मेंटल हेल्थ– मुझे आलोचना बर्दाश्त नहीं होती:कोई मेरी कमी निकाले, मेरी गलती बताए तो मैं दोस्ती तोड़ लेती हूं, खुद को कैसे बदलूं

📅 Published: December 12, 2025 | 📂 Category: Uncategorized

सवाल– मेरी उम्र 30 साल है। मैं पेशे से डेटा एनालिस्ट हूं। मेरी प्रॉब्लम ये है कि मैं क्रिटिसिज्म नहीं सह पाती। फ्रेंड्स मेरी बुराई करें तो मैं दोस्ती तोड़ लेती हूं। मैं डेट पर नहीं जाती क्योंकि मुझे रिजेक्शन का डर लगता है। ऑफिस में कोई मेरे काम को लेकर फीडबैक दे तो मैं उससे भी बात करना बंद कर देती हूं। मेरी मां बहुत ज्यादा स्ट्रिक्ट थीं और हमेशा हर बात के लिए डांटती, क्रिटिसाइज करती थीं। इस चीज को लेकर मेरे मन में इतना ज्यादा रिएक्शन और गुस्सा भर गया है कि अब ये मेरी प्रोफेशनल लाइफ पर असर डाल रहा है। मुझे ऑफिस में कई बार ये कहा जा चुका है कि मेरा सोशल बिहेवियर अप्रोप्रिएट नहीं है। फीडबैक को लेकर नाराज हो जाना, उसे नेगेटिव तरीके से लेना ठीक नहीं है। मैं भी ये समझ पा रही हूं, लेकिन अपनी सोच और बिहेवियर को चेंज कैसे करूं। एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। सवाल पूछने के लिए आपका बहुत शुक्रिया। आप जिस परेशानी से गुजर रही हैं, वो आपकी कोई व्यक्तिगत कमी नहीं है। आलोचना न सह पाना, फीडबैक को पॉजिटिव तरीके से न ले पाना किसी व्यक्ति की अपनी कमजोरी नहीं है। ये एक प्रेडिक्टेबल पैटर्न है, जिसका संबंध हमारे बचपन के अनुभवों से है। अगर हमारी परवरिश एक ऐसे माहौल में हुई, जहां गलती करना एक्सेप्टेबल नहीं था, मामूली सी कमी पर भी बहुत डांट पड़ती या नेगेटिव तरीके से आलोचना की जाती थी तो इसका प्रभाव हमारे एडल्ट बिहेवियर में भी दिखाई देगा। रॉयल कॉलेज ऑफ साइकेट्रिस्ट्स (RCPsych) और नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ एंड केयर एक्सेलेंस (NICE) के मॉडल बताते हैं कि बहुत ज्यादा क्रिटिकल माहौल में पले-बढ़े बच्चों में अक्सर कुछ इस तरह की साइकोलॉजी विकसित होती है: बहुत ज्यादा आलोचना के माहौल में पला हुआ बच्चा बड़ा होकर ऐसे एडल्ट में बदल सकता है, जो- ये सब इमोशनल रिएक्शन हैं, जो परवरिश से मिले हैं। ये ऐसा फिक्स कैरेक्टरस्टिक नहीं है, जिसे अपने प्रयास से बदला नहीं जा सकता है। इमोशनल व्यवहार की क्लिनिकल व्याख्या आगे कुछ बिंदुओं में इस तरह के इमोशनल व्यवहार को मनोविज्ञान के नजरिए से समझाने की कोशिश की गई है। चाइल्डहुड क्रिटिसिज्म का यकीन में बदलना अब सवाल ये उठता है कि ऐसा होता क्यों है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बचपन में लगातार हो रही आलोचना से बच्चे के मन में एक बिलीफ सिस्टम यानी एक गहरा विश्वास बैठ जाता है। वो यकीन करने लगता है कि– इमोशनल मेमोरी एक्टिवेशन सेफ्टी बिहेवियर्स फंक्शनल इंपैक्ट इस व्यवहार का प्रभाव कई तरीकों से हमारे एडल्ट लाइफ के रिश्तों और जीवन पर पड़ता है। जैसेकि- आप आलोचना को कैसे लेते हैं? सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट करें यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में तीन सेक्शंस में कुल 10 सवाल हैं। सेक्शन A में इमोशनल प्रतिक्रिया, B में व्यावहारिक प्रतिक्रिया और C में थिंकिंग पैटर्न से जुड़े सवाल हैं। आपको इन सवालों को ध्यान से पढ़ना है और 0 से 3 के स्केल पर इसे रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल का आपका जवाब अगर ‘कभी नहीं’ है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब ‘हमेशा’ है तो 3 नंबर दें। अंत में अपने टोटल स्कोर की एनालिसिस करें। नंबर के हिसाब से उसका इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में दिया है। जैसेकि अगर आपका स्कोर 0 से 8 के बीच है तो इसका मतलब है कि आप आलोचना को लेकर मामूली सेंसिटिव हैं। लेकिन अगर आपका स्कोर 27 से ज्यादा है तो आपको CBT थेरेपी और प्रोफेशनल हेल्प की जरूरत है। आलोचना और फीडबैक में क्या फर्क है बचपन में हम कमजोर और दूसरों पर निर्भर होते हैं। लेकिन एडल्ट होने के बाद अपने जीवन की जिम्मेदारी और एजेंसी हमारे हाथों में होती है। इसलिए हम अपने एडल्ट बिहेवियर के साइकोलॉजिकल कारणों को समझकर उसे बदलने की कोशिश कर सकते हैं। इसलिए यहां यह समझना जरूरी है कि आलोचना और फीडबैक में क्या फर्क है। नीचे ग्राफिक में देखिए– क्यों जरूरी है कंस्ट्रक्टिव क्रिटिसिज्म कठोर चाइल्डहुड एन्वायर्नमेंट ने बच्चे को ये यकीन दिलाया कि आलोचना का मतलब रिजेक्शन होता हैं। वहीं फर्ज करिए कि अगर प्यार और संवेदनशीलता के साथ बच्चे को फीडबैक दिया जाता, गलतियां सुधारने और खुद को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित किया जाता तो इसका नतीजा बिल्कुल उलटा होता। वो व्यक्ति क्रिटिसिज्म को पॉजिटिव तरीके से लेता। कंस्ट्रक्टिव क्रिटिसिज्म बेहद जरूरी और पॉजिटिव चीज है, जो हमें हमेशा बेहतर बनाने का काम करती है। पर्सनल से लेकर प्रोफेशनल स्पेस में कंस्ट्रक्टिव क्रिटिसिज्म बहुत अहम भूमिका अदा करता है। नीचे ग्राफिक में देखिए कि ये क्यों जरूरी है। अपना बिहेवियर पैटर्न कैसे बदलें CBT (कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी) की मदद से हम अपनी सोच और बिहेवियर पैटर्न को बदल सकते हैं। इसके लिए मैं यहां आपको कुछ टूल दे रहा हूं। टूल 1 पॉज-नेम-रीफ्रेम जब कोई आलोचना करे, कमी बताए या फीडबैक दे तो तुरंत रिएक्ट करने की बजाय- टूल: 2 2 ट्रुथ मेथड खुद से ये दोनों सच दोहराएं: टूल 3 अपने बुनियादी विश्वास को बदलना टूल 4 बिहेवियर प्रैक्टिस (बदलाव के लिए जरूरी) प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी अगर स्थिति सामान्य सेल्फ हेल्प से न सुधरे तो आपको प्रोफेशनल हेल्प की जरूरत पड़ सकती है। नीचे ग्राफिक में दिए पॉइंट्स देखें। इन स्थितियों में प्रोफेशनल हेल्प लेना मददगार हो सकता है। निष्कर्ष परिवारों में बच्चों को डिसिप्लिन करने या प्रेरित करने के लिए आलोचना का इस्तेमाल किया जाता है। बच्चों को अक्सर सुधार के साथ-साथ आश्वासन नहीं मिलता। इसी कारण बड़े होने पर, वे फीडबैक को थ्रेट या रिजेक्शन के रूप में देखते हैं। इस कल्चरल बैकग्राउंड को समझने पर हम खुद को दोष नहीं देंगे और अपने इमोशनल रिएक्शन के कारणों को बेहतर समझ पाएंगे। आलोचना के प्रति आपका संवेदनशील होना स्वाभाविक है। लेकिन इसे बदला जा सकता है। आपको अपने इमोशनल बिहेवियर पर काम करने की जरूरत है। आप अपने बुनियादी यकीन को बदल सकती हैं। इसका प्रभाव आपके आत्मविश्वास और रिश्तों पर भी पड़ेगा। जब आपके इमोशनल रिएक्शन बदलेंगे तो आपका पर्सनल और प्रोफेशनल स्पेस ज्यादा सुंदर और सेफ महसूस होगा। ……………… ये खबर भी पढ़िए मेंटल हेल्थ– मेरा हसबैंड गे है, घरवाले ये नहीं जानते: मैं तलाक के लिए कहती हूं तो आत्महत्या की धमकी देते हैं, मैं क्या करूं आप एक बहुत तकलीफदेह अनुभव से गुजर रही हैं। शादी का संबंध एक भरोसे और विश्वास के साथ शुरू होता है। इस रिश्ते में भरोसे की जगह आपको दुख, धोखा और अकेलापन मिला। इस दुख की कई परतें हैं। यह इमोशनल, सेक्शुअल पेन तो है ही, साथ ही इसकी कई सांस्कृतिक परतें भी हैं। पूरी खबर पढ़िए…

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