ब्लैकबोर्ड- राह चलते लोग कमर में हाथ डाल देते हैं:लड़के पूछते हैं- चिंकी पूरी रात का कितना लेती हो, आंखों की पलकें खींचकर बोलते हैं- ‘ऐ मोमो’

📅 Published: January 16, 2026 | 📂 Category: Uncategorized
Editor’s Note: This article is based on information from publicly available sources.
It has been curated and presented by the NewsForYou.live editorial team.

एक बार मैं दिल्ली में अपने दोस्तों के साथ एक कॉमन फ्रेंड के घर पार्टी में गया था। कुछ देर में एक लड़का मेरे पास आया और पूछा- ‘तुम नेपाली हो?’ मैंने बोला- ‘नहीं, मैं नॉर्थ ईस्ट से हूं।’ ये सुनते ही कहने लगा- ‘अच्छा… तुम लोग तो कुत्ता, बिल्ली, बंदर सब खाते हो न?’ उसकी बात सुनते ही वहां मौजूद सभी लोग हंसने लगे… मैं कोई जवाब नहीं दे पाया। कुछ देर बाद फिर एक लड़के ने पूछा- ‘तुम्हारे यहां तो ओपन सेक्स होता है न? लड़कियां होटल में काम करती हैं। कोई जान पहचान वाली लड़की हो तो मिलवाओ। वो तो मसाज भी अच्छा करती हैं। पूरी रात का कितना पैसा लेती हैं?’ वहां मौजूद सभी लोग दिलचस्पी से ये बातें सुन रहे थे। ये कोई पहली बार नहीं था, इसके पहले भी मेरी कई महिला दोस्तों के साथ ऐसा हो चुका है। दिल्ली के राह चलते लोग लड़कियों की कमर में हाथ डालकर पूछते हैं- ’कितने में चलोगी चिंकी?’ ब्लैकबोर्ड में इस बार स्याह कहानी नॉर्थ ईस्ट के लोगों की जो पढ़ाई और नौकरी के लिए अपने घर से दूर, दूसरे शहरों में रह रहे हैं और शक्ल-सूरत की वजह से नस्लभेद का शिकार होते हैं। त्रिपुरा के जॉर्ज चकमा 2014 में दिल्ली आए थे। फिलहाल, इंटरनेशनल स्टडीज में पीएचडी के चौथे साल के छात्र हैं। जॉर्ज बताते हैं कि ‘मेरे गांव में अब भी आंदोलन चल रहा है। उत्तराखंड में त्रिपुरा के एंजेल की हत्या के बाद से मेरे पेरेंट्स परेशान रहते हैं। हर रोज मेरी सुरक्षा को लेकर फोन करते हैं और कहते हैं कि सिर्फ जरूरी काम के लिए घर से बाहर निकलो। आखिर हम लोगों ने ऐसा क्या गुनाह किया है कि घर से बाहर न निकलें। यहां पढ़ने आए हैं और पढ़ना कोई गुनाह तो नहीं है?’ क्या एंजेल की तरह आपके साथ भी कभी नस्लीय हिंसा हुई? ‘हम नॉर्थ ईस्ट वालों के साथ ये सब बहुत सलीके से होता है। ऑटो वाले शक्ल देखकर ज्यादा पैसे मांगते हैं। किराए का कमरा लेने जाओ तो सबसे पहले पूछते हैं- क्या-क्या खाते हो? हमारे घर में कुत्ता-बिल्ली तो नहीं बनाओगे? पार्टी करते हो? ड्रग्स लेते हो? आखिर में पांच हजार का कमरा दस हजार में देते हैं। दुकानदार भी हमें महंगा सामान देते हैं।’ जॉर्ज खीझते हुए कहते हैं- ‘बार-बार ये साबित करना पड़ता है कि हम भारतीय हैं। एक बार मैं ताजमहल देखने गया। वहां आधार कार्ड दिखाने पर भी स्टाफ को यकीन नहीं हुआ कि मैं भारतीय हूं। वे बार-बार पूछते रहे- नेपाल से हो? वो मेरी बात पर यकीन ही नहीं कर रहे थे। विदेशियों की टिकट अलग होती है, इसलिए वो चाहते थे कि मैं ज्यादा पैसे दूं।’ अपनी यूनिवर्सिटी के बारे में बताते हुए जॉर्ज कहते हैं कि हमारी यूनिवर्सिटी में भी लोग नॉर्थ-ईस्ट के बारे में नहीं जानते। एक बार किसी ने पूछा कहां से हो? मैंने कहा त्रिपुरा से हूं तो कहने लगे वही त्रिपुरा जो साउथ में है। जब मैंने बताया नॉर्थ ईस्ट तो कहने लगे तुम्हारे यहां बर्फ पड़ती है क्या? क्या खाते हो तुम लोग? वीडियो में देखा है कि तुम लोग कुत्ता, बंदर, यहां तक कि इंसान भी खा लेते हो।’ आप सोचिए ये सवाल पीएचडी स्टूडेंट पूछते हैं। कुछ देर चुप रहकर जॉर्ज कहते हैं कि सबसे ज्यादा तकलीफदेह बातें तो वो होती हैं जो हमारे यहां की लड़कियों के बारे में कही जाती हैं। लड़कों को लगता है कि नॉर्थ-ईस्ट की लड़कियां कुछ भी करने को राजी हो जाती हैं। उनके चरित्र पर सवाल उठाते हैं। रेट पूछते हैं, छूते हैं, बिना पूछे कमरे में घुस जाते हैं। यह आम है।’ वे कहते हैं, ‘हमारी अंग्रेजी और फैशन सेंस अच्छा होता है, इसलिए हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में काम मिलता है। बस इसलिए लोग मान लेते हैं कि हम होटल में ही काम करते हैं और वे हमें ‘एग्जॉटिक’ समझते हैं।’ जॉर्ज से मिलने के बाद मैं दिल्ली में रह रहे मणिपुर के काकचिंग जिले के गांव सौरा के निवासी कबीर अहमद से मिलने पहुंची। कबीर के सामने मैंने जैसे ही नस्लीय हिंसा का जिक्र किया, वो दुखी होकर आपबीती सुनाने लगे। कबीर कहते हैं, ‘दिल्ली के महारानी बाग की बात है। एक शाम मैं अपने चचेरे भाई के साथ घर जा रहा था। अचानक एक कुत्ते का पिल्ला हमारे पीछे-पीछे चलने लगा। हमने घर पहुंचकर जल्दी से दरवाजा बंद कर लिया। वो हमारे दरवाजे पर ही बैठकर रोने लगा और दरवाजे पर पंजे मारता रहा। उसकी आवाज सुनकर कुछ ही देर में पूरा मोहल्ला हमारे दरवाजे पर खड़ा हो गया। उन्हें शक हुआ कि हम कुत्ता खाते हैं। हम बार-बार कहते रहे कि कुत्ता नहीं खाते हैं, लेकिन वो लोग चिल्लाते रहे कि तुम नॉर्थ ईस्ट के हो, झूठ बोल रहे हो।’ जब मैंने बताया, ‘मैं मुस्लिम हूं। मुसलमान कुत्ता नहीं खाते। तब जाकर भीड़ शांत हुई, लेकिन जाते हुए वो लोग मुझे धमकी देकर गए कि हमारे मोहल्ले में ये सब मत करना, वरना बचोगे नहीं।’ कबीर कहते हैं, ‘कुछ महीनों बाद मैंने वह घर छोड़ दिया।’ कबीर अहमद 2013 में मणिपुर से दिल्ली आए। दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के बाद वह अब एमए कर रहे हैं। उनका परिवार बॉर्डर इलाके में रहता है और पिता मणिपुर राइफल्स में हैं। कबीर कहते हैं, ‘दिल्ली आते वक्त पापा ने कहा था- अगर कभी बहस हो जाए, तो पहले सुरक्षित निकलने का रास्ता देखना।’ वह कहते हैं, ‘मेरी मुश्किल दोहरी है। मैं मुस्लिम भी हूं और नॉर्थ ईस्ट से भी। कई बार अपना नाम बताने से डर लगता है।’ कबीर के मुताबिक, उन्हें अंदाजा नहीं था कि राजधानी में उन्हें ‘चिंकी’, ‘मोमो’, ‘नेपाली’, ‘नूडल्स’ और ‘चींचींचूंचूं’ जैसे शब्दों से पुकारा जाएगा। उनके अनुसार, दिल्ली में रह रहे करीब 30 हजार नॉर्थ-ईस्ट के लोग रोज नस्लवादी भेदभाव झेलते हैं। दिल्ली में किस तरह की दिक्कतें आती हैं? ‘दिक्कत कहां नहीं है। कमरा जल्दी नहीं मिलता और अगर मिल भी जाए, तो हमारी शक्ल देखकर पांच हजार का कमरा दस हजार में दिया जाता है।’ वह महारानी बाग का एक अनुभव बताते हैं, ‘किराए का कमरा पूछने गया था। कुर्ता-पायजामा पहना था। एक घर की घंटी बजाते ही सामने वाले ने चिल्लाकर कहा- इस गली में क्यों आए हो? दोबारा आए तो काटकर फेंक दूंगा।’ कबीर कहते हैं, ‘जब तक घर के अंदर या अपने नॉर्थ ईस्ट के लोगों के बीच हूं, सब ठीक रहता है। बाहर निकलते ही बेइज्जती शुरू हो जाती है।’ वह बताते हैं कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान हिंदी समझ नहीं आती थी। ‘टीचर हिंदी में पढ़ाती थीं, इसलिए घर आकर कजिन से दोबारा पढ़ता था।’ डीयू के दिनों को याद करते हुए कबीर अफसोस भरे लहजे में कहते हैं, ‘ग्रेजुएशन के दौरान एक दिन मेरे ही क्लासमेट ने कहा- ‘ऐ मोमो, चिंकी। तुम लोग तो कुत्ता-बंदर सब खा लेते हो न?’ उस दिन बहुत धक्का लगा। उम्मीद नहीं थी कि दोस्त भी ऐसा बोलेगा।’ कबीर बताते हैं कि नॉर्थ ईस्ट की महिलाओं को लेकर भी भद्दी टिप्पणियां आम हैं। ‘पूछते हैं- तुम्हारे यहां फ्री सेक्स होता है न? कहते हैं हमारी लड़कियां सेक्स वर्कर होती हैं। उन्हें नहीं पता कि मणिपुर महिला-प्रधान समाज है, जहां लड़कियां दिन-रात सुरक्षित घूम सकती हैं।’ वह लाजपत नगर की एक घटना याद करते हैं। ‘मैं एक दोस्त और एक महिला मित्र के साथ मार्केट में था। एक आदमी ने मेरी दोस्त को छेड़ते हुए कहा-‘ऐ चाइनीज, चिंकचांकमाऊंमाऊं।’ दोस्त ने रोका तो उसने थप्पड़ मार दिया। मैंने विरोध किया तो भीड़ जमा हो गई और हमें चोर-चोर कहकर दौड़ाने लगी। उस दिन किसी तरह जान बचाई।’ कबीर लाजपत नगर की एक और घटना बताते हैं। ‘एक दिन मैं दोस्त के साथ मार्केट जा रहा था। एक कम उम्र का लड़का कपड़े बेच रहा था। हमें देखकर चिल्लाने लगा- ‘ऐ मोमो, कपड़ा खरीदेगा क्या? ऐ मोमो, मोमो?’ मुझे गुस्सा आ गया। मैंने पूछा- किसे मोमो बोल रहा है? बात बढ़ी तो भीड़ जमा हो गई। हालात बिगड़ते देख मैं वहां से निकल गया।’ कबीर कहते हैं, ‘कुछ दिन पहले विजयनगर में नॉर्थ ईस्ट के एक दुकानदार को सिर्फ इस शक में पीट दिया गया कि उसकी दुकान में बीफ है। न जांच हुई, न कोई बात सुनी गई- बस भीड़ टूट पड़ी।’ ‘यहां हमारी पहचान ही कई बार हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है।’ कबीर कहते हैं, ‘यह तो कुछ भी नहीं है। यहां हालात ऐसे हैं कि किसी कुत्ते को कुछ कह दो, तो जान पर बन आती है।’ ‘एक दिन मेरा भाई पार्क में टहल रहा था। एक आदमी अपने कुत्ते को घुमा रहा था। कुत्ता उसे काटने दौड़ा, तो भाई ने डर के मारे पांव से भगाया। उस पर कुत्ते का मालिक भड़क गया। उसने लोगों को इकट्ठा किया और भाई की पिटाई कर दी। उसी दिन उसे मोतीबाग का घर छोड़ना पड़ा।’ कबीर बताते हैं, ‘मैं एक जगह नौकरी करता हूं। हाल ही में ऑफिस ने पूरे दिन के लिए टैक्सी दी थी। ड्राइवर को बुलाया तो उसने कहा कि उसे सिर्फ एक जगह रुकने का आदेश है। मैंने कहा- ऑफिस ने पूरे दिन का भुगतान किया है, आप ऑफिस से बात कर लीजिए।’ कबीर के मुताबिक, ड्राइवर ने फोन पर ही उन पर चिल्लाते हुए कहा- ‘यह चिंकी, चाउमिन, नेपाली क्या बोल रहा है?’ फोन रखने के बाद उसने कहा, ‘मैं हरियाणा से हूं।’ उस दिन उससे काफी बहस हुई। कबीर बताते हैं, ‘मोहल्ले में तो कुछ लोगों की हिम्मत इतनी होती है कि वे हमारी आंखों की पलकें खींचकर कहते हैं- ‘ऐ छोटी आंख, चिंकी इधर आ।’ तब लगता है कि हमारी पहचान ही उनके लिए मजाक बन गई है।’ वह हाल की एक घटना का जिक्र करते हैं- ‘देहरादून में नस्लीय टिप्पणी के बाद त्रिपुरा के छात्र एंजेल चकमा की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। उसके पिता बीएसएफ में हैं। सोचिए, एक जवान के बेटे के साथ क्या हुआ?’ इस घटना के बाद उनके माता-पिता डर गए। कबीर बताते हैं, ‘पापा का फोन आया- कहां हो? घर लौट आओ। दिल्ली में रहने की जरूरत नहीं है। डर लगता है कि कहीं तुम्हें भी कुछ न हो जाए।’ सोचिए, हमारे माता-पिता किस डर में जीते हैं। इन बातों का आप पर क्या असर हुआ? कबीर कहते हैं, ‘लोग मुझे ‘मोमो’ कहकर चिढ़ाते थे। मुझे मोमोज पसंद थे, लेकिन अब खाना छोड़ दिया है। लगता है कोई ठेले के पास देख लेगा, तो फिर मजाक उड़ाएगा।’ हाथ जोड़कर वह कहते हैं, ‘हम कभी किसी से यह नहीं पूछते कि वह क्या खाता है। बस यही चाहते हैं कि हमारे खाने का भी सम्मान किया जाए।’ आंखों में आंसू भरे हुए कबीर पूछते हैं, ‘कहां है ‘इंडिया एक’? मेरे पापा और भाई इस देश के लिए काम करते हैं, लेकिन यहां हमें अपनाया नहीं जाता।’ फिलहाल कबीर सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेस की कोचिंग ले रहे हैं। क्या आप इस देश में स्वीकार किए गए हैं? वह कहते हैं, ‘मुझे शर्म आती है कि मुझे एक भारतीय के सामने खुद को भारतीय साबित करना पड़ रहा है। कई बार समझ नहीं आता- घर लौट जाऊं, खेत में काम करूं या कहां जाऊं। जितना भी कर लूं, यह देश हमें अपना नहीं मानता।’ क्या लगता है कि भारत आपका नहीं है? कबीर कुछ पल चुप रहते हैं, फिर कहते हैं, ‘अगर जवाब दूंगा, तो देशद्रोही कहलाऊंगा।’ थोड़ी देर बाद जोड़ते हैं, ‘घर के अंदर सब ठीक लगता है, लेकिन बाहर निकलते ही परेशानी शुरू हो जाती है। इसी डर से नॉर्थ ईस्ट के लोगों ने अपने संगठन बनाए हैं और हम एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।’ नॉर्थ ईस्ट से आई लड़कियों की मुश्किलें और भी ज्यादा हैं। 25 साल की सोजोम अरुणाचल प्रदेश के नेफ्रा जिले की हैं। 2023 में हायर स्टडीज के लिए जेएनयू आईं और फिलहाल दिल्ली के विजयनगर में रहकर यूपीएससी की तैयारी कर रही हैं। सोजोम कहती हैं, ‘मम्मी-पापा दोनों नौकरी करते हैं। मम्मी ने जेएनयू की पढ़ाई के बारे में सुना था, इसलिए मुझे यहां भेजा। दिल्ली आने के बाद मैं ज्यादातर जेएनयू परिसर तक ही सीमित रही। वहां लोग एक-दूसरे का सम्मान करते हैं, फिर भी कई बार लगता है कि मैं यहां की नहीं हूं।’ वह बताती हैं,‘एक दिन लाइब्रेरी में बैठी थी। मेरा एक क्लासमेट एक लड़की को लेकर गंदी बातें करने लगा। मैंने टोका और कहा कि मुझे ऐसी बातें सुननी पसंद नहीं। इस पर वह बोला- ‘मोमो, यहां से निकल।’ पहले लगा मजाक है, लेकिन उसने दोबारा वही कहा। मैं घबरा गई। जेएनयू ही वह जगह थी, जहां खुद को सुरक्षित समझती थी, और वहीं यह हुआ। उस रात कमरे में जाकर नींद नहीं आई। किताब खोली, फोन देखा, लेकिन दिमाग में बस ‘मोमो, मोमो’ गूंजता रहा। अगले दिन शिकायत करने की सोची। वाटर कूलर से पानी लेने गई तो वह भी वहीं मिला। मैंने कहा कि तुम्हारी चेयरपर्सन से शिकायत करने जा रही हूं। वह मेरे पीछे दौड़ा, मैं भाग रही थी। तभी एक साथी ने बीच-बचाव किया, तब मामला रुका। बाद में मैंने अपने कम्युनिटी के व्हाट्सएप ग्रुप में बताया। जवाब मिला-गलत हुआ है, लेकिन छोड़ दो। ‘नॉर्थ ईस्ट को मोमो’ कहे जाने की शिकायत कोई नहीं सुनता।’ सोजोम कहती हैं, ‘जब जेएनयू जैसी जगह पर यह हाल है, तो बाहर की स्थिति समझी जा सकती है। सड़क पर चलते वक्त हमेशा डर लगा रहता है कि कोई मुझे ‘मोमो’ या ‘चिंकी’ न कह दे। कुछ लोग कहते हैं कि ‘मोमो’ प्यार से बोला जाता है, लेकिन हमारे लिए यह नस्लभेदी शब्द है। अगर आप संवेदनशील हैं, तो कृपया इसे हमारे लिए इस्तेमाल न करें।’ क्या नॉर्थ ईस्ट वालों के लिए डबल मीनिंग बातें होती हैं? सोजोम कहती हैं,‘कुछ दिन पहले मेट्रो में दो लड़कों ने मेरी ओर देखकर कहा- ‘येलो लाइन पर तो बहुत सारी चाइनीज और जापानी लड़कियां मिलती हैं।’ मुझे पता था कि वे मुझे निशाना बना रहे हैं, लेकिन शिकायत का कोई सबूत नहीं था। यहां लड़कों को लगता है कि हमारा पहनावा अलग है, हम शॉर्ट स्कर्ट पहनते हैं, इसलिए हम सेक्स वर्कर हैं। वे कभी नॉर्थ ईस्ट जाकर देखें। वहां के लोग फैशनेबल भी हैं और पढ़े-लिखे भी। हो सकता है हमारा पहनावा अलग हो, लेकिन क्या कहीं लिखा है कि पढ़ाई के साथ फैशन नहीं हो सकता? हमें लगा था दिल्ली मेट्रो सिटी है, सब ठीक होगा, लेकिन हम गलत थे।’ क्लास में भी लोग अक्सर उल्टे-सीधे सवाल पूछते हैं, जैसे- ‘तुम्हारे यहां फ्री सेक्स होता है?’ वह कहती हैं, ‘लोग मेरे खाने को अजीब कहते हैं। अगर मैं दिल्ली आकर छोले-भटूरे, इडली-डोसा खा सकती हूं, तो मेरा खाना अजीब क्यों है? आपको नहीं खाना मत खाइए, लेकिन अजीब क्यों कहना?’ सोजोम बताती हैं,‘नस्लीय हमला सिर्फ सड़क पर नहीं, सोशल मीडिया पर भी होता है। कुछ महीने पहले राजनीतिक बहस के बाद एक लड़की ने मुझे डीएम में ‘मोमो’, ‘चिंकी’, ‘चाइनीज’ कहकर धमकी दी- ‘रुको, सबक सिखाती हूं।’ उसने मेरी 12–13 तस्वीरें अपलोड कर अपमानजनक टिप्पणियां कीं। मैं बहुत डर गई। मां से कहा कि पुलिस में शिकायत करना चाहती हूं, लेकिन मां ने मना किया- डर था कि वह लड़की कुछ लड़कों के साथ मुझे नुकसान पहुंचा सकती है। मैं बस अपनी मां को परेशान नहीं करना चाहती। पढ़ाई के लिए आई हूं। कम से कम लोग नॉर्थ ईस्ट के उन लोगों को जानें, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में अपना खून बहाया। क्या इन घटनाओं का आप पर मानसिक असर पड़ता है? सोजोम कहती हैं,‘जब कुछ गलत होता है, तो बार-बार वही बातें दिमाग में चलती हैं और परेशान करती हैं। खुद से कहती हूं- चलो, जाने दो। फोन देखती हूं, किताब खोलती हूं, फिर भी कई दिन किसी चीज में मन नहीं लगता। एंजेल चकमा की देहरादून में हत्या के बाद दोस्तों ने समझाया- बाहर ज्यादा मत बोलना, गलत चीजें नजरअंदाज करना। पेरेंट्स भी यही कहते हैं। लेकिन कई बार लगता है कि चीखूं- मैं भी भारतीय हूं। बेजवाड़ा कमेटी ने नस्लभेदी शब्दों का जिक्र किया, पर कौन मानता है? आज भी हमें ‘चींचींचूंचूं’ कहा जाता है। कार्रवाई कौन करेगा? पुलिस ने एंजेल चकमा मामले में कहा कि यह नस्लवाद नहीं था। हम शांतिप्रिय हैं, किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते, फिर भी बार-बार साबित करना पड़ता है कि हम इस देश के हैं।’ 1- ब्लैकबोर्ड-पापा को फांसी दिलाकर आत्महत्या कर लूंगी:कहते थे ब्राह्मण होकर नीच से शादी कैसे की, गोली मारकर बोले- अब मैं बहुत खुश हूं ‘हम दोनों की लव मैरिज को तीन महीने बीत चुके थे। लग रहा था कि अब घर वाले शांत हो गए हैं और हमारी जिंदगी से उन्हें कोई लेना-देना नहीं रह गया है, लेकिन 5 अगस्त 2025 की शाम, करीब 5 बजे, सब कुछ बदल गया।’ पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड-तलाक हुआ तो अनजान डोनर से स्पर्म लेकर मां बनी:विदेश ले जाकर पति ने घर से निकाला, बिना पति के महिलाओं की कहानियां मेरी चीख सुनकर पड़ोसी जमा हो गए। बिस्तर से उठी तो देखा- मेरी सास ही तौलिए से मेरा मुंह दबा रही थीं। वह जोर-जोर से कह रही थीं- तूने मेरे बेटे को खा लिया। तू मांगलिक है। कुलच्छन है। अब अपने बच्चे को लेकर यहां से भाग जा, नहीं तो तुझे जिंदा नहीं छोड़ूंगी। पूरी खबर यहां पढ़ें

Read more


📱 Share on WhatsApp

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *