बंगाल के शांतिनिकेतन का रहना वाला मैं राहुल सरकार। न्यूड पेंटिंग यानी नग्न तस्वीरें बनाता हूं। हर पेंटिंग में खुद को एक नग्न औरत के रूप में गढ़ता हूं, उसके जिस्म पर गहने पहनाता हूं- वे गहने, जिन्हें मुझे पहनने की इजाजत कभी नहीं मिली। लेकिन हर चित्र में मेरा चेहरा मुड़ा हुआ होता है। नजरें दुनिया से बचती हुईं। क्योंकि सच यह है कि मैं कैनवास पर तो नंगा हो सकता हूं, दुनिया के सामने नहीं। वहां मेरी हिम्मत टूट जाती है। ये पेंटिंग्स मेरी चाह, मेरा डर, मेरी सच्चाई हैं। रंगों में मैं वही बन जाता हूं, जो जीवन में बनने से रोका गया- यानी एक औरत। हर पेंटिंग में मुंह फेर लेता हूं, यही मेरी कला है और बेबसी है। मैं एक ऐसा मर्द हूं, जिसकी इच्छाएं, संवेदनाएं और जज्बात औरतों की दुनिया से आते हैं। यही मेरी सच्चाई है- और इसी सच्चाई के साथ मैं जी रहा हूं, चाहे दुनिया मेरी तरफ पीठ ही क्यों न कर ले। इस रास्ते पर चलते हुए मेरे सामने परिवार के सवाल थे, समाज के ताने थे और आलोचनाओं की दीवारें थीं। हर मोड़ पर मुझे रोका गया, डराया गया, शर्मिंदा किया गया। फिर भी मैंने यही रास्ता चुना- और अब पीछे मुड़कर देखने का कोई इरादा नहीं है। दरअसल, मैं उस बंगाली मिट्टी से उठा हूं, जहां हवा में आज भी रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताएं बहती हैं। जहां बाहर की दुनिया शांत और सुंदर थी- लेकिन मेरे भीतर लगातार एक युद्ध चल रहा था। जब होश संभाला, खुद को दूसरों से अलग पाया। मुझे औरतों के गहने और साड़ियां अपनी ओर खींचती थीं। शायद इसलिए कि मेरे घर में लड़कियां ज्यादा थीं, या शायद इसलिए कि मुझे लड़कों की दुनिया हमेशा फीकी और सूनी लगती थी। लड़कों के कपड़ों में मुझे कुछ भी सुंदर नहीं दिखता था- जबकि लड़कियों के कपड़े, उनके रंग और बनावट मुझे बहुत आकर्षित करते थे। जब छोटा था। चोरी से मां के गहने निकालता और शीशे के सामने खड़ा हो जाता। वे गहने मेरे छोटे हाथों के लिए बहुत बड़े थे, ठीक से पहन भी नहीं पाता था- लेकिन उन्हें छूते ही अंदर एक अजीब-सा रस जाग उठता। इन गहनों में कमरबंध, चूड़ियां, कंगन, पायल, मांग टीका- कोई एक लिस्ट नहीं थी। जो भी औरतों से जुड़ा था, वही मुझे खींचता था। साड़ी पहनना भी उतना ही स्वाभाविक लगता था। मां की नजर से बचाकर उनकी साड़ी पहन लेता। कभी पकड़ा जाता तो झूठ बोल देता- ‘मैं आपकी नकल कर रहा हूं।’ सच यह था कि अगर बस चलता, तो मैं इन्हीं गहनों और साड़ी में खुलकर घूमता। लेकिन मां देख लेतीं तो डांट पड़ती- कड़ी, डराने वाली। कहती- ‘लड़के ऐसा नहीं करते। तुम क्यों नहीं समझते कि तुम लड़के हो?’ फिर भी, मौका मिलते ही मां से आंख चुरा कर ऐसा ही करता। धीरे-धीरे घर में सबको पता चल गया। वे मुझ पर लानतें बरसाने लगे। लेकिन हर बार पकड़े जाने पर डांट इतनी तीखी होती कि डर शरीर में उतर जाता। मैं बहुत छोटा था- इसलिए सहम जाता। उस उम्र में भी एक सवाल पीछा नहीं छोड़ता था- अगर मैं लड़का हूं, तो लड़कियों के गहने पहनना गलत क्यों है? यह सवाल आज भी मेरे भीतर गूंजता है। मैं एक दोहरी जिंदगी जी रहा था, जिसमें शरीर मर्द का था, लेकिन मन उससे मेल नहीं खाता था। सोचता था कि अगर कुदरत ने मुझे ऐसा बनाया है, तो परिवार और समाज मुझसे क्यों लड़ रहे थे- इसका जवाब कभी नहीं मिला। मां का एक ही तर्क था- ‘लड़के हो, लड़कों की तरह रहो।’ उस आदेश में न समझ थी, न कोई और दूसरा रास्ता। आखिरकार, मैंने डर के आगे हथियार डाल दिए। गहने उतार दिए, साड़ी पहननी छोड़ दी। खुद को छुपाना सीख लिया। जब मैंने स्कूल जाना शुरू किया, तो यह साफ होने लगा कि बाकी बच्चों से अलग हूं। फर्क इतना था कि कुछ भी छुपाए नहीं छुपता था। धीरे-धीरे दोस्त दूर होने लगे। कुछ ने साफ कह दिया- ‘तुम अलग टाइप के हो, हमारी दोस्ती तुम्हारे साथ नहीं चल पाएगी।’ उनका मुझसे दूर होना मुझे भीतर से तोड़ने लगा। इसके बाद मैंने खुद को सुधारने की कोशिश शुरू की। अपने साथ के लड़कों को ध्यान से देखने लगा- वे कैसे चलते हैं, कैसे बैठते हैं, कैसे बोलते हैं, हाथ कैसे हिलाते हैं। उनसे तुलना करने पर मेरा हर हाव-भाव जैसे मुझे अपराध की तरह लगता। मेरा व्यवहार ‘ज्यादा औरतों जैसा’ माना जाता था। कुछ दोस्तों ने बाकायदा मुझे सिखाया कि लड़के कैसे होते हैं- उन्होंने मेरी चाल बदली, आवाज के उतार-चढ़ाव ठीक किए, लड़कों वाले इशारे सिखाए। यह सीख नहीं थी, यह खुद से दूरी बनाने की ट्रेनिंग थी। हर दिन लगता था कि शायद मैं अपने भीतर के उस हिस्से से बाहर निकल पाऊंगा, जिसे समाज ने गलत ठहरा दिया है, लेकिन जितना उसे दबाने की कोशिश करता, उतना ही भीतर से टूटता चला जाता। खुद को संभालने में ही लगा रहा- ऐसे नहीं करना है, वैसे नहीं करना। जब लगता कि कोई व्यवहार मुझसे ज्यादा औरतों वाला हो गया, तो उसे रोकने की कोशिश करता। दरअसल, मेरी शारीरिक भाषा औरतों जैसी हो जाती, तो डर लग जाता। सोचता, लोग क्या कहेंगे। उसे बदलना या कंट्रोल करना मेरे लिए बेहद तकलीफ भरा होता। एक तरह से मैं आजाद नहीं था- खुद को वैसा जाहिर नहीं कर पा रहा था, जैसा मैं अंदर से था। उस वक्त खुद को ठीक से खोज नहीं पाया। ये खुद को बदलने की कोशिश मुझे भीतर तक तोड़ने वाली थी। हर दिन ऐसा लगता था, जैसे मैं अपने ही खिलाफ मुकदमा लड़ रहा हूं- अपने हाव-भाव, अपनी इच्छाओं, अपनी संवेदनाओं के खिलाफ। जो मैं नहीं था, वह बनने की जिद ने लगातार मुझे खोखला कर दिया। खोखलेपन का यह दर्द दिखता नहीं था, लेकिन लगातार मौजूद रहता था। इसे शब्दों में बताना मुश्किल है, क्योंकि यह किसी एक घटना का नहीं, बल्कि रोज-रोज खुद को नकारने का नतीजा था। इस तरह मैं बड़ा होता गया, हर साल अपनी ही पहचान को थोड़ा-थोड़ा दबाते हुए। बाहर से सामान्य दिखने की कोशिश करता, लेकिन भीतर घुटन बढ़ती गई। आखिरकार यही महसूस कर रहा था कि वैसा नहीं बन पा रहा जैसा मेरे दोस्त और परिवार मुझसे उम्मीद कर रहे हैं। जितनी कोशिश की, उतना साफ होता गया कि यह लड़ाई मेरी काबिलियत की नहीं, बल्कि मेरी पहचान से थी। तब मैंने एक फैसला लिया- अब से जो हूं, उसी रूप में जिऊंगा। फिर वह मोड़ आया, जब पढ़ाई के लिए घर से बाहर निकला और हॉस्टल पहुंचा। यह सिर्फ जगह बदलना नहीं था; यह पहली बार था जब लोगों की मुझ पर निगरानी टूटी। मेरी जिंदगी में आजादी आई- ऐसा महसूस हुआ जैसे लंबे समय बाद पहली बार सच में सांस ले रहा हूं। हॉस्टल में रहकर पढ़ाई पूरी करते-करते यह साफ हो गया कि अब पीछे लौटना संभव नहीं। वहीं मैंने पेंटिंग सीखी और पहली बार अपने भीतर दबे सवालों को कैनवास पर उतारना शुरू किया। जो बनना चाहता था, जैसा रहना चाहता था- उस पहचान को रंगों में उतारने लगा। यहीं से न्यूड आर्ट पेंटिंग की शुरुआत हुई। नग्न देह के साथ मैं खुद को औरतों वाले गहनों के साथ बनाने लगा, जिन्हें पहनने का हक मुझे बचपन में कभी नहीं मिला। यह सिर्फ कला नहीं थी, बल्कि खुद को दोबारा गढ़ने की प्रक्रिया थी। बचपन का डर, दमन और अधूरी इच्छाएं रंगों में बदलती गईं। मैंने अपने अरमान और दर्द- दोनों को कैनवास पर नंगा उतारना शुरू किया। न्यूड आर्ट कोई नई सनक नहीं है। यह कला अपने ही देश में हजारों सालों से मौजूद रही है। भारतीय मंदिरों की दीवारों और शिल्पों में मर्द-मर्द को सेक्स करते दिखाया गया है- आज जिसे हम ‘गे’ कहते हैं, वह कभी कला और संस्कृति का हिस्सा था, लेकिन समय के साथ यह विरासत नहीं बनी, बल्कि डर बन गई। आज वही देह, वही इच्छा, वही अभिव्यक्ति अचानक ‘अश्लीलता’ और ‘टैबू’ में बदल दी गई है। दरअसल, कला से पहले समाज ने अपनी असहजता को बचाया। देह को देखने की नजर बदली नहीं- सिर्फ उसे छिपाने की जिद बढ़ गई। मेरी पेंटिंग्स इसी टकराव से जन्म लेती हैं- एक ऐसे समाज में जो अपने इतिहास को पूजता है, लेकिन उसकी सच्चाइयों से आंख चुराता है। मेरी पेंटिंग में न्यूडिटी यानी नग्नता, उत्तेजना नहीं, एक सवाल है; यह परंपरा नहीं तोड़ती, बल्कि याद दिलाती है कि जिसे आज हव्वा बना दिया गया है, वह कभी हमारी सांस्कृति का हिस्सा था। मैं अपने काम में पेंटिंग में एंड्रोजेनस दिखाता हूं। एंड्रोजेनस का मतलब है कोई भी इंसान, जिसे विपरीत जेंडर की चीजें और व्यवहार अच्छे लगे हैं। यह कोई भी हो सकता है- महिला या पुरुष। इसमें मैं जिन गहनों को कभी पहन नहीं सका, उन्हें अपनी पेंटिंग में खुद की कल्पना करके पहनाता हूं। मेरे लिए गहनों का कोई जेंडर नहीं होता। समाज का खेल अजीब है- हम जैसे लोगों को कभी महान बना दिया जाता है- हमारे सम्मान में नारेबाजी की जाती है, तो कई बार हमें बेवजह नफरत की निगाहों से घेर लिया जाता है। मेरी एक पेंटिंग इसी कश्मकश की कहानी कहती है। इसमें एक मर्द है, औरतों के गहने पहने, ऊंचे स्टूल पर बैठा- लेकिन उस स्टूल की कोई टांग नहीं। ऊंचा दिखाई देता है, लेकिन टिकने का कोई आधार नहीं। यह उस टूटे हुए सम्मान की तरह है, जो थोड़े से लोग देते हैं- इतना ऊंचा कि बाकी दुनिया से कट जाओ, लेकिन असल में हमेशा गिरने के खतरे में रहो। मैं पूछता हूं- हमें सम्मान भी क्यों चाहिए? क्यों न हम बस सामान्य समझे जाएं? तालियां मिलेंगी, लेकिन साथ नहीं; इज्जत मिलेगी, पर नजरअंदाज भी किया जाएगा। ऊंचाई देते हैं ताकि गिरना तय हो- यह पेंटिंग वही दर्द, वही अकेलापन, वही टकराव बयां करती है। इसे देखो और सोचो, क्या यही समाज की दया है, या बस एक और तरह की सजा? आजादी का मतलब सिर्फ फ्री सेक्स नहीं है, बल्कि अपने आप को चुनने की ताकत है- जो आप हैं, वही जीने की आजादी। बचपन में मां-बाप सही-गलत सिखाते हैं, लेकिन उनकी शिक्षा जेंडर की दीवारों से ऊपर होनी चाहिए। मुझे याद है, जब मैं छत पर खड़ा होता, तो कहा जाता- ‘वहां मत जाओ, गिर जाओगे’। यह सुरक्षा की बात थी, समझ में आती थी, लेकिन जब कहा जाता- ‘फलां काम लड़कों का नहीं करते’। तब वे बातें मेरे भीतर फूट पैदा करतीं। बचपन से हमें सिखाया जाता है कि लड़के रोते नहीं। सोचिए, अगर लड़के नहीं रोते, तो दुनिया आज कुछ और होती। मैं रोया भी, पर कभी किसी के सामने नहीं। ये छोटी-छोटी बंदिशें, ये नकली नियम, धीरे-धीरे दिमाग को तोड़ते हैं। लड़के और लड़कियों में फर्क केवल बायोलॉजिकल यानी जैविक है, बाकी सब समाज ने बनाया है। और उस झूठ ने मुझे सालों तक भीतर से घेरा रखा, मेरी आवाज दबा दी। यह सिर्फ बचपन की कहानी नहीं, उस रोजमर्रा की जंग की कहानी है, जिसे मैं हर सांस में जीता रहा। आज मैं समाज के हिसाब से ‘रहने लायक’ इंसान बन गया हूं। बाहर से ठीक दिखता हूं, सभ्य हूं, लोग स्वीकार करते हैं, लेकिन भीतर- पूरी तरह अकेला हूं। मेरे पीछे टंगी यह न्यूड पेंटिंग देखिए। ‘यह मैं हूं’। इसमें देह के बीचोंबीच एक बड़ा सा छेद है- क्योंकि अंदर कुछ बचा ही नहीं। सालों तक खुद को काट-छांटकर मैंने वह रूप गढ़ा, जिसे समाज देखना चाहता था। उसी प्रक्रिया में मैं खुद से खाली होता चला गया। यह खालीपन अचानक नहीं आया। धीरे-धीरे बना- हर उस बार, जब मैंने अपनी सच्ची चाह को दबाया, हर उस पल, जब ‘नॉर्मल’ दिखने के लिए खुद को चुप कराया। अब मैं हूं, लेकिन पूरा नहीं हूं। एक तरह से मैं, मैं नहीं रहा। खुश नहीं हूं। पर चलिए, कोई बात नहीं, समाज तो खुश है! अब मैं गहनों पर रिसर्च कर रहा हूं- तरह-तरह के गहनों पर, ताकि उन्हें अपनी पेंटिंग में दिखा सकूं। मैं दिखाना चाहता हूं कि देश के किस कोने में औरतें कौन-सा गहना पहनती थीं। मैं इस काम को जारी रखूंगा। समाज की मर्जी है कि वह इसे पसंद करे या न करे। उसे हक है मेरे काम को नापसंद करने का। मैं उसे समझा नहीं पाऊंगा। न्यूडिटी एक चॉइस है, जो आपके आर्ट वर्क को आगे ले जाती है। यह एक तरह फॉर्म ऑफ आर्ट यानी कला का ही एक रूप है। (राहुल सरकार ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए हैं।) —————————— 1- संडे जज्बात-रिश्तेदार की लाश लेकर आया, मेरे गाल छूने लगा:लाशें जलाने के कारण शादी नहीं हुई- पति के बिना जी लूंगी, लाशों के बिना नहीं मैं टुम्पा दास- पश्चिम बंगाल में डोम समुदाय की पहली महिला हूं, जो पिछले कई सालों से कोलकाता के बड़िपुर गांव के श्मशान में लाशें जला रही हूं। पता नहीं भारत में कोई और महिला यह काम करती है या नहीं, पर मैंने यही रास्ता चुना… और यह रास्ता आसान नहीं था। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2-संडे जज्बात-मैं मुर्दा बनकर अर्थी पर भीतर-ही-भीतर मुस्कुरा रहा था:लोग ‘राम नाम सत्य है’ बोले तो सोचा- सत्य तो मैं ही हूं, थोड़ी देर में उठकर साबित करूंगा मेरा नाम मोहनलाल है। बिहार के गयाजी के गांव पोची का रहने वाला हूं। विश्व में शायद अकेला ऐसा इंसान हूं, जिसने जिंदा रहते अपनी शव यात्रा देखी। यह बात चंद करीबी लोगों को ही पता थी। मरने का यह सारा नाटक किसी खास वजह से किया गया था। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
संडे जज्बात-न्यूड पेंटिंग में खुद को निर्वस्त्र औरत बनाता हूं:कैनवास पर नंगा हो सकता हूं, दुनिया के सामने नहीं- यही मेरी कला है, यही मेरी सजा
📅 Published: December 14, 2025 |
📂 Category: India National
