मेरा नाम फिरोज कुरैशी है। यूपी के कासगंज का रहने वाला हूं। हमें रैट माइनर्स कहा जाता है, क्योंकि देश में हम बड़ी-बड़ी सुरंग बनाते हैं। यह काम चूहों के बिल बनाने जैसा होता है। जिस तरह चूहे मिट्टी खोदते हैं और बाकी मिट्टी पीछे फेंकते जाते हैं। ठीक उसी तरह। हमें देशभर में बड़े सुरंग हादसों पर बचाव कार्य के लिए बुलाया जाता है। हम कभी सुरंग में फंसे मजदूरों को निकालते हैं तो कभी बोरवेल में गिरे किसी बच्चे को। इन्हें बचाते वक्त हम अपनी जिंदगी दांव पर लगा देते हैं, लेकिन हमें उसका ठीक से मेहनताना नहीं मिलता। सरकार भी कोई मदद नहीं करती। मुझे तेलंगाना सुरंग हादसे में बनारस की एक बूढ़ी औरत के पति को न खोज पाने का बहुत अफसोस है। सुरंग के बाहर उसका रोना आज भी दिल में चुभता है। उत्तराखंड सुरंग हादसे में 14 मजदूरों को बाहर निकालने पर राष्ट्रपति ने हमें बधाई सर्टिफिकेट दिया। हमें देश के जाने-माने गाने के प्रोग्राम इंडियन आइडल में बुलाया गया। सनी देओल जैसे कई फिल्म स्टार हमसे मिले। एक विदेशी प्रोडक्शन हाउस ने हम पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बनाई, लेकिन हमारे हालात जस के तस हैं। हमारे पास इलाज तक के पैसे नहीं हैं। अभी श्रीलंका बुलाया गया है, वहां जाने की तैयारी कर रहे हैं। अपने रैट माइनर्स बनने की कहानी से बात शुरू करता हूं। पढ़ा-लिखा न होने से मेरे पास कोई काम नहीं था। मुंबई में रहने वाले अपने छोटे भाई के पास गया। वह वहां जमीन के अंदर पानी, सीवर और गैस पाइपलाइन बिछाने का काम करता था। उसके साथ 12 साल काम किया। जहां मैंने जमीन के अंदर पाइप बिछाने और सुरंग खुदाई का काम सीखा। जमीन के अंदर पाइपलाइन डालने का यह काम बहुत खतरनाक है। इसके लिए पहले 20 से 40 फीट गहरा गड्ढा करना पड़ता है। गड्ढा होने के बाद पाइप बिछाने का काम किया जाता है। उसके बिछने के बाद हम पाइप के अंदर जाते हैं। अंदर बैठकर हम पत्थर और लोहे की कुटाई करते हैं। उसके बाद सुरंग बनाते हुए पाइप को आगे बढ़ाते हैं। यह काम 8 से 18 घंटे तक लगातार होता है। इस काम को मशीनें आज भी बेहतर तरीके से नहीं कर पातीं। इस काम के दौरान हम मौत के मुंह में होते हैं। पाइप के अंदर सबसे बड़ी चुनौती कई बार ठीक से सांस न ले पाने की होती है। उसमें जानलेवा गैस भर जाती है तो दम घुट जाता है। इसके अलावा उसी पाइप से पानी खींचा जाता है। कई बार उसमें करंट उतर आता है। कई बार तो आंखों के सामने लोगों को मरते देखा है। आप सोच सकते हैं कि यह कितना खतरनाक होता है। यही वजह है कि कई देशों ने इस काम पर प्रतिबंध लगा रखा है। मुंबई में इस काम को लंबे समय तक किया। काम बहुत मुश्किल था, लेकिन पैसा कुछ खास नहीं मिलता था। भाई के साथ प्लान बनाया और दिल्ली आ गया। यहां दिल्ली शहर में बड़ी-बड़ी सीवर लाइनें बिछाईं। जानलेवा होने के नाते इस काम के बारे में घर वालों को नहीं बताता। उनसे कहता हूं कि हम बिल्डिंग बनाने का काम करते हैं, लेकिन उत्तराखंड की सिलक्यारा सुरंग हादसे में हमारा नाम सबके सामने आ गया। वहां सुरंग में मजदूरों के फंसने की खबर आई। हमारी टीम को बुलाया गया। उस वक्त हमारे एक साथी की बहन की शादी थी। उसने शादी छोड़ दी। एक साथी के भाई की पत्नी अस्पताल में भर्ती थी, लेकिन हम अपने घर वालों को बताए बगैर टीम के 6 साथी वहां पहुंचे। वहां पहुंचे तो देश-विदेश की कई बड़ी मशीनें और सरकार की टीमें बचाव कार्य में लगी हुई थीं। सब फेल हो रही थीं, अंदर 41 मजदूरों की जिंदगी का कुछ पता नहीं था। सब फेल होने पर हमारी टीम ने बचाव कार्य शुरू किया। हर दिन मुश्किल लग रहा था, लेकिन धीरे-धीरे हम अपने मिशन में सफल हो रहे थे। मजदूरों को फंसे अब तक 17 दिन हो गए थे। 17वें दिन हमारा मिशन सफल हो गया। हमने एक-एक करके सभी 41 मजदूरों को बाहर निकाल लिया। मिशन सफल होते ही टीवी पर हमारी तस्वीरें आने लगीं। मेरे बेटे ने मुझे टीवी पर देखा। उसने तुरंत फोन करके पूछा- ‘अब्बू क्या आप उत्तराखंड में हैं?’। मैंने कहा कि नहीं, तुमने मेरी शक्ल के किसी और को देखा होगा। उसके बाद टीवी पर मेरे छोटे भाई की तस्वीर चली। घर वालों ने उसे देखा तो बेटे ने दोबारा फोन किया। उसने कहा- अब्बू टीवी पर चाचू भी दिखाई दे रहे हैं। आखिर तब मैंने बता दिया कि- हां हम उत्तराखंड में हैं। यहां सुरंग में फंसे मजदूरों को निकाल चुके हैं। उस दिन जाकर हमारे परिवारों को पता चला कि हम सुरंग का काम करते हैं। इस तरह बड़ी-बड़ी मशीनों के फेल होने के बाद हमारी कामयाबी दुनियाभर में चर्चित हो गई। राष्ट्रपति ने हमें बधाई सर्टिफिकेट भेजा। उत्तराखंड सरकार ने 50-50 हजार रुपए दिए। मिशन सफल होने के बाद घर आया। यहां हमें रैट माइनर्स कहा जा रहा था। उस दिन पहली बार पता चला कि इस काम को करने वाले लोगों को रैट माइनर्स कहा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि हम चूहों की तरह सुरंग खोदने का काम करते हैं। मीडिया में हमारी खूब चर्चा चल रही थी। उसके बाद देश के जाने-माने गाने के प्रोग्राम इंडियन आइडल में हमें बुलाया गया। फिल्म स्टार सनी देओल जैसे एक्टर हमसे मिले, लेकिन इंडियन आइडल में जो पैसा मिलना था, उसे बिचौलिया खा गया। एक तरह से वहां नाम हुआ, लेकिन कोई मदद नहीं मिली। उस दौरान विदेश में भी हमारी चर्चा थी। एक विदेशी प्रोडक्शन हाउस आकर हमसे मिला। उसने हम पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई। इसके अलावा कई नेताओं ने हमें बुलाकर सम्मानित किया, लेकिन सच यही है कि हमें सिर्फ बधाइयां मिलीं। देश की नजरों में हम हीरो बने, लेकिन हमारे आर्थिक हालात जीरो हैं। उत्तराखंड सुरंग हादसे के बाद 22 फरवरी 2025 को तेलंगाना सुरंग हादसा हुआ। वह हादसा 400 मीटर ऊंचे पहाड़ पर बन रही सुरंग में हुआ था, जिसमें 8 मजदूर दब गए थे। वह सुरंग 52 किलोमीटर की बनाई जा रही थी, लेकिन 14 किलोमीटर बनने के बाद अचानक बैठ गई थी। सुरंग के अंदर पानी के साथ हजारों टन लोहा आकर जमा हो गया था। हालत ऐसे थे कि उसके अंदर कोई जाने को तैयार नहीं था। सरकार की टीमों ने हाथ खड़े कर दिए थे। हमारी टीम को बुलाया गया। वहां पहुंचने पर हमें सुरंग में एक ट्रेन से अंदर ले जाया गया। सुरंग जहां बैठी थी वहां पानी और लोहे का भारी कीचड़ था। ट्रेन को उस कीचड़ से पहले रोक दिया गया। उसके बाद हम कीचड़ में उतरे और सफाई शुरू की। वह कीचड़ 4 किलोमीटर तक था। उसे साफ करने में कई दिन लग गए। कीचड़ साफ हुआ तो पता चला कि अगले साढ़े तीन सौ मीटर तक पत्थर और लोहे का मलबा है। उसी मलबे में 8 मजदूरों के दबे होने की आशंका थी। हमने उसकी भी सफाई शुरू की। सबसे पहले हमें उसमें एक डेडबॉडी मिली, जो कि पंजाब के रहने वाले गुरमीत सिंह की थी। उसे हम बाहर निकालकर लाए। सुरंग के बाहर बनारस से एक बुजुर्ग महिला आई थीं। दबने वाले 8 मजदूरों में एक उनके पति भी थे। वह सुरंग के बाहर बैठी रोती रहतीं। सुबह जब मैं सुरंग के अंदर जाने लगता तो वह रोते हुए मुझसे पति को खोजने की मिन्नतें करतीं। लगभग 18 घंटे सुरंग के अंदर रहकर जब हम बाहर आते तो वह वहीं बैठी मिलतीं। बाहर आने पर वह अपने पति के बारे में पूछतीं, लेकिन हमारे पास कोई जवाब नहीं होता था। अब तक हम दो शव निकाल चुके थे, लेकिन उनके पति का शव अभी तक नहीं मिला था। इस दौरान जैसे-जैसे हम सुरंग में आगे बढ़े, हालात खराब होते जा रहे थे। इसी बीच सरकार का आदेश आया। कहा गया कि अब आगे कोई मजदूर नहीं जाएगा। आगे जाने पर हमारी जान जा सकती है। उसके बाद अधिकारियों ने हमें बाकी शव खोजने से मना कर दिया। हम बाहर निकल आए। मैंने सरकारी अधिकारियों से शव खोजने की मिन्नतें कीं। हमें भरोसा था कि हम खोज लेंगे, लेकिन वे नहीं माने। हमें सख्ती से रोक दिया। उधर, बाहर बैठी बनारस की उस बूढ़ी औरत को देख रहा था। वह रोए जा रही थीं। सोच रहा था कि उनके पति का शव मिल जाता तो भी संतोष मिल जाता, लेकिन हम मजबूर थे। छह शव सुरंग के अंदर रह गए। उस दिन मैं भारी मन से कासगंज लौट रहा था। उस बुजुर्ग महिला का चेहरा मेरी आंखों में नाच रहा था। आज भी उस महिला का रोते हुए चेहरा अक्सर आंखों के सामने आता है। उनके पति का शव न निकाल पाना दिल में चुभता है। इसी तरह दूसरा केस राजस्थान के कोटपूतली का है। जहां 130 फीट गहरे बोरवेल में एक तीन साल की बच्ची गिर गई थी। हमें बुलाया गया। वहां सरकारी टीम पहले से जुटी हुई थी, लेकिन वे बच्ची को नहीं बचा पा रहे थे। बच्ची के माता-पिता और परिवार वालों का रो-रो कर बुरा हाल था। वे बार-बार हमारे सामने हाथ जोड़ रहे थे, लेकिन सरकारी टीम के लोग हमें अंदर नहीं जाने दे रहे थे। उन्होंने परिवार वालों को डरा रखा था कि हम लोग बच्ची को बचाने का ज्यादा पैसा लेते हैं। यह भी कहा था कि अगर वे बच्ची रैट माइनर्स से निकलवाएंगे और कोई गलती होगी तो सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। कोई मुआवजा नहीं मिलेगा। लेकिन उस वक्त हमने देखा कि सरकारी टीम जिस तरह से काम कर रही थी, वह बच्ची को नहीं बचा सकती थी। आखिर ऐसा करते हुए आठ दिन बीत गए और बच्ची मर गई। उसके बाद उसका शव निकाला गया। वह बच्ची भी अक्सर याद आती है। सोचता हूं, हमें बचाने दिया जाता तो शायद वह जिंदा होती। ये तो वे हादसे हैं, जिनके बारे में आप सभी को मीडिया के जरिए पता है, लेकिन हम देश में होने वाले ऐसे भी बहुत सारे हादसों में जाते हैं, जिनका मीडिया में जिक्र तक नहीं होता। सरकार उन्हें सामने ही नहीं आने देती। अभी हमें श्रीलंका बुलाया गया है। वहां जाने के लिए हम पासपोर्ट बनवा रहे हैं। आखिर में कहूंगा- हम अपने काम को पूरे जुनून से करते हैं। जान तक की परवाह नहीं करते, लेकिन हमें उसका ठीक पैसा नहीं मिलता। केवल बधाई और तारीफें मिलती हैं और तारीफों से घर नहीं चलता। हमारे हालात ऐसे हैं कि अगर आज हमारे घर से कोई अस्पताल में भर्ती हो जाए तो उसका इलाज तक नहीं करा सकते। एक तरह से हम अपनी आर्थिक मजबूरियों की सुरंग में फंसे हैं। सरकार हमारी मदद करे। (फिरोज कुरैशी ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए हैं।) ————————————————- 1-संडे जज्बात-खरीदी गई दुल्हन हूं, लोग हमें पारो कहते हैं:पति की मौत के बाद ससुरालवाले बोले- तुम्हें बेच देते हैं, लाख रुपए मिल जाएंगे मेरा नाम उर्मिला है। मैं मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के एक गांव में पैदा हुई। एक दलाल ने मुझे शादी के बहाने धोखा दिया। उसने हरियाणा के जींद के रहने वाले कुबूल लाठर के हाथों बेच दिया। हरियाणा में इस तरह खरीदकर लाई जाने वाली दुल्हनों को ‘पारो’ या ‘मोलकी’ कहा जाता है। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2-संडे जज्बात-मैं मुर्दा बनकर अर्थी पर भीतर-ही-भीतर मुस्कुरा रहा था:लोग ‘राम नाम सत्य है’ बोले तो सोचा- सत्य तो मैं ही हूं, थोड़ी देर में उठकर साबित करूंगा मेरा नाम मोहनलाल है। बिहार के गयाजी के गांव पोची का रहने वाला हूं। विश्व में शायद अकेला ऐसा इंसान हूं, जिसने जिंदा रहते अपनी शव यात्रा देखी। यह बात चंद करीबी लोगों को ही पता थी। मरने का यह सारा नाटक किसी खास वजह से किया गया था। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
संडे जज्बात-हम चूहों सा पहाड़ खोदकर जिंदगियां बचाते हैं:राष्ट्रपति ने सराहा, हम पर फिल्म भी बनी; पर खुद बीमार पड़े तो इलाज को तरस गए
📅 Published: November 23, 2025 |
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