भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में सीताजी को करुणा, पवित्रता और सहनशीलता की मूर्ति माना गया है। वे केवल श्रीराम की अर्धांगिनी नहीं, बल्कि मर्यादा, धैर्य और सत्य की वह उज्ज्वल ज्योति हैं, जिनकी कृपा से साधक के भीतर निर्मल मति का उदय होता है। यह विचार जगदगुरु रामानुजचार्य स्वामी रत्नेश प्रपन्नाचार्य ने व्यक्त किया। वे चक्रवर्ती राजा दशरथ महल में श्रीसीताराम विवाह उत्सव के अवसर पर आयोजित रामकथा में कथा व्यास के तौर पर अपना प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि सीताजी का जीवन स्वयं एक संदेश है जिससे मन की शुद्धि बाहरी साधनों से नहीं, वरन् आदर्श आचरण, निष्ठा और भगवद्-चरणों में पूर्ण समर्पण से प्राप्त होती है।सीता का चरित्र जितना उज्ज्वल है, उतना ही मन को निर्मल करने वाला। उनके प्रत्येक निर्णय में धर्म का प्रकाश और हृदय के पूर्ण निःस्वार्थ होने का भाव झलकती है। उन्होंने कहा कि जब साधक उनका चिंतन करता है, तो वही प्रकाश उसके अंतःकरण को भी आलोकित कर देता है। जैसे श्वेत कमल जल को सुगंधित करता है, वैसे ही सीता का स्मरण मन को पवित्र करता है ।वनवास, रावण-हरण, अग्नि-परीक्षा—सीताजी ने प्रत्येक परिस्थिति में अद्भुत धैर्य रखा। सीता जी की यह क्षमता बताती है कि कठिनाइयों के बीच भी मन को संतुलित रखना ही निर्मल मति का आधार है। इस धैर्य की छाया में साधक का मन भी स्थिर होता है, और स्थिर मन ही निर्मल हो पाता है। जगदगुरु रत्नेश प्रपन्नाचार्य ने कहा कि सीताजी करुणा की साक्षात मूर्ति हैं। वे किसी के प्रति कठोर भाव नहीं रखतीं, बल्कि सबके लिए मंगलकामना ही करती हैं। करुणा मन को कोमल और शांत बनाती है; और जहां करुणा है, वहां मलिनता का प्रवेश नहीं होता।
सीताजी की कृपा का अर्थ ही है कि हृदय में करुणा का प्राकट्य। सीता का सम्पूर्ण जीवन श्रीराम के प्रति समर्पण का संदेश देता है। यही समर्पण साधक के मन की दिशाहीनता को समाप्त कर देता है। समर्पित मन स्वतः ही निर्मल और शांत हो जाता है, क्योंकि वह इच्छाओं के बोझ से मुक्त होता है। उन्होंने कहा कि जब सीता मैय्या की कृपा मिलती है, तो साधक की बुद्धि ‘मति-शुद्धि’ से परिपूर्ण होती है। निर्णयों में स्पष्टता, व्यवहार में सरलता और सोच में पवित्रता स्वतः आने लगती है।सीताजी की कृपा, अंतःकरण में वह प्रकाश जलाती है जिसमें अहंकार, संशय और अविवेक स्वयं जलकर भस्म हो जाते हैं। सीताजी का ध्यान करने वाला व्यक्ति केवल उनका भक्त नहीं—वह निर्मल मन और पवित्र जीवन का अधिकारी बन जाता है।
उनकी कृपा वही पाता है, जो अपने हृदय को करुणा, धैर्य और समर्पण से सजाकर उनके चरणों में अर्पित कर देता है। सच है कि सीता माता की कृपा हो जाए तो मन का अंधेरा छंट जाता है और भीतर निर्मल, शांत और दिव्य मति का उदय हो जाता है। इससे पहले कथा का आरंभ श्रीरामचरित मानस और कथा व्यास के पूजन से हुआ। दशरथ महल के महंत देवेंद्र प्रसादाचार्य, जगद्गुरु अर्जुन द्वाराचार्य स्वामी कृपालु रामभूषण देवाचार्य, जगदगुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य,डॉ० रामानंद दास, महामंडलेश्वर गिरीश दास, पत्थर मंदिर के महंत मनीष दास, महंत कमला दास रामायणी, नागा रामलखन दास,महंत बलराम दास हनुमानगढ़ी,रामशरणदास रामायणी,रामकृष्ण दास और मेयर गिरीशपति त्रिपाठी ने व्यास पीठ का पूजन किया।
रामकथा के साथ दशरथ महल में श्रीराम विवाह उत्सव शुरू:महंत देवेंद्रप्रसादाचार्य ने कथा व्यास जगदगुरु रत्नेश प्रपन्नाचार्य और मानस की आरती की
📅 Published: November 21, 2025 |
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