‘जब लोहा गर्म था, तब केपी शर्मा ओली को पकड़कर जेल के अंदर डालना था। सभी संवैधानिक बदलाव भी तभी करने थे। अब लोहा ठंडा पड़ गया, इसलिए अब ये सब करने का कोई रास्ता नहीं बचा। युवाओं को तो ये भी समझ नहीं है कि राजनीति कैसे करनी है और चुनाव कैसे लड़ना है।’ नेपाल के GenZ नेता टंका धामी को अफसोस है कि जो कुछ सोचा था वो नहीं हो सका। धामी कहते हैं कि नेपाल में सुशीला कार्की सरकार को 3 महीने पूरे हो गए हैं। उनकी सरकार में ऐसे बहुत से सलाहकार हैं, जो मनमानी कर रहे हैं। वे युवा GenZ लीडर्स की बात भी नहीं सुन रहे हैं। नेपाल में जिस राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ GenZ प्रोटेस्ट हुए और 8 सितंबर को तख्तापलट हुआ, अब वही राजनीतिक व्यवस्था फिर हावी हो रही है। अंतरिम सरकार को जिम्मेदारी संभालते हुए 3 महीने हो गए हैं, लेकिन नेपाल में आम लोगों की जिंदगी में कोई फर्क नहीं आया। आंदोलन में हुई हिंसा के बाद नुकसान तक की भरपाई नहीं हो सकी है। अंतरिम सरकार का आधा वक्त बीच चुका है। चुनाव के लिए 5 मार्च 2026 की तारीख तय हो गई है। हालांकि इन सबके बीच जेनजी फिर सड़कों पर हैं। बीच-बीच में हिंसा और प्रदर्शन की घटनाएं आम हो गई हैं। नेपाल में तख्तापलट के बाद 3 महीने में क्या बदला? दैनिक भास्कर की टीम ने जेनजी लीडर्स, पूर्व राजनयिक और पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स से बात कर समझा। नेपाल में फिर शुरू हुए जेनजी प्रोटेस्ट
22 नवंबर को नेपाल के बारा जिले के अलग-अलग इलाकों में जेनजी प्रोटेस्ट शुरू हो गए। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (UML) के महासचिव शंकर पोखरेल और युवा नेता महेश बसनेत ने काठमांडू से सिमारा एयरपोर्ट के लिए उड़ान भरी। ये नेता नेपाल की मौजूदा सरकार के खिलाफ रैली करने वाले थे। हालांकि एयरपोर्ट से ये नेता शहर पहुंचते, उसके पहले ही बारा में लोकल जेनजी नेताओं और CPN (यूएमएल) के नेताओं के बीच रस्साकशी शुरू हो गई। हालात हिंसक होने लगे तो पहले पुलिस ने आंदोलनकारियों को रोकने के लिए बल का इस्तेमाल किया। फिर कर्फ्यू लगाना पड़ा। ऐसे जेनजी प्रोटेस्ट अब भी नेपाल के अलग-अलग हिस्सों में देखने को मिल रहे हैं। सरकार बदली लेकिन ब्यूरोक्रेसी नहीं, इसलिए बदलाव मुश्किल
नेपाल में अंतरिम सरकार बनाने के बाद क्या बदला और क्या अब भी बाकी है। ये समझने के लिए हमने जेनजी लीडर टंका धामी से बात की। नेपाल में जेनजी प्रोटेस्ट के बाद धामी को बड़े बदलाव की उम्मीद थी, लेकिन अब उन पर पानी फिर चुका है। धामी कहते हैं, ‘हम ये मानते हैं कि मौजूदा सरकार काम नहीं कर पा रही है क्योंकि ब्यूरोक्रेसी वही है, जो पहले थी। इसलिए इस सिस्टम में जल्दी कोई बदलाव करने में मुश्किल आ रही है। न्यायपालिका भी पुरानी है और वहां हुई नियुक्तियां भी पुरानी हैं। ऐसे में हमारे लिए सिस्टम में बदलाव करना आसान नहीं है। गलती ये हुई कि हमने बदलाव करने में देरी कर दी।’ ‘जेनजी युवाओं को राजनीतिक समझ नहीं है। जब ये समझ नहीं होगी तो वे चुनाव के लिए तैयार कैसे होंगे और पार्टी कैसे बनाएंगे। जब तक नेपाल में संस्थागत बदलाव नहीं होगा, तब तक कुछ नहीं बदलने वाला। कुछ लोग सरकार में ढंग से काम कर रहे हैं, लेकिन गृह मंत्री ओम प्रकाश आर्यल काम नहीं कर रहे। वो सिर्फ पद पर बैठने की मंशा रखते हैं।‘ वे आगे कहते हैं, ‘8 सितंबर को हुए जेनजी आंदोलन ने नेपाल को बदल दिया। सुशीला कार्की सरकार का मुख्य मकसद करप्शन खत्म करना था। सरकार उस पर काम भी कर रही है, लेकिन ये काम उतनी तेजी से नहीं हो रहा, जैसा हमने सोचा था। नेपाल की मीडिया प्रोपेगैंडा चला रही है। वो जेनजी सरकार को बदनाम करने की कोशिश कर रही है।‘ नेपाल की अंतरिम सरकार के 3 महीने के कार्यकाल में अब तक सिर्फ एक करप्शन के केस में कार्रवाई हुई है। उसमें भी कार्रवाई के नाम पर सिर्फ केस दर्ज हुआ है। सरकार ने दिसंबर 2025 में नेपाल के पूर्व मंत्रियों, अधिकारियों और चीनी कंपनी पर पोखरा एयरपोर्ट भ्रष्टाचार के मामले में केस दर्ज किया है, जिसमें 55 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ है। नेपाल में चुनाव करीब, जेनजी अब तक पार्टी नहीं बना सके
हमने नेपाल के मौजूदा हालात को लेकर राजनयिक रह चुके एसडी मुनी से भी बात की। वे साउथ एशिया मामलों को करीब से देखते आ रहे हैं। मुनी कहते हैं, ‘नेपाल राजनीतिक लिहाज से बिखरा नजर आ रहा है। एक तो सुशीला कार्की की सरकार बनते ही कुछ राजनीतिक तबके उनके विरोध में आ गए थे।‘ ‘पहले पूर्व PM केपी शर्मा ओली की पार्टी के लोग और राजशाही समर्थक ही सरकार के खिलाफ दबाव बना रहे हैं। संसद भंग होने के बाद से बाकी सियासी दल भी खिलाफ हो गए हैं।’ सरकार बनी तो ऐसा लगा था कि सारे जेनजी एकजुट हैं। बाद में असली जेनजी नेताओं को धकेल दिया गया और बालेन शाह, सुदान गुरुंग आगे आ गए। मुनी आगे कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि नेपाल में चुनाव करीब हैं, लेकिन जेनजी अपनी कोई पार्टी नहीं बना सके हैं। वो एक आंदोलन के जरिए जैसे उभरकर सामने आए थे, वैसे ही गायब हो गए। वहीं राजनीतिक पार्टियां भी खुद में बदलाव कर रही हैं। माओवादी पार्टी से लेकर कांग्रेस में नेतृत्व बदलने की बात हो रही है।‘ ‘सुशीला कार्की सरकार को बड़ा जनसमर्थन हासिल था। हालांकि जैसे उन्हें PM बनाया गया, उसे लेकर सवाल थे। कार्की के पास कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं है और न ही कोई बड़ा राजनीतिक जनाधार है। फिर भी कार्की ने ईमानदारी से जो काम करना चाहिए, वो किया है।‘ ओली से लेकर प्रचंड सब पब्लिक लाइफ में लौटे
नेपाल के मधेस क्षेत्र के बीरगंज से आने वाले पॉलिटिकल एक्सपर्ट संजय तिवारी मानते हैं कि यहां हुए जेनजी प्रोटेस्ट के 3 महीने बाद सब कुछ वैसा ही हो गया है, जैसा पहले हुआ करता था। मतलब सरकार में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। चाहे पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली हों या फिर पुष्प कमल दहल प्रचंड। सभी नेता पब्लिक लाइफ में लौट चुके हैं।‘ ‘नेपाल की नई सरकार से जनता को कई बदलावों की उम्मीद थी, लेकिन कोई खास परिवर्तन नहीं दिख रहा। वहीं परंपरागत राजनीतिक पार्टियां फिर से चुनाव के लिए तैयारियां शुरू कर चुकी हैं।‘ जेनजी आंदोलन बिखरा, न कोई नेता न कोई पार्टी
नेपाल के एक जेनजी लीडर नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘मैं इस आंदोलन से शुरू से जुड़ा था। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक इसे खड़ा करने में मैंने जी-जान एक कर दिया। पुलिस के लाठी-डंडे खाए और लोकल नेताओं से धमकियां भी मिलीं। अब बालेन शाह और सुदान गुरुंग जैसे नेताओं ने मुझे ही राजनीति करके अलग कर दिया। अगर अब मैं खुलकर बोला तो सरकार मेरे खिलाफ ही कार्रवाई कर देगी।’ जेनजी युवाओं को दरकिनार किए जाने पर जेनजी लीडर धामी कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि युवाओं को पॉलिटिकल प्रोसेस में ज्यादा भागीदारी लेनी चाहिए, लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है। मैं युवाओं से कहूंगा कि अगर वो खुद की राजनीतिक पार्टी नहीं खड़ी कर पा रहे हैं तो उन्हें ऐसी पार्टी का समर्थन करना चाहिए जो युवाओं का सपोर्ट करे। जो युवाओं को पार्टी में जगह दे।’ ‘जेनजी की असली मांग थी कि करप्शन खत्म हो, संस्थागत सुधार हो, संविधान में संशोधन हो। मैंने सरकार को इस तरह के सुझाव दिए थे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। ब्यूरोक्रेसी ठीक से काम नहीं कर रही। जब तक युवा खुद अपनी राजनीतिक पार्टी नहीं बनाते, कुछ नहीं होगा।’ टूरिज्म की कमर टूटी, आम लोगों की जिंदगी बेहाल
नेपाल में जेनजी आंदोलन के दौरान बेतहाशा नुकसान हुआ। नेपाल की संस्थाओं के सबसे अहम भवन प्रतीक सिंह दरबार, संसद भवन और सुप्रीम कोर्ट ही नहीं जलाए गए बल्कि छोटे-छोटे जिलों और कस्बों के भी सरकारी भवन फूंक दिए गए। नेपाल में सबसे ज्यादा कमाई टूरिज्म के जरिए होती है। प्रदर्शन के दौरान करीब 2 दर्जन डोमेस्टिक और इंटरनेशनल होटलों में आगजनी हुई थी। लिहाजा यहां पर्यटन पर भी बुरा असर पड़ा है। काठमांडू में टैक्सी चलाने वाले कृष्णा बताते हैं, पहले अच्छे-खासे टूरिस्ट आते थे। हमारा टैक्सी का बिजनेस गुलजार रहता था। अब भारत के अलावा फॉरेन से ज्यादा कोई टूरिस्ट नहीं आ रहा है। नेपाल और बांग्लादेश दोनों में एक ही हालात
पूर्व राजनयिक एसडी मुनी कहते हैं, ‘कार्की सरकार ने जेनजी की एकतरफा बड़ी मांगों जैसे सीधे पीएम पद के लिए वोटिंग और विदेशों में बसे नेपालियों के लिए वोटिंग अधिकार को नहीं माना है क्योंकि ऐसी मांगें पूरी करना मुमकिन नहीं है। सुशीला कार्की पार्टी के सभी लोगों से मिली हैं और तालमेल बनाने की कोशिश कर रही हैं।‘ ‘मुझे लगता है कि अंतरिम सरकार का विरोध करने वाली पार्टियों और दूसरे धड़ों को ये समझ आएगा कि अगर देश को स्थिर रखना है तो मिलकर काम करना होगा। शांति से चुनाव कराने होंगे। बांग्लादेश और नेपाल दोनों ही देशों में कई समानता है। दोनों ही देशों में जो लोग नेतृत्व करते हुए आगे आए थे, वही बिखर गए हैं। नेपाल में जेनजी और बांग्लादेश में युवा एकजुट नहीं हैं।‘ ‘ढाका यूनिवर्सिटी के चुनाव में जमात-ए-इस्लामी जीती। युवाओं की पार्टी में अलग से अस्थिरता बनी हुई है। बांग्लादेश में जमात जैसे धड़ों और नेपाल में राजावादी लोगों के उभरने की गुंजाइश है। दोनों तरफ अस्थिरता है। सुशीला कार्की की तरह डॉ. यूनुस को न तो कोई प्रशासनिक अनुभव है, न ही उनका कोई समर्थक वर्ग है। जो भी उन पर दबाव डाल सकते हैं, वो अपने काम करवा रहे हैं।‘ भारत की कोशिश, नेपाल में चीन का प्रभाव न बढ़े
‘नेपाल में तीन बड़ी शक्तियों का सबसे ज्यादा प्रभाव है- चीन, अमेरिका और भारत। मुझे लगता है कि भारत का प्रभाव सबसे ज्यादा होगा। नेपाल के इतिहास में कोई बड़ा बदलाव ऐसा नहीं हुआ है, जिसमें भारत का सक्रिय सहयोग न रहा हो। मुझे ऐसा लगता है कि शायद भारत के दखल की वजह से ही संविधान को रखा गया।‘ ‘भारत की यही कोशिश होगी कि नेपाल में चीन का प्रभाव न बढ़े। ओली सरकार के जाने से चीन को बड़ा धक्का लगा है। चीन ये चाहता है कि वहां कम्युनिस्ट पार्टी और लेफ्ट उभरकर आएं, लेकिन इसकी गुंजाइश बहुत कम है। चीन का प्रभाव कम हो गया है, लेकिन उसके एड प्रोजेक्ट अब भी चल रहे हैं।‘ ‘अमेरिका भी कभी नहीं चाहेगा कि नेपाल में चीन और कम्युनिस्ट पार्टी का प्रभाव बढ़े। जेनजी आंदोलन में अमेरिकी योगदान की बड़ी संभावना दिखती है। जेनजी का एक तबका ऐसा है जो अमेरिका की तरफ झुका हुआ है। नेपाल में चीन का प्रभाव घटा है, अमेरिका का प्रभाव बढ़ा है।‘ ‘भारत ने बहुत सावधानी से नेपालियों को ये दिखाने की कोशिश की है कि हम आपके आंतरिक मामलों में कोई दखल नहीं दे रहे हैं। भारत के नेपाल में बड़े हित हैं। नेपाल की शांति, स्थिरता, विकास और प्रगति में भारत अहम योगदान निभा सकता है। भारत इसके लिए काम भी कर रहा है।‘ ………………..
ये खबर भी पढ़ें… कैसे ढह गया इंडिगो का सिस्टम, क्राइसिस की इनसाइड स्टोरी ‘मैं करीब 10 साल से एयरलाइन इंडस्ट्री में काम कर रहा हूं। आज तक इतना बड़ा संकट नहीं देखा। मुझे लगता है कि इंडिगो की दिक्कत किसी दूसरे की नहीं, बल्कि कंपनी की खुद की बनाई हुई है। मैंने अपने कई साथी पायलट से भी बात की, तब इस नतीजे पर पहुंचा हूं।’ 34 साल के पायलट कैप्टन रोहित सक्सेना (बदला हुआ नाम) एयरलाइन कंपनी इंडिगो में 3 साल से काम कर रहे हैं। रोहित को 5 हजार फ्लाइंग आवर्स का अनुभव है। पढ़िए पूरी खबर…
क्या नेपाल में फिर होने वाला है हिंसक आंदोलन:सरकार बदली, अफसर पुराने; GenZ लीडर्स बोले- 100 दिन में कुछ नहीं बदला, फिर लड़ेंगे
📅 Published: December 12, 2025 |
📂 Category: India National
