चंडीगढ़ कोर्ट से जूनियर वारंट ऑफिसर को झटका:पदोन्नति पर नहीं लिया सरकारी घर, पुराना खाली करने के आदेश, देने होंगे ₹8.79 लाख

📅 Published: January 12, 2026 | 📂 Category: Uncategorized

एयरफोर्स के एक जूनियर वारंट ऑफिसर को चंडीगढ़ की कोर्ट से झटका दिया है। स्टेशन मैरिड क्वार्टर (SMQ) खाली कराने के आदेश के खिलाफ दायर अपील को कोर्ट ने खारिज कर दिया है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि पदोन्नति मिलने के बाद अगर अधिकारी अपनी नई पात्रता के अनुसार दिया गया सरकारी घर नहीं लेता और पुराने क्वार्टर में ही रहता है, तो इसे गैरकानूनी कब्जा माना जाएगा। यह फैसला अतिरिक्त जिला न्यायाधीश सोनिका की कोर्ट ने सुनाया। कोर्ट ने एयरफोर्स प्रशासन द्वारा 3 फरवरी 2020 को पारित बेदखली आदेश को सही ठहराया और अपीलकर्ता की सभी दलीलों को नामंजूर कर दिया। जानिए क्या है पूरा मामला रवि रंजन कुमार एयरफोर्स में तैनात जूनियर वारंट ऑफिसर हैं। उन्हें 2017 में चिकित्सा आधार पर सेक्टर-47 बी स्थित स्टेशन मैरिड क्वार्टर नंबर-1341 आवंटित किया गया था, जब वे सार्जेंट के पद पर थे। बाद में 1 अगस्त 2017 को पदोन्नति होने पर वे जूनियर वारंट ऑफिसर बन गए। पदोन्नति के बाद उन्हें नई पात्रता के अनुसार सेक्टर-31 बी और बाद में सेक्टर-31 डी में वैकल्पिक क्वार्टर आवंटित किए गए, लेकिन उन्होंने वहां शिफ्ट करने से इनकार कर दिया। इसके बजाय उन्होंने चिकित्सा कारणों और बच्चों की बोर्ड परीक्षाओं का हवाला देते हुए पुराने क्वार्टर में बने रहने की अनुमति मांगी। एयरफोर्स प्रशासन ने क्यों लिया एक्शन एयरफोर्स अधिकारियों का कहना था कि अधिकारी जानबूझकर नए आवास में शिफ्ट नहीं हो रहे थे, जिससे सरकारी आवास खाली पड़ा रहा और विभाग को आर्थिक नुकसान हुआ। इस आधार पर उन्हें पब्लिक प्रिमाइसेज (अनधिकृत कब्जाधारी) अधिनियम, 1971 के तहत नोटिस जारी किया गया। सुनवाई के बाद 3 फरवरी 2020 को उन्हें 13 जनवरी 2020 से अनधिकृत कब्जाधारी घोषित कर क्वार्टर खाली करने का आदेश दिया गया। नियमों के अनुसार क्वार्टर आवंटित अदालत ने कहा कि सरकारी आवास कोई अधिकार नहीं बल्कि सेवा से जुड़ी सुविधा है। पदोन्नति के बाद जब अधिकारी को नए नए नियमों के अनुसार क्वार्टर आवंटित कर दिया गया, तो पुराने क्वार्टर में बने रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं बचता। कोर्ट ने यह भी माना कि अपीलकर्ता को पर्याप्त अवसर दिया गया था और व्यक्तिगत सुनवाई के बाद ही आदेश पारित किया गया। बच्चों की परीक्षा और चिकित्सा कारणों को आधार बनाकर लंबे समय तक क्वार्टर रोके रखना नियमों के खिलाफ है। ₹8.79 लाख पेनल रेंट की वसूली वैध कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 13 जनवरी 2020 से 9 दिसंबर 2020 तक अनधिकृत कब्जे की अवधि के लिए ₹8,79,731 की पेनल रेंट वसूली कानूनी है। इस राशि की वसूली पर रोक लगाने की मांग को भी कोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपील के साथ-साथ सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 151 के तहत दायर आवेदन को भी खारिज कर दिया। साथ ही कहा कि पेनल रेंट के खिलाफ अलग से अपील का प्रावधान कानून में मौजूद है, जिसका पालन नहीं किया गया। अंत में कोर्ट ने अपील को लागत सहित खारिज करते हुए फाइल रिकॉर्ड रूम भेजने के आदेश दिए।

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