'परमात्मा की शरण के बिना सफलता नहीं':गीता प्रेस में गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र प्रसंग सुनाकर कथा व्यास ने समझाया

📅 Published: November 30, 2025 | 📂 Category: Uncategorized

गोरखपुर के गीता प्रेस के लीला-चित्र-मंदिर में गीता जयंती महोत्सव के अवसर पर श्रीराम कथा के आयोजन में पांचवे दिन कथा व्यास ने गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र की प्रसंग का वर्णन किया। उन्होंने समझाया कि जब महर्षि विश्वामित्र जैसे शक्तिशाली व्यक्ति भगवान की मदद के बिना यज्ञ नहीं कर सके तो मनुष्य क्या कर सकता है। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने बताया कि परमात्मा की शरण के बिना कोई सफलता नहीं प्राप्त कर सकता है। विश्वामित्र से भगवान राम को सेतु कहा पंडित रामज्ञान पांडेय ने बताया – धर्मसेतु पालक भगवान श्रीराम को महर्षि विश्वामित्र ने सेतु की उपमा दी। क्योंकि उन्होंने श्रीराम के व्यक्तित्व को परखा और उसका परिणाम यह हुआ कि उनके जीवन में गुरु वशिष्ठ को लेकर जो विद्रोह की भावना थी वह समाप्त हो गयी। राजा से महर्षि बने विश्वामित्र
महर्षि विश्वामित्र पहले महात्मा नहीं थे, राजा थे। क्षत्रिय वंश में उनका जन्म हुआ था। राजा के रूप में वन में शिकार खेलने के लिए गए। वशिष्ठ की कुटिया पर इन्होंने पड़ाव डाला। वशिष्ठ जी ने देखा दूसरे देश के राजा हमारी कुटिया पर आएं हैं, इसका स्वागत-सत्कार होना चाहिए। वशिष्ठ के पास नंदिनी नाम की कामधेनु गाय थी। उसकी विशेषता यह थी कि उस गाय से जो वस्तु मांगो मिल जाती थी । नंदिनी के प्रताप से गुरु वशिष्ठ ने राजा विश्वामित्र और उनकी पूरी सेना का सत्कार किया। राजा विश्वामित्र को बड़ा आश्चर्य हुआ कि जो वस्तु हम राजाओं के पास नहीं वह कुटिया में रहने वाले एक महात्मा के पास कैसे? उन्होंने वशिष्ट से पूछा तो पता चला यह चमत्कार नंदिनी गाय का है। गुरु वशिष्ठ की शक्ति को देख तपस्या करने लगे विश्वामित्र राजा विश्वामित्र ने महर्षि वशिष्ठ से नंदिनी की मांग की कहा कि यह गाय हमें देत दे दो बदले में हजारों साथ गाय ले लो। आप तो महात्मा हैं, आपको भोग भोगना नहीं है। गुरु वशिष्ठ ने कहा-राजन । यह गाय हमने दूसरों की सेवा के लिए रखा है, अपने भोग के लिए नहीं। इस पर नाराज होकर राजा विश्वामित्र ने अपनी सेना को आदेश दिया कि गाय छीन लो। पर वशिष्ठ की ब्रह्म शक्ति के आगे विश्वामित्र और उनकी पूरी सेना पराजित हो गयी। विश्वामित्र जी को आश्चर्य हुआ एक अकेले ब्राह्मण के आगे हमारी पूरी सेना और मैं पराजित हो गया। यह किसका बल है? केवल तपस्या का बल है। उन्होंने निर्णय ले लिया कि मैं भी तपस्या करके ब्राह्मण बनूंगा। तभी से उन्होंने इतनी तपस्या की कि क्षत्रिय से ब्राह्मण बन गये। अद्‌भुत शक्ति उनके जीवन में आ गयी। अपनी शक्ति से जीवित त्रिशंकु को भेजा स्वर्ग
वशिष्ठ के सामने जो पराजित होने से विश्वामित्र के मन में द्वेष-भाव बना हुआ था। वे गुरु वशिष्ठ को नीचा दिखाने का अवसर ढूंढते रहते थे। उन्हें यह अवसर तब मिला जब हरिश्चन्द्र के पिता त्रिशंकु ने गुरु वशिष्ठ से कहा- मैं स्वर्ग जाना चाहता हूं। वशिष्ठ ने कहा मृत्यु के बाद कोई स्वर्ग जाता है, तुम भी जाओगे। लेकिन त्रिशंकु जीवित ही जाना चाहते थे ताकि लोग जानें कि मैं कितना बड़ा पुण्यात्मा हूं। त्रिशंकु राजनीतिज्ञ थे उन्होंने सोचा दो महापुरुषों में झगड़ा हो, तो एक से काम न बने तो दूसरे के पास जाने से काम बन जाता है। जब गुरु वशिष्ठ ने उनकी इच्छा पूरी नहीं कि तो वे विश्वामित्र के पास चले गए। विश्वामित्र ने कहा तुम जा सकते हो मैं भेज सकता हूं। उन्होंने अपनी शक्ति से त्रिशंकु को स्वर्ग भेज दिया। उधर इन्द्र देव ने ऊपर से त्रिशंकु को ढकेल दिया तो नीचे गिरने लगे। उन्होंने पुकारा गुरुजी क्या हो रहा है, मैं नीचे गिर रहा हूं । ऋषि-मुनि और देवताओं ने की प्रार्थना
विश्वामित्र ने उन्हें बचाने के लिए मंत्र पढ़कर कमंडल से जल लेकर छोड़ा। अब नीचे विश्वामित्र नहीं आने दे रहे हैं, ऊपर इन्द्र नहीं जाने दे रहे थे । विश्वामित्र त्रिशंकु से बोले- मैं तुम्हारे लिए नया स्वर्ग बनाने जा रहा हूं। वे बनाने चल भी दिए। यह देख कर उन्हें रोकने के लिए ऋषि-मुनि और देवताओं ने प्रार्थना की। उन्होंने कहा- आप बड़े महान हैं, आपसे बड़ा कोई नहीं। प्रशंसा सुनने की इच्छा थी विश्वामित्र को वह मिल गयी और त्रिशंकु लटके ही रहे। भगवान राम ने यज्ञ को पूरा कराया
विश्वामित्र इतनी शक्ति होने के बाद भी रावण की शक्ति के आगे एक यज्ञ नहीं कर पा रहे थे। भगवान राम ने उस यज्ञ को पूरा कराया और राम भी गुरु वशिष्ठ की कृपा से विश्वामित्र को मिले। तब उन्हें सत्य का ज्ञान हुआ । व्यक्ति कितना भी शक्ति-सम्पन्न हो, पर जब तक परमात्मा का आश्रय नहीं लेता तब तक सफलता नहीं मिलती। तब उन्होंने कहा राम तुम न होते तो मैं और वशिष्ठ झगड़‌ते रहते, तुम तो सेतु बन कर आए हो।

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