‘पश्चिम बंगाल में जब लेफ्ट की सरकार थी और बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री थे, तब उस मकान को लाइब्रेरी बना दिया गया। तभी उसकी मरम्मत भी की गई थी और लाइब्रेरी भी रेगुलर चलती थी। ममता सरकार के आने के बाद से हालत बदतर हो गई है। लाइब्रेरी बंद पड़ी है। हम आज तक वहां जब भी गए, बंद ही मिली। इस सरकार में न हमें कोई पूछने वाला है और न हमारी विरासत को।‘ राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम‘ लिखने वाले बंकिम चंद्र चटोपाध्याय की पांचवीं पीढ़ी से आने वाले सजल चट्टोपाध्याय सरकार की बेरुखी से नाराज हैं। वो कोलकाता में मौजूद बंकिम चंद्र के घर की जर्जर हालत के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका कहना है कि जिस मकान को धरोहर मानकर लिया, उसे ही उसके हाल पर छोड़ दिया गया। 7 नवंबर को वंदे मातरम् गीत को 150 साल पूरे होने पर BJP ने देश भर में प्रोग्राम किए थे। इसी दौरान कोलकाता में बंकिम चंद्र के लाइब्रेरी बन चुके मकान के रखरखाव के मामले ने भी तूल पकड़ा। अब 8 दिसंबर यानी आज संसद के दोनों सदनों में वंदे मातरम् पर विशेष चर्चा होनी है। इससे पहले दैनिक भास्कर कोलकाता में 5-प्रताप चटर्जी स्ट्रीट पर मौजूद बंकिम चंद्र के घर पर पहुंचा। हमने घर का हाल देखा। साथ ही उनके वंशजों और आस-पास रहने वालों से बात कर पूरा मामला समझा। पढ़िए ग्राउंड रिपोर्ट… मकान को धरोहर बनाया लेकिन मरम्मत और साफ-सफाई भूले
सबसे पहले हम कोलकाता में बंकिम चंद्र के मकान पहुंचे, जिसके रखरखाव को लेकर सारा विवाद है। सड़क के एक तरफ मेडिकल कॉलेज और दूसरी ओर गली है। पश्चिम बंगाल में रही लेफ्ट की सरकार ने मकान का अधिग्रहण कर लिया था। इसे लाइब्रेरी में तब्दील कर 2006 में शुभारंभ भी कर दिया गया था। इसके बाहर लगे बोर्ड में लिखा है- ‘साहित्य सम्राट स्मृति लाइब्रेरी’ पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा संचालित। रविवार होने के कारण हमें लाइब्रेरी बंद मिली। साफ-सफाई भी नहीं दिखी। गेट के बाहर कचरे का ढेर लगा था। गेट पर ही हमारी मुलाकात पास में रहने वाले धर्मेंद्र यादव से हुई। वे बताते हैं कि इस गली में बंगाली और बिहारी दोनों रहते हैं। लाइब्रेरी के साथ ही आसपास की बिल्डिंग काफी पुरानी और जर्जर हो चुकी है। लाइब्रेरी की हालत के बारे में पूछने पर धर्मेंद्र कहते हैं, ‘यहां साफ-सफाई का हाल आप खुद ही देख लीजिए। सोमवार से शनिवार तक एक शख्स आकर लाइब्रेरी खोल देता है। हालांकि ज्यादा कोई आता-जाता नहीं है। बाहर की हालात देखकर ही समझ आता है कि अंदर क्या हाल होगा। सरकार की तरफ से तो कोई नहीं आता, लेकिन आसपास के लोग इसे मौका पड़ने पर साफ कर देते हैं।‘ इसे लेकर हो रही सियासत के बारे में पूछने पर धर्मेंद्र कहते हैं, ‘हां, ‘वंदे मातरम्’ को 150 साल पूरे होने पर कुछ दिन पहले BJP ने यहां प्रोग्राम रखा था। उसमें नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी आए थे। उस दिन उन्हें लाइब्रेरी का गेट नहीं खोलने दिया गया था।’ हम आगे बढ़े गली में हमें कार्यक्रम के लिए लगाए गए BJP के झंडे अब भी लगे दिखे। मकान को लेकर हो रही सियासत पर एक लोकल शख्स नाम न लिखने की शर्त पर बताते हैं, ‘यहां आस-पास ज्यादातर TMC समर्थक रहते हैं। ये ज्यादातर बंगाली हैं। जिस दिन शुभेंदु अधिकारी को आना था, उससे एक रात पहले जानबूझकर ये सड़क तोड़ दी गई। उसके बाद से ये अभी एक रात पहले ही बनी है।‘ BJP को चुनाव के वक्त बंकिम बाबू याद आए
इसी गली में नरेंद्र बारिक दुकान चलाते हैं। बंकिम चंद्र के मकान को लेकर हो रही सियासत पर वे कहते हैं, ‘बंकिम बाबू का पैतृक घर नैहाटी में था। यहां प्रताप चटर्जी रोड में वो पढ़ने आते थे। मैं यहां लंबे समय से रह रहा हूं। 2005 में लेफ्ट की सरकार के वक्त इसे रेनोवेट किया गया।‘ ‘तब मोहम्मद सलीम सांसद थे। उन्होंने सांसद निधि से खर्च कर इसकी मरम्मत कराई थी। मुझे आज भी याद है, तब मुख्यमंत्री रहे बुद्धदेव भट्टाचार्य यहां बनी लाइब्रेरी का उद्घाटन करने आए थे। उसके बाद से इस भवन में कोई काम नहीं हुआ। भवन की हालत देखकर भी इसका अंदाजा आप भी लगा सकते हैं। आस-पास के लोग ही थोड़ी बहुत साफ-सफाई करते हैं। इस लाइब्रेरी में भी कोई आता-जाता नहीं है।‘ नरेंद्र आगे बताते हैं, ‘लेफ्ट की सरकार के दौरान इसमें दो लाइब्रेरियन आते थे। तब कुछ लोग पढ़ने भी आते थे। कुछ विदेशी भी आते थे, लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं है। कहने को लाइब्रेरी है और सोमवार से शुक्रवार तक खुलती भी है लेकिन कोई आता-जाता नहीं दिखता है। एक लाइब्रेरियन है वो भी मनमर्जी का मालिक है।‘ बंकिम के वंशज बोले- जब भी मकान देखने गए ताला लगा मिला
हमने इस मामले में बंकिम चंद्र की पांचवीं पीढ़ी से आने वाले सजल चट्टोपध्याय से भी मुलाकात की। उनके वंशज कोलकाता के शोभा बाजार में रहते हैं। वे पिछले कई सालों से बंकिम चंद्र की धरोहर के रख-रखाव को लेकर सवाल उठा रहे हैं। सजल बताते हैं, ‘बंकिम बाबू की ज्यादातर संपत्ति आजादी के बाद से ही देश की धरोहर में शामिल कर ली गई। लेकिन आज ये स्थिति है कि उनके वंशजों को कोई पूछने वाला नहीं है।‘ ‘हम जिस राज्य में हम रहते हैं, वहां की सरकार न हमें जानती है और न ही हमें कभी याद किया जाता है। अगर बंकिम चंद्र के परिवार में कोई जिंदा है तो कौन है, कहां रहता है, इस सरकार ने कभी ये भी जानने की कोशिश नहीं की। ममता बनर्जी ने भी कभी हमें याद नहीं किया। हमें इस बात का बहुत दुख है।‘ घर के रख रखाव पर बात करते हुए वे कहते हैं, ‘जब लेफ्ट की सरकार थी और बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री थे, तब लाइब्रेरी भी रेगुलर चलती थी और मरम्मत भी होती थी। ममता सरकार के आने के बाद से हालात बिगड़ गए। लाइब्रेरी बंद पड़ी है। जब जाओ तब बंद ही मिलती है। साफ-सफाई भी नहीं होती है। हमने कई बार इसके रख-रखाव के लिए सरकारी विभागों में चक्कर लगाए लेकिन हासिल कुछ नहीं हुआ।‘ हमें आस-पास के लोगों ने बताया कि हफ्ते में कुछ दिन लाइब्रेरी खुलती है। इस पर सजल कहते हैं, ‘पिछले महीने नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी वहां गए थे और लाइब्रेरी खुलवाने के लिए कहा था आखिर तब क्यों नहीं खोली गई। बंकिम चंद्र देश की विरासत हैं लेकिन फिर भी नहीं खोली। हो सकता है कि इस विवाद के बाद खोली जाने लगी होगी।‘ संसद में वंदे मातरम् गाया जाए, बंकिम दादा के नाम पर विश्वविद्यालय खुले
अपनी मांगों को लेकर सजल कहते हैं, ‘BJP कई सालों से वंदे मातरम् का मुद्दा उठा रही है, लेकिन अब ये हाईलाइट हुआ है। इस गीत का इस्तेमाल हर कोई कर रहा है। हालांकि हो सकता है कि आने वाली पीढ़ी बंकिम बाबू को न जाने। इसलिए इस पर आज ही बात होनी चाहिए।‘ ‘हमारी मांग है कि जिस तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में रवींद्र भवन बने हैं, उसी तरह से बंकिम भवन बनाए जाएं। देश में जैसे विद्यासागर के नाम पर विश्वविद्यालय है, वैसे ही बंकिम चंद्र के नाम पर विश्वविद्यालय क्यों नहीं, जबकि वो देश के पहले ग्रेजुएट थे। इसलिए अब मेरी केंद्र सरकार से गुजारिश है। उनके नाम पर एक विश्वविद्यालय जरूर बनाया जाए।‘ अब जान लीजिए इस विवाद पर पॉलिटिकल पार्टियों की राय
यहां मजदूर सोते और आसपास के लोग कपड़े सुखाते हैं
BJP के प्रदेश अध्यक्ष सौमित्र भट्टाचार्य इस मुद्दे को लेकर कहते हैं, ‘फिलहाल ये मकान कोलकाता कॉर्पोरेशन की देख-रेख में है। जहां एक लाइब्रेरी है लेकिन वहां कोई नहीं आता है। हां, बाहर कुछ मजदूर सोए मिलते हैं और आसपास के लोग कपड़े सुखाते हैं। मकान बहुत ही खराब हालात में है। वंदे मातरम् को लेकर हो रहे विवाद पर वे कहते हैं, ‘BJP वंदे मातरम् की 150वीं सालगिरह के दौरान राज्य के अलग-अलग हिस्सों में गई। उन इलाकों में भी गए, जहां बंकिम बाबू रहे थे। नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी उनके घर जाने लगे तो पहले रास्ते तोड़ दिए गए। फिर वहां पहुंचने पर गेट में ताला लगा मिला। इन सब से साफ नजर आता है कि TMC बांग्ला के इतने बड़े उपन्यासकार के साथ कैसा व्यवहार कर रही है। इस आरोपों को लेकर हमने TMC लीडर्स से भी बात करने की कोशिश की लेकिन ऑन रिकॉर्ड कोई सामने नहीं आया। एक लीडर ने नाम न लिखने की शर्त पर कहा कि BJP वंदे मातरम् पर सिर्फ राजनीति कर रही है। जहां तक घर की बात है, वो हमारी धरोहर है, जिसकी देखरेख हो रही है। वहीं पश्चिम बंगाल के शिक्षा मंत्री ब्रत्य बसु ने मीडिया से कहा, ‘BJP विभाजनकारी सियासत करती है। हिंदुओं और मुसलमानों, ब्राह्मणों और दलितों के बीच विभाजन पैदा करती है। अब वो दो महान बंगालियों रवींद्रनाथ टैगोर और बंकिम चंद्र के बीच दरार पैदा करने की कोशिश कर रही है।‘ बंकिम चंद्र ने 1870 के दशक में लिखा था वंदे मातरम्
‘वंदे मातरम’ को 1950 में भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया था। इसे 1870 के दशक में बंकिम चंद्र ने संस्कृत निष्ठ बंगाली में लिखा था। ये उनके बंगाली उपन्यास आनंदमठ का ही हिस्सा है, जिसे पहली बार 1882 में प्रकाशित किया गया था। इसके 150 साल पूरे होने पर केंद्र सरकार ने विशेष स्मारक सिक्का और डाक टिकट भी जारी किया था। ……………………
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‘वंदे मातरम‘ लिखने वाले बंकिमचंद्र को क्यों भूली ममता सरकार:वंशज बोले- जिसे धरोहर बनाया वो जर्जर, हमें कोई पूछने वाला नहीं
📅 Published: December 8, 2025 |
📂 Category: India National
