पेरेंटिंग– बेटी रोज कहानी सुनाने की जिद करती है:खुद को कहानियों का किरदार समझती है, क्या ये इमैजिनेशन ब्रेन के लिए हेल्दी है

📅 Published: December 18, 2025 | 📂 Category: Uncategorized

सवाल- मैं धामनोद से हूं। मेरी 6 साल की बेटी को रोज सोने से पहले कहानी सुनने की जिद करती है। शुरू में मुझे लगा कि यह अच्छी बात है क्योंकि इससे उसकी कल्पनाशक्ति बढ़ेगी और भाषा सीखेगी। लेकिन अब वह कहानी के किरदारों को अपनी जिंदगी से जोड़ने लगी है। कभी कहती है, ‘मैं भी राजकुमारी हूं‘ तो कभी कहती है, ‘मुझे भगवान को देखना है।‘ कई बार वह स्कूल में अपनी कहानियों को ऐसे सुनाती है, जैसे वे सच में हुई हों। क्या ये सब नॉर्मल है? इस तरह इमैजिन करना, कहानियों को सच समझना? कहीं इन कहानियों का उसके ब्रेन पर नकारात्मक असर तो नहीं पड़ रहा? प्लीज हेल्प मी। एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- मैं आपकी इस चिंता को समझ सकती हूं, लेकिन आपका ये सोचना पूरी तरह गलत है कि वह इमेजिनेशन की दुनिया को रियल मान सकती है। पहली बात तो यह समझना जरूरी है कि कहानी बच्चों के दिमाग को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि यह उनकी मेंटल, इमोशनल और सोशल डेवलपमेंट में बेहद मददगार होता है। नेशनल स्टोरीटेलिंग नेटवर्क (NSN) यूएस के मुताबिक, कहानी सुनाना एक पुरानी और सुंदर कला है, जिसमें शब्दों और हाव-भाव के जरिए किसी कहानी के पात्रों और घटनाओं को जीवंत किया जाता है। यह न सिर्फ मनोरंजन का तरीका है, बल्कि बच्चों के साथ जुड़ने और उन्हें सिखाने का शानदार माध्यम भी है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) की एक स्टडी बताती है कि स्टोरीटेलिंग से बच्चों की इमेजिनेशन पावर बढ़ती है और वे बोले गए शब्दों को विजुअलाइज करने में बेहतर होते हैं। इमैजिनेशन और डेवलपमेंट के बीच संबंध कल्पना बच्चों के मेंटल और इमोशनल डेवलपमेंट से गहराई से जुड़ी होती है। इससे बच्चों में सोचने-समझने की क्षमता, क्रिएटिव तरीके से समस्याओं को हल करने की आदत विकसित करती है। कल्पनाशील बच्चे अलग-अलग भावनाओं और अनुभवों को महसूस करते हैं। वे उन परिस्थितियों को भी समझते हैं, जिनसे वे रोजमर्रा की जिंदगी में नहीं गुजरते हैं। इमैजिनेशन बच्चों को सिर्फ फैंटेसी की दुनिया में नहीं ले जाता है। ये उनकी क्रिटिकल थिंकिंग, प्रॉब्लम सॉल्विंग और कम्युनिकेशन स्किल्स को भी मजबूत बनाता है। जब बच्चा कहानी के किरदारों में खुद को देखता है, वह रोल-प्ले के जरिए जीवन के कई भावों को जीता है। जैसे डर, साहस, दोस्ती, त्याग या जिज्ञासा। यह उसे इमोशनल रेगुलेशन यानी अपनी भावनाओं को समझने और संभालने में मदद करता है। बच्चों को कहानियां क्यों सुनानी चाहिए कहानी बच्चों के लिए एक ब्रेन एक्सरसाइज की तरह काम करता है। फुकुशिमा जर्नल ऑफ मेडिकल साइंस (FJMS) में पब्लिश एक रिसर्च के मुताबिक, जब बच्चे कहानी सुनते हैं, उनके ब्रेन के प्रीफ्रंटल एरिया में ब्लड फ्लो बढ़ता है। इससे इमैजिनेशन और एम्पैथी (दूसरों के भाव समझने की क्षमता) मजबूत होती है। साथ ही वे लैंग्वेज व इमोशनल स्किल्स तेजी से सीखते हैं। स्टडी में पाया गया कि जब बच्चों को चित्रों वाली किताबें पढ़ाई गईं तो ब्रेन की एक्टिविटी कुछ समय बाद घटने लगी। लेकिन कहानी सुनने के दौरान उनका ब्रेन ज्यादा देर तक एक्टिव रहा। इससे पता चलता है कि कहानी बच्चों के ब्रेन को एक्टिव रखने वाला माध्यम है। बच्चों को रोजाना कहानी सुनाने के कई फायदे हैं। किस उम्र के बच्चे को कैसी कहानी सुनाएं बच्चे की उम्र और मैच्योरिटी के मुताबिक कहानी का चुनाव करना चाहिए। कहानी तभी असरदार होगी, जब वह उसकी रुचि और समझ से मेल खाए। जैसेकि- बच्चों के लिए कहानियां चुनते समय कुछ बातों का खास ख्याल रखें। कहानी सुनाने का सही तरीका सिर्फ कहानी सुनाना काफी नहीं, उसे कैसे सुनाया जाए, यह ज्यादा मायने रखता है। कहानी तभी बच्चे के भीतर उतरती है, जब वह इंटरएक्टिव (भागीदारी वाली) हो। इसके लिए कुछ बातों का विशेष ध्यान रखें। कल्पना की दुनिया से असली जिंदगी के सबक तक यह जरूरी नहीं कि आपकी बेटी कहानी को सच मान रही है। वह कहानी के भाव को अपने अनुभव से जोड़ रही है। यह विकास की एक सामान्य और स्वस्थ प्रक्रिया है। आपको बस धीरे-धीरे उसे सिखाना है कि कहानी की दुनिया कल्पना की है, लेकिन उससे मिलने वाली सीख हमारी असली जिंदगी में काम आती है। ऐसा करने का सबसे अच्छा तरीका है कि हर कहानी के बाद उससे पूछें कि अगर तुम इस कहानी में होती तो क्या करती? जब वह किसी किरदार की तरह सोचती है तो उसे प्रोत्साहित करें, लेकिन यह भी बताएं कि यह कल्पना है, वास्तविक नहीं। बच्चे के सवालों को कभी न टालें, चाहे वे किसी भी विषय से जुड़े हों। उसे समझाएं कि कहानी का उद्देश्य सीख देना है, न कि हर चीज को सच मानना। कल्पनाशक्ति को सही दिशा दें कल्पना की दुनिया बच्चे को सोचने का अवसर देती है, जो आगे चलकर क्रिएटिविटी, इनोवेशन और समस्या समाधान की क्षमता में बदलती है। बच्चे को प्रोत्साहित करें कि वह खुद भी कहानी बनाए। उससे कहें कि आज तुम मुझे कहानी सुनाओ। राजकुमारी की नहीं, किसी स्कूल के दिन की। इससे वह रियलिटी और फैंटेसी का फर्क खुद सीखने लगेगी। अंत में यही कहूंगी कि बच्चों को कहानी सुनाना सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि ब्रेन और पर्सनैलिटी डेवलपमेंट का माध्यम है। रोज कहानी सुनाना पूरी तरह ठीक है। बस यह ध्यान रखें कि कहानियों में सकारात्मकता हो और बच्चा उसके अर्थ को समझे। …………………….. पेरेंटिंग से जुड़ी ये स्टोरी भी पढ़िए पेरेंटिंग- 5 साल का बेटा बहुत सवाल पूछता है: जवाब देते-देते थक जाती हूं, सवाल पूछना तो ठीक पर जवाब देने की एनर्जी कहां से लाऊं अमेरिकन लेखक वॉरेन बर्गर अपनी किताब ‘ए मोर ब्यूटीफुल क्वेश्चन’ में बताते हैं कि 2 से 5 साल की उम्र के बीच बच्चे औसतन 40,000 सवाल पूछते हैं। बर्गर ने यह भी बताया है कि जैसे-जैसे बच्चे स्कूल जाने लगते हैं, उनके सवाल पूछने की संख्या घटने लगती है। पूरी खबर पढ़िए…

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