जब शहर के पहले मेयर ने चौंका दिया राजनीति को:1992 में भाजपा सरकार के शपथ लेते ही श्री प्रकाश जायसवाल ने छोड़ा मेयर का पद

📅 Published: November 29, 2025 | 📂 Category: Uncategorized

कानपुर नगर निगम के इतिहास में पहला चुनाव हुए कई दशक बीत चुके हैं, लेकिन उस दौर की राजनीति और प्रशासनिक शैली आज भी शहर के विकास में मिसाल मानी जाती है। पूर्व पार्षद मदनलाल भाटिया उर्फ मद्दी भइया बताते हैं कि जब नगर निगम का चुनाव हुआ था, तब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता श्री प्रकाश जायसवाल शहर के पहले मेयर बने थे। चुनाव जीतते ही उन्होंने कानपुर के विकास को नई दिशा दी। लगभग ढ़ाई साल उन्होंने कानपुर को बहुत कुछ दिया। सरकार कोई भी रही हो, वे हमेशा शहर के लिए योजनाएं लाने के लिए कटिबद्ध रहे। नगर निगम का सदन चार-चार दिन तक चलता था और शहर से जुड़ी हर छोटी-बड़ी समस्या पर खुलकर चर्चा होती थी। फिर 1992 में भाजपा सरकार आई मद्दी भाटिया याद करते हुए कहते हैं कि फिर वर्ष 1992 में भाजपा की सरकार आई, और अयोध्या के मुद्दे को लेकर प्रदेश में उथल-पुथल की स्थिति बनने लगी, जैसे ही नई सरकार ने शपथ ली, बिना किसी को बताए श्री प्रकाश जायसवाल ने मेयर पद से तुरंत इस्तीफा दे दिया। यह खबर जब राजनीतिक गलियारों तक पहुंची, तो एकदम सनसनी फैल गई। पूछने पर ऐसा दिया जवाब उन्होंने बताया कि जब उनसे पूछा गया कि ऐसा कदम क्यों उठाया, तो श्री प्रकाश जायसवाल का साफ कहना था—“मैं ऐसे संविधान विरोधी सरकार में रहते हुए अपनी जनता के लिए कुछ नहीं कर पाऊंगा… और उनके नीचे काम करने में मैं असमर्थ रहूंगा।” उस वक्त नगर निगम में लगभग 100 पार्षद कांग्रेस के हुआ करते थे। सभी को जैसे ही इस इस्तीफे की जानकारी मिली, वे भागे-भागे उनके पास पहुंचे। सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, अन्य दलों के पार्षद भी यह सुनकर चकित और स्तब्ध रह गए। हर कोई वही सवाल कर रहा था—“आपने यह क्यों किया?” जिस पर उनका एक ही जवाब था—“भ्रष्टाचार की सरकार में रहकर जनता की सेवा नहीं हो सकती।” गोपनीय था ये इस्तीफा पूर्व पार्षद मद्दी भाटिया कहते हैं कि यह इस्तीफा पूरी तरह गोपनीय था। कानों-कान किसी को भनक तक नहीं लगी। उन्होंने यह बात किसी साथी तक से साझा नहीं की। मद्दी भाटिया मुस्कुराते हुए बताते हैं कि श्री प्रकाश जायसवाल गांधी जी के तीन बंदरों की तरह तीन सबसे विश्वसनीय साथियों को अपना माना करते थे। पहला मदनलाल भाटिया, दूसरा अरुण कुमार द्विवेदी और तीसरा राधेश्याम गुप्ता। इनके बीच के रिश्ते और विश्वास की मिसाल आज भी राजनीतिक गलियारों में दी जाती है।

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