25 साल बाद बसपा को मिला OBC जिलाध्यक्ष:निषाद नेता पर लगाया दांव; कई सीटों पर पड़ेगा असर

📅 Published: January 29, 2026 | 📂 Category: Uncategorized

पिछले कई चुनावों से खराब प्रदर्शन कर रही बसपा इस बार सत्ता तक पहुंचने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। 25 साल बाद पार्टी के संगठन में भी बड़ा फेरबदल किया गया है। गोरखपुर में इस बार OBC जिलाध्यक्ष बनाया गया है। मुख्य मंडल प्रभारी रहे हरिप्रकाश निषाद को बसपा सुप्रीमो ने गोरखपुर का नया जिलाध्यक्ष बनाया है। गोरखपुर की कई सीटों पर निषाद मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है। इसके बहाने पार्टी निषाद वोटरों को साधने के प्रयास में है। हरिप्रकाश निषाद लंबे समय से बसपा की राजनीति कर रहे हैं। वह 1997 में बसपा में आए थे और तबसे लगातार इसी पार्टी के साथ हैं। पिपराइच क्षेत्र से वह जिला पंचायत सदस्य भी रह चुके हैं। पार्टी की स्थिति चाहे जैसी रही हो, वह पार्टी से कभी अलग नहीं हुए। निषाद मतदाताओं में भी उनकी अच्छी पहचान मानी जाती है। आमतौर पर एससी नेता पर भरोसा करती रही हैं मायावती
बसपा सुप्रीमो भले ही सोशल इंजीनियरिंग की बात करती रही हों लेकिन उनका भरोसा संगठन के प्रमुख के तौर पर एससी नेताओं पर ही रहता था। लेकिन इस बार बसपा सुप्रीमो हर हाल में सरकार बनाने की कवायद में जुटी हैं। दलित के साथ मुस्लिम पर भी उनका जोर रहा है। लेकिन इस बार OBC मतदाताओं पर फोकस बढ़ाया गया है। इसी क्रम में गोरखपुर सहित कुछ अन्य जिलों में OBC वर्ग से जिलाध्यक्ष बनाए जा रहे हैं। जानिए गोरखपुर की किन सीटों पर प्रभारी हैं निषाद मतदाता
निषाद मतदाताओं की संख्या यूं तो लगभग सभी विधानसभा क्षेत्रों में अच्छी-खासी है। लेकिन गोरखपुर ग्रामीण, पिपराइच, कैंपियरगंज, चौरी चौरा में निषाद मतदाता प्रभावी भूमिका में हैं। पिपराइच क्षेत्र से ही बसपा के नए जिलाध्यक्ष भी ताल्लुक रखते हैं। बसपा के टिकट पर यहीं से निषाद नेता स्व. यमुना निषाद को जीत मिली थी। अब माना जा रहा है कि निषाद जिलाध्यक्ष बनने के बाद गोरखपुर में पार्टी के प्रदर्शन पर फर्क जरूर नजर आएगा। अब जानिए इससे पहले कब OBC नेता को मिली थी कमान
गोरखपुर में बसपा के जिलाध्यक्ष पद पर इससे पहले सन 2000 में OBC नेता को बैठाया गया था। यह नेता निषाद समाज से ही हैं। पार्टी ने रामभुआल निषाद को जिलाध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी दी गई थी। यह वह दौर था जब बसपा अपने उत्थान पर थी और मायावती दो बार सीएम बन चुकी थीं। पार्टी की नीति में बड़ा बदलाव
बसपा ने जब 2007 में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई तो इसका श्रेय सोशल इंजीनियरिंग को दिया गया। यानी दलितों के साथ सवर्णों का वोट पाने में भी पार्टी सफल रही थी। इसके बावजूद संगठन में महत्वपूर्ण पद पर जल्दी किसी दूसरी जाति के नेता को नहीं बैठाया। वरिष्ठ पत्रकार अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि यह रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव है। यह बदलाव करके चार प्रमुख दलों में बसपा इकलौती पार्टी बन गई है। इसका असर चुनाव पर भी देखने को मिलेगा। एक सप्ताह पहले जिलाध्यक्ष बनाए गए घनश्याम राही की जिम्मेदारी बदली लगभग एक सप्ताह पहले ही घनश्या राही को दूसरी बार जिलाध्यक्ष की कमान सौंपी गई थी लेकिन बसपा सुप्रीमो ने उनकी जगह अनुभवी चेहरे को जिम्मेदारी दी है। घनश्याम को मंडल प्रभारी बनाया गया है।

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