते थे। यहां के सभी कागज उसी नाम से हैं। गांव का नाम अलग था। घर के दस्तावेज उसी नाम से हैं।’ ‘गांव में किसी को नहीं पता कि हम रेड लाइट एरिया में रहते हैं। मेरे वोटर आईडी में जिस शख्स का नाम है, उससे मेरी शादी नहीं हुई थी। बस बच्चे हैं। वो हमें छोड़कर चला गया। अब्बू का इंतकाल बचपन में ही हो गया था। उसके बाद कोई कागज नहीं बना। मैं कई बार अम्मी का वोटर आईडी बनवाने गई, लेकिन नहीं बना।’ SIR की प्रोसेस पर फातिमा कहती हैं, ‘मुझे बेटियों की फिक्र है। डर लग रहा है। हम शुरुआत से यहीं रह रहे हैं। अगर कोई गांव में जाकर देखना चाहे, तो देख सकता है।’ तीसरी कहानी सुमित्रा की
नाम कटने की फिक्र में बीमार पड़ीं
सुमित्रा इस बात से डरी हुई हैं कि उनका नाम वोटर लिस्ट से न कट जाए। उनके पास कागज नहीं हैं। इसी फिक्र में बीमार हो गईं। आसपास की महिलाओं ने समझाया कि नाम नहीं कटेगा। फिर भी सुमित्रा का डर खत्म नहीं हुआ। उनकी बहू भी सेक्स वर्कर है। दोनों ने कैमरे पर बात नहीं की। घर के बारे में पूछने पर सुमित्रा बस इतना बताती हैं कि सिलीगुड़ी से यहां आई थी। SIR का फॉर्म भरने के बारे में कुछ नहीं बताया। बीएलओ एजाज बताते हैं कि ये बहुत छोटी उम्र में बांग्लादेश से आई थीं। SIR की वजह से इन्हें डर है कि दोबारा बांग्लादेश न भेज दिया जाए। इसी वजह से परेशान हैं और बीमार पड़ गई हैं। बीएलओ बोले- सभी से फॉर्म भरवाएं हैं, 90% फॉर्म वापस आए
हमने एजाज से पूछा कि सेक्स वर्कर्स का फॉर्म भरवाने में क्या दिक्कतें आ रही हैं? एजाज बताते हैं, ‘सबसे अहम काम फॉर्म बांटना और इकट्ठा करना है। यही से दिक्कत शुरू हो जाती है। यहां काम शाम से शुरू होता है।’ ‘सेक्स वर्कर्स दिन में या तो सो रही होती हैं या दूसरी किसी जगह होती हैं। सबको खोजकर फॉर्म देना पड़ा। इसमें काफी वक्त लगा। ये काम दो-चार दिन में हो जाता, लेकिन मुझे दस दिन लग गए। फॉर्म भरने में भी काफी गलतियां हो रही हैं। फिर भी 90% फॉर्म वापस आ गए हैं।’ मुख्य चुनाव अधिकारी बोले- घबराने की जरूरत नहीं
पश्चिम बंगाल में कोलकाता के सोनागाछी, बौ बाजार, कलिघाट के अलावा सिलीगुड़ी और आसनसोल बड़े रेड लाइट एरिया हैं। यहां SIR के लिए इलेक्शन कमीशन ने स्पेशल कैंप लगवाए हैं। एनजीओ भी इस काम में मदद कर रहे हैं। 8 दिसंबर को पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल कोलकाता के दुर्गा चरण मित्रा स्ट्रीट के पास लगे शिविर में पहुंचे थे। यहां के करीब 11 हजार वोटर्स के फॉर्म नहीं मिले हैं, इनमें 3500 सेक्स वर्कर हैं। मनोज अग्रवाल ने कहा कि हमने उन महिलाओं को शामिल करने के लिए विशेष अधिकार दिए हैं, जो 2002 की वोटर लिस्ट में नहीं थीं, लेकिन 2021 और 2024 में वोट डाल चुकी हैं। उनके नाम 11 दिसंबर की लिस्ट में सुरक्षित कर लिए जाएंगे। हालांकि एनजीओ भी वेरिफिकेशन में परेशानी महसूस कर रहे हैं। सोनागाछी रेड लाइट एरिया में महिलाओं के लिए काम करने वाले दरबार महिला समन्वय समिति की मेंटर भारती डे तीन बड़ी परेशानियां बताती हैं। 1. जिन लड़कियों के घर में पता चल गया वे सेक्स वर्कर्स हैं, उन्हें घर से निकाल दिया गया। वे माता-पिता के कागज कहां से लाएंगी। उन्हें यह भी नहीं पता है कि उनके माता-पिता ने 2002 में कहां वोट दिया है। 2. कई लड़कियां काम के लिए दूसरे राज्यों में जाती हैं, जैसे कोई लड़की मुंबई में है और वोटर लिस्ट में उसका नाम बंगाल में है। उसके लिए फिर यहां आना मुश्किल है। 3. बुजुर्ग हो चुकी महिलाओं ने पूरी जिंदगी यहीं निकाल दी। वे कहां से परिवार की लिस्ट लाकर देंगी। अगर कोई महिला बांग्लादेश की है। उसके बच्चे यहीं पले-बढ़े हैं। उसे कैसे कहें कि वह बांग्लादेश से कागज लाकर दे। भारती बताती हैं, ‘इन महिलाओं में SIR को लेकर काफी डर है। कई लड़कियां पूछती हैं कि हमारे पास माता-पिता का कोई प्रूफ नहीं है, क्या हमें यहां से भगा देंगे। हम लगातार महिलाओं से बात कर रहे हैं। कोलकाता के रेड लाइट एरिया में 5-6% महिलाओं के पास वोटर आईडी कार्ड नहीं है।’ एनजीओ ने ये समस्याएं चुनाव आयोग को बताई थीं। इसके बाद मुख्य निर्वाचन अधिकारी सोनागाछी गए थे। उन्होंने सेक्स वर्कर्स से बात की और उन्हें नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म-6 देकर 16 तारीख को लाने के लिए कहा है।

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