सरयू से संगम तक ‘आप’ की पदयात्रा:मुस्लिम-बैकवर्ड की भीड़ ने बदला समीकरण, सपा–कांग्रेस को लग सकता है करारा डेंट

📅 Published: November 28, 2025 | 📂 Category: Uncategorized

यूपी में 2027 के विधानसभा चुनाव में अभी एक साल बाकी है, लेकिन सियासी जमीन तैयार होना शुरू हो चुकी है। दिल्ली में कमजोर हुई आम आदमी पार्टी अब उत्तर प्रदेश में पांव जमाने की कोशिश में है। इसके लिए जिम्मा पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह को दिया गया है, जो सरयू से संगम तक की पदयात्रा निकालकर पूर्वांचल की राजनीतिक नब्ज समझने में जुटे हैं।दैनिक भास्कर ऐप ने इस पदयात्रा के राजनीतिक मायने और उसके असर की अंदरूनी पड़ताल की है। 12 नवंबर को संजय सिंह ने अयोध्या के देवकली चौराहे से “रोजगार दो–सामाजिक न्याय दो” नारे के साथ यात्रा शुरू की। तीसरे दिन यात्रा सुल्तानपुर, फिर अमेठी और 19 नवंबर को प्रतापगढ़ पहुंची। 22 नवंबर को प्रयागराज की सीमा में प्रवेश कर 24 नवंबर को सिविल लाइंस के पथर गिरजाधर में इसका समापन हुआ।यह यात्रा दूरी से ज्यादा भीड़ की संरचना को लेकर चर्चा में रही—जहां पार्टी कार्यकर्ताओं से अधिक संजय सिंह के पुराने समर्थक और स्थानीय सामाजिक समूह जुड़े दिखे। सुल्तानपुर से दिल्ली तक, संजय सिंह की जड़ों और प्रभाव की कहानी सुल्तानपुर निवासी संजय सिंह की राजनीति की शुरुआत शहर के पटरी–गुमटी आंदोलन से हुई। उनके पुराने साथी अशोक सिंह बताते हैं कि अन्ना आंदोलन ने उन्हें जिला स्तर से सीधे दिल्ली के बड़े मंच तक पहुंचाया।यात्रा के दौरान भी संजय सिंह गरीबों, मजदूरों और बच्चों के बीच दिखाई दिए—वही छवि जो उन्होंने वर्षों में बनाई है। यात्रा में अमर सिंह के करीबी शशि सिंह की एंट्री सुल्तानपुर में यात्रा के दौरान अमर सिंह के करीबी रहे शशि सिंह का दिखना राजनीतिक चर्चाओं में रहा। सपा में लंबे समय से साइडलाइन माने जाने वाले शशि सिंह की इस यात्रा में मौजूदगी को कई लोग संकेत मान रहे हैं।हालांकि खुद शशि सिंह इसे “सिर्फ व्यक्तिगत मुलाकात” बताते हैं, लेकिन स्थानीय राजनीति में इसे सरल घटना नहीं माना जा रहा। मुस्लिम और बैकवर्ड वर्ग की बड़ी मौजूदगी वरिष्ठ पत्रकार एस.ए. रिज़वी कहते हैं—”यात्रा में मुस्लिम और बैकवर्ड वर्ग की मौजूदगी बताती है कि वोटर का रुझान बदल रहा है। संजय सिंह गरीब-वंचित समाज में पहले से पकड़ रखते हैं। यह स्थिति समाजवादी पार्टी के लिए निश्चित ही चिंता का विषय है। भीड़ में स्वर्ण वर्ग कम लेकिन मुस्लिम-बैकवर्ड की मजबूत मौजूदगी राजनीतिक समीकरण का नया संकेत दे रही है। राजनीतिक मामलों के जानकार बृजेश उपाध्याय का मानना है कि यह यात्रा सामाजिक मुद्दों से ज्यादा राजनीतिक चाल की तरह दिखती है।”जहां–जहां कांग्रेस या सपा मजबूत होती है, वहां ‘आप’ चुनाव लड़कर विपक्ष को डैमेज करती है। गोवा, पंजाब, गुजरात, हरियाणा इसके उदाहरण हैं। पूर्वांचल की कई सीटें सपा और कांग्रेस के खाते में हैं। ऐसे में यह यात्रा सीधे तौर पर उन्हें नुकसान पहुंचाकर भाजपा को फायदा देती दिखती है।” 2027 से पहले समीकरण बदलने की कोशिशें तेज 2024 लोकसभा चुनाव में पूर्वांचल की 12 सीटों में से 9 पर BJP को हार मिली।2022 विधानसभा चुनाव में भी पूर्वांचल में पार्टी को भारी नुकसान हुआ था।ऐसे में राजनीतिक जानकार मानते हैं कि सत्तारूढ़ दल इस क्षेत्र में किसी भी नई राजनीतिक हलचल को हल्के में नहीं ले सकता—और ‘आप’ की यह पदयात्रा उसी रणनीतिक तैयारी का एक हिस्सा हो सकती है।

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