सहारनपुर से कारी इसहाक गोरा का माताओं को संदेश:कहा- मोबाइल और डर से नहीं, मोहब्बत से करें बच्चों की परवरिश

📅 Published: December 3, 2025 | 📂 Category: Uncategorized

सहारनपुर में जमीयत दावातुल मुस्लिमीन के संरक्षक और प्रसिद्ध देवबंदी उलेमा मौलाना कारी इसहाक गोरा ने बच्चों की शिक्षा और परवरिश पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने एक वीडियो बयान जारी कर कहा कि वर्तमान में बच्चों के पालन-पोषण में ऐसी गंभीर त्रुटियां हो रही हैं, जो उनके नैतिक मूल्यों, सोच और व्यक्तित्व को भविष्य में नुकसान पहुंचा सकती हैं। उन्होंने बताया कि आजकल माता-पिता बच्चे के रोने या जिद करने पर उसे चुप कराने के लिए मोबाइल फोन दे देते हैं। यह तरीका तात्कालिक रूप से आसान लग सकता है, लेकिन लंबे समय में यह बच्चे के मानसिक विकास और आदतों के लिए हानिकारक सिद्ध होता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ज्यादातर लोग इस पर ध्यान नहीं देते कि बच्चा मोबाइल पर क्या देख रहा है और किस तरह के दृश्य या शब्द उसके मन पर प्रभाव डाल रहे हैं। कारी इसहाक गोरा ने कहा, “जो बच्चा आंखों से देखता है, वही दिल पर उतर जाता है और दिल पर बैठी चीज़ को मिटाना आसान नहीं होता।” मां की गोद बच्चे का पहला मदरसा होती कारी इसहाक गोरा ने इस्लामी शिक्षाओं का हवाला देते हुए कहा कि मां की गोद बच्चे का पहला मदरसा होती है। बच्चे की पहली सीख, संस्कार और सोच वहीं से विकसित होती है। यदि यह माहौल मोबाइल, कार्टून और अनुचित सामग्री से भर दिया जाए, तो बच्चे से मजबूत चरित्र और अच्छे संस्कारों की उम्मीद करना व्यर्थ है। उन्होंने एक अन्य सामान्य लेकिन खतरनाक प्रवृत्ति पर भी आपत्ति जताई। कई माताएं बच्चे को चुप कराने के लिए कहती हैं, “चुप हो जा, अल्लाह की रहमत पकड़ लेगी।” मौलाना ने इसे सोच और आस्था दोनों के लिए गलत बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अल्लाह की रहमत डराने के लिए नहीं, बल्कि सहारा देने के लिए है। रहमत से डर पैदा करने से बच्चे के मन में धर्म के प्रति नफरत भी पैदा हो सकती है। यही रास्ता बच्चों को बेहतर इंसान और सच्चा मुसलमान बनाने का कारी इसहाक गोरा ने अभिभावकों से सवाल किया कि क्या वे बच्चों की धार्मिक, नैतिक और आध्यात्मिक जरूरतों को उतनी अहमियत दे रहे हैं, जितनी देनी चाहिए? उन्होंने पूछा कि क्या अपनी सुविधा के लिए वे बच्चों के भविष्य से समझौता तो नहीं कर रहे हैं? कारी इसहाक गोरा ने अंत में अपील की कि बच्चों की परवरिश डर या मोबाइल से नहीं, प्यार और सही मार्गदर्शन से की जानी चाहिए, बल्कि मोहब्बत, दुआ, सही इस्लामी समझ और हौसला-अफजाई से की जाए। यही रास्ता बच्चों को बेहतर इंसान और सच्चा मुसलमान बनाने का है।

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