‘अमीर वर्ग नियम नहीं मानता। वो बड़ी-बड़ी डीजल कारें, जनरेटर और प्रदूषण फैलाने वाली बाकी चीजें इस्तेमाल करता है। गाड़ियों से होने वाला प्रदूषण राजधानी और आसपास के इलाकों को चोक कर रहा है। गरीब और मेहनतकश वर्ग ही इसके सबसे ज्यादा संपर्क में आता है और सबसे ज्यादा पीड़ित है।’ 15 दिसंबर को जब दिल्ली एयर पॉल्यूशन का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तब चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने ये टिप्पणी की। दिल्ली में सर्दी बढ़ते ही एयर पॉल्यूशन खराब हाल में पहुंच गया है। पिछले कुछ दिन ऐसे रहे, जब ज्यादातर जगहों पर AQI 500 के करीब रहा। 14 दिसंबर को दिल्ली में औसत AQI 461 रहा, जो ‘गंभीर’ माना जाता है। दैनिक भास्कर की टीम चीफ जस्टिस के दावों की पड़ताल करने के लिए दिल्ली में ग्राउंड पर पहुंची। साथ ही हमने एयर पॉल्यूशन को लेकर कराए सर्वे और स्टडी की रिपोर्ट्स भी देखीं। पटपड़गंज इंडस्ट्रियल एरिया में चाय की दुकान लगाने वाली नीतू भी प्रदूषण के लिए अमीर वर्ग को जिम्मेदार मानती हैं। वे कहती हैं कि अमीरों की गाड़ियां प्रदूषण फैला रहीं और गरीब इसके नुकसान झेल रहा है। वहीं एयर पॉल्यूशन को लेकर CEEW की स्टडी कहती है कि दिल्ली में PM 2.5 एयर क्वालिटी लेवल के लिए सबसे ज्यादा गाड़ियां जिम्मेदार हैं। सड़कों की धूल, इंडस्ट्री, पावर प्लांट्स और कंस्ट्रक्शन का भी अहम रोल है। 60% से ज्यादा पॉल्यूशन इनकी वजह से होता है। दिल्ली ही नहीं, देश के बाकी कई बड़े शहरों में भी एयर पॉल्यूशन बड़ी चुनौती बना हुआ है। 18 दिसंबर को जब दिल्ली में AQI 305 रहा, तब पटना में 387, लखनऊ में 350, जयपुर में 156 और भोपाल में 124 रहा। सबसे पहले दिल्ली के लोगों की बात…
अमीर गाड़ियों में घूमकर प्रदूषण फैला रहे, गरीब तकलीफें उठा रहे
पटपड़गंज इंडस्ट्रियल एरिया में हमें नीतू देवी मिलीं। यहां 15 सालों से चाय की दुकान लगा रही हैं। वे कहती हैं, ‘प्रदूषण के कारण सांस लेने में दिक्कत हो रही है और आंखों में लगातार जलन रहती है। ऐसा लगता है कि किसी ने मिर्च डाल दी हो। कभी-कभी पानी का छिड़काव होता है, लेकिन उसका कोई फायदा नहीं। प्रदूषण पहले से बढ़ गया है। दिन में 8-9 घंटे यहां रहती हूं। करीब 4-5 घंटे मास्क लगाकर रहना पड़ता है। ज्यादा देर मास्क लगाने पर भी घुटन होती है।‘ नीतू मानती हैं कि अगर गाड़ियां कम की जाएं तो प्रदूषण रोका जा सकता है। वे कहती हैं, ‘यहां परिवार में हर इंसान के पास एक गाड़ी है। यही प्रदूषण फैला रही हैं। गरीब कुछ नहीं कर सकते हैं, बस परेशान हो सकते हैं। यहां कई गाड़ियों के शोरूम हैं। हर शोरूम से रोज 10-12 कारें निकलती हैं। इनका असर आबोहवा पर ही पड़ेगा न।‘ इसी तरह की बातें नोखे लाल भी करते हैं। वे पटपड़गंज इंडस्ट्रियल एरिया में 30 साल से रह रहे हैं और सड़क किनारे नमकीन-भूंजे का ठेला लगाते हैं। वे मानते हैं कि प्रदूषण बहुत बढ़ गया है और इसी के कारण सांस लेने में दिक्कत हो रही है। 59 साल के लाल कहते हैं, ‘सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक यहां ठेला लगाता हूं। दिन भर धूल खाता हूं। हवा बहती है तो कुछ राहत मिलती है, नहीं तो सांस लेना मुश्किल हो जाता है। मुझे हार्ट की समस्या भी है। प्रदूषण के कारण और ज्यादा हो जाती है। यहां दवाइयां के बिना तो रह नहीं पाऊंगा।‘ नोखे लाल के मुताबिक, पिछले कई सालों से यही स्थिति है कोई सुधार नहीं हुआ। वे कहते हैं, ‘कभी-कभी पानी छिड़कने के लिए गाड़ी आती है, लेकिन उससे कुछ नहीं होता है। गाड़ियों के कारण ही प्रदूषण फैल रहा है। अमीर तो अपना इंतजाम कर लेते हैं। गरीब सड़क पर ही काम करेगा न इसलिए उन्हें ही सबसे ज्यादा नुकसान होता है। हमेशा मास्क या गमछा लपेटे रहना पड़ता है।‘ दिल्ली रहने लायक नहीं, शहर छोड़ रहे लोग
इसके बाद दिल्ली के ग्रेटर कैलाश इलाके में हम कुछ ऐसे लोगों से भी मिले, जो पॉल्यूशन से परेशान हैं, लेकिन इससे बचने के इंतजाम करने में सक्षम हैं। यहां रहने वाली खुशी विलियम खांसी से परेशान हैं। वे कहती हैं, ‘दिल्ली अब जरा भी रहने लायक नहीं है। हम यहां से शिफ्ट करने की सोच रहे हैं, कहीं पहाड़ों पर जाकर रहेंगे। पहले लोग दिल्ली में रहने के लिए तरसते थे, अब छोड़कर जा रहे हैं।‘ ‘मेरे कई जानने वाले हॉस्पिटल जा रहे और दवाई ले रहे हैं। ये सब प्रदूषण की वजह से हो रहा है। शाम को तो आप घर से बाहर नहीं निकल सकते हैं। घर पर हमने इसी साल एयर प्यूरिफायर लगाया है, लेकिन बाहर तो जाना ही है। बच्चों को पार्क में लाना होता है, उन्हें पिंजरे में तो बंद नहीं कर सकते हैं।‘ वो कहती हैं कि सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए ताकि प्रदूषण कम हो। समस्या की जड़ पर जाना चाहिए कि क्या उपाय हो सकते हैं। मॉर्निंग वॉक करना मुश्किल, सिर्फ इमरजेंसी में घर से निकल रहे
दिल्ली के सीआर पार्क इलाके में हमें शशि शर्मा मिले। वे एक रिटायर्ड सरकारी अधिकारी हैं। वे कहते हैं, ‘प्रदूषण का फेफड़ों पर बुरा असर पड़ रहा है। मॉर्निंग वॉक पर भी हमें मास्क लगाकर जाना पड़ता है। पत्नी को अस्थमा है। सुबह उठते ही उन्हें नेब्यूलाइजर लगाना पड़ता है। रात को सोते हुए CPAP मशीन लगानी पड़ती है, जिससे ऑक्सीजन सही तरीके से मिल सके। प्रदूषण के कारण सांस लेने में दिक्कत हो रही है।‘ शशि भी उन लोगों में हैं जिन्होंने घर में एयर प्यूरिफायर लगवा रखा है। वे कहते हैं, ‘इससे तो हम सिर्फ घर में सुरक्षित हैं, लेकिन बाहर तो निकलना ही पड़ेगा। इसी इलाके में हमें सुजीत चौधरी मिले, जो मास्क लगाकर एक पार्क में अखबार पढ़ रहे थे। वे कहते हैं, ’सांस लेने में काफी दिक्कत है। प्रदूषण के कारण मॉर्निंग वॉक पर भी नहीं निकल पा रहे हैं। लोग अब इमरजेंसी में ही घर से निकल रहे हैं। ये सरकार की छोटी-मोटी कोशिशों से दूर नहीं होने वाला है। इसके लिए ठोस पॉलिसी बनानी होगी।’ प्रदूषण पर अलग-अलग रिपोर्ट्स क्या कहती हैं?
पॉल्यूशन को लेकर कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि दुनियाभर में प्रदूषण फैलाने में अमीर सबसे आगे हैं, लेकिन इसका शिकार गरीब हो रहे हैं। अक्टूबर 2021 में छपी ‘नेचर सस्टनेबिलिटी’ की रिपोर्ट बताती है कि भारत में गरीब एयर पॉल्यूशन का ज्यादा सामना कर रहे हैं जबकि वो इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। ज्यादा आय वाले गाड़ियों और दूसरे जरियों से पॉल्यूशन बढ़ा रहे हैं, लेकिन वे एयर कंडीशन और बढ़िया हेल्थ केयर जैसी सुविधाओं से लैस हैं। रिपोर्ट बताती हैं कि एयर पॉल्यूशन समय से पहले मौत के बड़े कारणों में एक है। भारत में एयर पॉल्यूशन के कारण सबसे कम आय वर्ग के 54.7% लोगों की समय से पहले मौत हो रही है। वहीं सबसे ज्यादा आय वर्ग में 6.3% लोग ही इसका शिकार हैं। यानी एयर पॉल्यूशन का गरीबों पर असर अमीरों की तुलना में 9 गुना ज्यादा है। द लैंसेट प्लेनेटरी हेल्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की करीब 82% आबादी भारत के नेशनल एम्बिएंट एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड्स के ऊपर की हवा में रह रही है। दिसंबर 2024 में छपी इस रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ 2019 में एयर पॉल्यूशन के कारण भारत में 18 लाख लोगों की मौत हुई है। वहीं साल 2009 से 2019 के बीच इसके कारण औसतन हर साल 15 लाख लोगों की मौत हुई। पॉल्यूशन कंट्रोल के लिए अलॉट फंड इस्तेमाल नहीं हो रहा
भारत सरकार ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए 2019 में नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) की शुरुआत की थी। इसका टारगेट देश के 130 शहरों की एयर क्वालिटी में सुधार लाना था। इसके तहत PM-10 के लेवल को 40% तक कम करना था। हालांकि दिल्ली में अब तक ये हासिल नहीं किया जा सका है। इस प्रोग्राम के तहत अब तक राज्यों को 13,036 करोड़ फंड अलॉट हो चुका है। जुलाई महीने में पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि इन शहरों में करीब 71% यानी 9209 करोड़ रुपए का फंड इस्तेमाल किया गया। इस मामले में दिल्ली की स्थिति और भी बुरी है क्योंकि दिल्ली सरकार ने पूरा फंड इस्तेमाल ही नहीं किया। एक्सपर्ट बोले- घनी आबादी वाले इलाके पॉल्यूशन के हॉटस्पॉट
ग्रीनपीस साउथ एशिया के डिप्टी प्रोग्राम डायरेक्टर अविनाश चंचल चीफ जस्टिस की बातों से इत्तफाक रखते हैं। वे कहते हैं, ‘अगर हम दिल्ली की बात करें तो लगभग सभी स्टडीज बताती हैं कि 40 से 50% तक पॉल्यूशन की वजह गाड़ियों से निकलने वाला धुआं है। दिल्ली में कारों की संख्या ज्यादा है। NO2 (नाइट्रोजन डाइऑक्साइड) का स्तर काफी ज्यादा है जो गाड़ियों से ही निकलती है।‘ ‘इस पॉल्यूशन का गरीबों की सेहत और जिंदगी पर क्या असर पड़ता है, इस पर बहुत कम रिसर्च हुई है। आप देखेंगे कि दिल्ली में जितने भी प्रदूषण के हॉटस्पॉट हैं, वहां सबसे ज्यादा घनी आबादी है। वहां वर्किंग क्लास के लोग रहते हैं।‘ अविनाश आगे कहते हैं, ट्रक या दूसरे ट्रांसपोर्ट से भी प्रदूषण फैल रहा है, लेकिन तुलनात्मक रूप से अगर देखें तो प्राइवेट गाड़ियां इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार हैं। वे कहते हैं, ‘इंडस्ट्री से होने वाला प्रदूषण भी दिल्ली की हवा को खराब कर रहा है। दिल्ली के आसपास कई थर्मल पावर प्लांट भी हैं। IIT कानपुर की 2015 की एक स्टडी के मुताबिक, तब 30% उत्सर्जन में पावर प्लांट की भागीदारी थी। कूड़ों का सही प्रबंधन न होने और कंस्ट्रक्शन सेक्टर भी बड़े स्तर पर जिम्मेदार हैं। ये सारे फैक्टर पूरे साल मौजूद रहते हैं और इसके कारण हवा हमेशा खराब होती है। ठंड में दिक्कत बढ़ जाती है क्योंकि प्रदूषण बाहर नहीं निकल पाता है। इसलिए हम बोलते हैं कि जो फैक्टर पूरे साल प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है, उसे सोर्स पर रोका जाए।’ अविनाश के मुताबिक, ग्रीनपीस ने कई सालों तक भारत के शहरों की हवा पर स्टडी की थी। रिपोर्ट में कहा गया कि देश के 80% शहर हवा के नेशनल एयर क्वालिटी मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं। वे कहते हैं, ‘प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए जो भी समाधान लाए जाते हैं, वो सब गरीब विरोधी हैं, जैसे- जब भी ग्रैप (GRAP) लागू होता है तो कहा जाता है कि लोगों को घरों में रहना है, एयर प्यूरिफायर इस्तेमाल करना है। कितने लोग हैं, जो एयर प्यूरिफायर इस्तेमाल कर सकते हैं? क्या वर्किंग क्लास घरों पर रह सकते हैं? बिल्कुल नहीं।’ दिल्ली में पॉल्यूशन हमेशा से ऐसा, ठंड में दिखने लगता
चिंतन की फाउंडर भारती चतुर्वेदी कहती हैं, ’गरीब आदमी गाड़ी नहीं चला रहा है जबकि वो बाहर काम करता है, जैसे- स्ट्रीट वेंडर्स, सफाईकर्मी। इनके पास कोई विकल्प नहीं है। ये वर्क फ्रॉम होम नहीं कर सकते हैं और कोई छुट्टी भी नहीं ले सकते हैं। AQI चाहे 150 हो या 750 हो, उन्हें काम करना है और 10-12 घंटे बाहर रहना है।’ ’दूसरी तरफ सबसे ज्यादा प्रदूषण गाड़ियों से आ रहा है, जो अमीर चला रहे हैं। ये वर्ग काफी हद तक प्रदूषण से बचा रहता है। एयर प्यूरिफायर लगा रहे हैं। यही क्लास AC का इस्तेमाल कर रहा है यानी बिजली का इस्तेमाल भी ज्यादा कर रहा है। गरीब तो बिजली भी लिमिटेड ही इस्तेमाल कर रहा है। अमीरों के घर सजाने के लिए बिजली का इस्तेमाल हो रहा है।’ भारती कहती हैं दिल्ली के प्रदूषण में 20 से 30% योगदान गाड़ियों का है। इसके अलावा कूड़े से 9-14% तक होता है। उनके मुताबिक, ठंड में स्थिति ये होती है क्योंकि हम अक्टूबर में जागना शुरू करते हैं। जबकि प्रदूषण हमेशा ऐसा ही होता है। पॉल्यूशन से सांस की नली को पहुंच रहा नुकसान
दिल्ली के सीके बिरला हॉस्पिटल में रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के डायरेक्टर डॉ. विकास मित्तल कहते हैं कि प्रदूषण के कारण लोगों को सांस की नली में काफी दिक्कतें आ रही हैं। वे बताते हैं, ‘अगर ये प्रदूषण बार-बार नली को प्रभावित करता है तो ये लंबे समय तक चलने वाली बीमारी (COPD) का रूप ले लेता है।‘ ‘अगर ऐसा ही चलता रहा तो भविष्य में ऐसी बीमारियां लगातार सामने आएंगी। यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो की स्टडी में पाया गया है कि प्रदूषण के कारण दिल्ली के लोगों का लाइफ स्पैन 8.2 साल कम हो जाता है।‘ ‘अस्थमा, फेफड़े और हार्ट के मरीजों पर प्रदूषण का ज्यादा असर पड़ रहा है। PM 2.5 कण खून के जरिए धमनियों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इसके कारण हार्ट पर असर पड़ सकता है। धमनियों के नुकसान पहुंचने से पूरे शरीर पर प्रभाव पड़ता है। जो लोग बाहर ज्यादा रहेंगे, उन पर प्रदूषण का ज्यादा असर होगा।‘ रजिस्टर्ड मजदूरों को 10 हजार का मुआवजा- दिल्ली सरकार
बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए दिल्ली सरकार ने GRAP-3 के तहत कंस्ट्रक्शन के काम पर रोक लगाई थी। अब दिल्ली सरकार काम बंद होने के कारण प्रभावित मजदूरों को 10 हजार रुपए का मुआवजा देगी। दिल्ली सरकार के तहत कुल रजिस्टर्ड कंस्ट्रक्शन वर्कर्स की संख्या 2.57 लाख है। 17 दिसंबर को दिल्ली के श्रम मंत्री कपिल मिश्रा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, ’निर्माण कार्य बंद होने से प्रभावित सभी रजिस्टर्ड और वेरिफाइड निर्माण मजदूरों को मुआवजे के तौर पर 10 हजार रुपए दिए जाएंगे। ये राशि मजदूरों के खाते में भेजी जाएगी। GRAP-4 के तहत जितने दिनों का काम बंद होगा, उसके हिसाब से भी आगे मुआवजा दिया जाएगा।’
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क्या सच में अमीर पॉल्यूशन फैला रहे, गरीब झेल रहे:60% पॉल्यूशन प्राइवेट कारों-कंस्ट्रक्शन-इंडस्ट्री से, लोग बोले- सांस लेना मुश्किल
📅 Published: December 19, 2025 |
📂 Category: India National
