लड़कियां हिजाब पहनें-अखंड बंगाल बने, कैसी थी उस्मान की पॉलिटिक्स:बांग्लादेश की सरकार के लिए आंख का कांटा बन गए, मर्डर से किसे फायदा

📅 Published: December 22, 2025 | 📂 Category: India National

‘बांग्लादेश में तख्तापलट से पहले लगातार 2-3 साल से खुलकर भारत के विरोध की राजनीति जोर पकड़ रही थी। इसी से उस्मान हादी मशहूर हुए। वे मुगल काल के अखंड बांग्ला की बात करते थे। कहते थे कि हम फिर से वैसा देश बनाएंगे, तो खुशहाली आएगी। हादी की परवरिश मदरसे में हुई थी। ऐसी ट्रेनिंग में भारत के बारे में अच्छे विचार रखने की वजह नहीं बचती।’ बांग्लादेश के पत्रकार अमानुर रहमान स्टूडेंट लीडर उस्मान हादी की पॉलिटिक्स समझाते हुए ये बात कहते हैं। इंकिलाब मंच के लीडर 32 साल के शरीफ उस्मान बिन हादी की हत्या के बाद बांग्लादेश में हिंसा भड़क गई थी। हादी समर्थक हत्या के पीछे भारत का हाथ बता रहे हैं। इसकी वजह है कि वे भारत के खिलाफ बोलते थे। हालांकि, अमानुर इसका दूसरा पक्ष भी बताते हैं। वे कहते हैं, ‘हादी पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना, स्टूडेंट्स की पार्टी NCP के अलावा हर नेता-मंत्री के बारे में बोलते थे। यही वजह है कि हादी की पॉलिटिक्स कभी उन्हें पसंद नहीं आई।’ दैनिक भास्कर ने बांग्लादेश के मौजूदा हालात, उस्मान हादी की पॉलिटिक्स पर उनके दोस्तों और जर्नलिस्ट से बात की। उनसे पूछा कि हादी बांग्लादेश की राजनीति के इतने बड़े चेहरे कैसे बने। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… मदरसे से पढ़ाई, यूनिवर्सिटी में दिखा कट्टरता की ओर झुकाव
1994 में झालोकाठी जिले के मुस्लिम परिवार में जन्मे उस्मान हादी की शुरुआती पढ़ाई मदरसे से हुई। ढाका यूनिवर्सिटी से उन्होंने पॉलिटिकल साइंस की पढ़ाई की। आगे चलकर वे यूनिवर्सिटी में पढ़ाने लगे। कट्टर इस्लामिक राजनीति की वजह से वे छात्रों में मशहूर हो गए। उनके दोस्त बताते हैं कि यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान ही उस्मान हादी का कट्टर इस्लाम के प्रति झुकाव दिखने लगा था। यूनिवर्सिटी में लड़के पैंट-शर्ट पहनकर आते थे। लड़कियां साड़ियां और सलवार कमीज या ट्रेंडिंग फैशन वाले वेस्टर्न कपड़े पहनकर आती थीं। वहीं, हादी मदरसा के छात्र की तरह टोपी और पायजामा पहनकर आता था। मोहम्मद महीन सरकार उस्मान हादी के जूनियर थे और उन्हें बड़ा भाई मानते हैं। वे कहते हैं, ‘हादी भाई और मैं एक ही डिपार्टमेंट में थे। वे लड़कियों के हिजाब पहनने की रवायत की वकालत करते थे। बांग्लादेश की सेक्युलर पॉलिटिक्स के बीच खुद को इस्लामिक अधिकारों की लड़ाई करने वाले की तरह पेश करते थे।’ ‘पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के वक्त शुरू हुए छात्र आंदोलन में उस्मान हादी बड़ा चेहरा थे। यूनिवर्सिटी में जाना-पहचाना नाम, सेक्युलर पॉलिटिक्स और शेख हसीना के कट्टर विरोधी होने की वजह से उन्हें शोहरत दिला दी।’ ‘हादी की भाषा खराब थी, लेकिन इसी ने पहचान बनाई’
बांग्लादेश में फरवरी 2026 में चुनाव हैं। हादी ढाका-8 सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले थे। दिल्ली में जितनी अहम नई दिल्ली सीट है, उतनी ही बांग्लादेश में ढाका-8 सीट अहम है। इसी सीट में संसद भवन और ढाका यूनिवर्सिटी आती है। इसी ढाका यूनिवर्सिटी में हादी को इतनी पहचान मिली कि वे संसद तक जाने की तैयारी करने लगे। बांग्लादेशी पत्रकार अमानुर रहमान बताते हैं, हादी जो सोचते थे, वे खुलकर बोल पाते थे। हादी के आलोचक कहते थे कि उनकी भाषा खराब थी, लेकिन यही भाषा उन्हें मशहूर भी बनाती थी। बांग्लादेश की आजादी के बाद जमात-ए-इस्लामी के अलावा किसी पार्टी ने धार्मिक पहचान की राजनीति नहीं की। 2013 में शाहबाग आंदोलन के दौरान हादी इस्लामिक टोपी जरूर पहनते थे। यूनिवर्सिटी में टीचर और स्टूडेंट उन्हें ‘हिफाजत’ कहकर बुलाते थे। ये शब्द इस्लामिक कट्टरपंथी समूह हिफाजत-ए-इस्लाम के लिए इस्तेमाल किया जाता है। अमानुर रहमान बताते हैं, ‘बांग्लादेश की आजादी के वक्त जमात-ए-इस्लामी और उस जैसे कट्टरपंथी संगठनों को वॉर क्रिमिनल की तरह देखा गया। ऐसा माना जाता था कि टोपी पहनने, दाढ़ी रखने वाले बांग्लादेश विरोधी हैं। उस्मान हादी दाढ़ी-टोपी के साथ ढाका यूनिवर्सिटी पहुंचा, तो उसका विरोध होता था। इसी आलोचना से उस्मान हादी ने अपनी जगह बनाई।’ ‘ढाका यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान ही भारत विरोध की राजनीति शुरू कर दी थी। वे अपने भाषणों में कहते थे कि भारत जुल्म कर रहा है और बांग्लादेश पर कब्जा करना चाहता है। शेख हसीना बांग्लादेश को बेच रही हैं। ये सब 2-3 साल से चल रहा था। भारत विरोध की राजनीति हादी को मजबूत बना रही थी, इसलिए उन्होंने इसे बढ़ावा देना शुरू कर दिया।’ कैसे सभी के खिलाफ होते गए उस्मान हादी 1. सेक्युलर पॉलिटिक्स
उस्मान हादी के दोस्त मोहम्मद महीन सरकार कहते हैं, ‘हसीना सरकार के खिलाफ जून से ही ढाका यूनिवर्सिटी में छात्र एकजुट होने लगे थे। उस्मान हादी ने दूसरे छात्र नेताओं जैसे जिया उल-हसन, अफरोजा तूली के साथ मिलकर इंकलाब कल्चरल सेंटर और इंकिलाब मंच नाम से संगठन बनाया। इस संगठन के जरिए हादी ने एंटी सेक्युलर राजनीति शुरू की। ‘वे शेख हसीना की 16 साल की सरकार को सांस्कृतिक फासीवाद बताते थे। कहते थे कि भारत हसीना सरकार के जरिए सांस्कृतिक फासीवाद ला रही है। हादी अपनी तकरीरों में कहते थे कि बांग्लादेश का असली नारा जय बांग्ला नहीं, ‘नारा-ए-तकबीर है। उनकी राजनीति राइट विंग की तरफ झुकी हुई थी।’ ‘बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद छात्रों के बीच अपनी राजनीति के लिए रस्साकशी शुरू हो गई। एक धड़ा जिसमें महफूज आलम, नाहिद इस्लाम, सजीब भूयान हैं, उसने डॉ. यूनुस के साथ सरकार में शामिल होना चुना। दूसरा धड़ा, जिसने छात्रों की बनाई पार्टी NCP के संगठन पर काम करना चाहा।’ ‘उस्मान हादी ने तीसरा रास्ता चुना। उन्हें ऐसे लोगों का साथ मिला भारत की दक्षिण एशिया में दखलंदाजी पर खुलकर बोलते थे। उस्मान हादी सभी पार्टियों बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी से लेकर छात्रों की नेशनल सिटिजन पार्टी की आलोचना करते थे। दूसरी तरफ कोई भी पार्टी उस्मान हादी की राजनीति का विरोध नहीं कर पाती थी।’ उस्मान हादी के एक दोस्त अब NCP में हैं। वे कहते हैं कि राजनीतिक पार्टी की अपनी सीमा होती है, लेकिन बतौर एक्टिविस्ट उस्मान कुछ भी कह सकता था। हादी भारतीय प्रभुत्व के बारे में खुलकर बात करता था। अपने भाषणों में बार-बार कहता था कि अवामी लीग के जरिए भारत बांग्लादेश में अपना राज चला रहा है। NCP भी अवामी लीग की तरह राजनीति कर रही है। इसलिए उसने NCP छोड़कर अपना रास्ता चुना। 2. अवामी लीग
अवामी लीग के नेतृत्व में बांग्लादेश को आजादी मिली। पार्टी अगले 50 साल तक आजादी की विरासत की सबसे बड़ी दावेदार बनी रही। उस्मान हादी ने 1971 की आजादी की लड़ाई को छलावा बताना शुरू किया। वे जमात-ए-इस्लामी की सोच के तहत बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई और उसकी अहमियत को नकारते रहे। छात्रों के कोटा आंदोलन से लेकर शेख हसीना के खिलाफ विरोध में उस्मान हादी की सोच ने ही आंदोलन की दिशा तय की। हसीना सरकार के खिलाफ आम लोगों को एकजुट करने में हादी ने मेहनत की और आंदोलन को लीड किया। 3. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी
बांग्लादेश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी BNP ने कभी आजादी की लड़ाई को नकारने पर उस्मान हादी या जमात का समर्थन नहीं किया। पार्टी इस इतिहास का सम्मान करती आई है। हादी ने ऐलान किया था कि वे 25 दिसंबर को बांग्लादेश लौट रहे BNP के एक्टिंग प्रेसिडेंट तारिक रहमान का विरोध करेंगे। तारिक रहमान 18 साल का निर्वासन काटकर बांग्लादेश लौट रहे हैं। BNP ने पूरी ताकत रहमान की वापसी की तैयारियों में लगा दी है। उधर, उस्मान हादी ने एयरपोर्ट पर रहमान का विरोध करने का ऐलान कर दिया था। अगर रहमान के देश लौटने पर इस तरह का विरोध होता, तो इससे BNP की नेगेटिव इमेज बनती। पत्रकार अमानुर रहमान बताते हैं कि हादी खुलकर कहते थे कि तारिक रहमान बांग्लादेश के लिए सही नहीं हैं। 4. डॉ. यूनुस की अंतरिम सरकार
उस्मान हादी के साथ आंदोलन कर चुके एक स्टूडेंट लीडर दावा करते हैं कि उनका कद इतना बढ़ गया था कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार उनकी बातों को नजरअंदाज करके कोई फैसला नहीं ले सकती थी। चुनाव के ऐलान से पहले अवामी लीग को चुनाव लड़ने देने को लेकर चर्चा हुई, तो छात्रों की पार्टी NCP का एक धड़ा सभी पार्टियों को चुनाव लड़ने देने की वकालत कर रहा था। उस्मान हादी के विरोध के बाद अंतरिम सरकार को अवामी लीग को बैन करने का फैसला लेना पड़ा। सरकार में न रहते हुए हादी सरकार के फैसलों को प्रभावित करने लगे थे। सरकार में बैठे छात्र नेताओं को भी ये बात चुभने लगी थी। उस्मान हादी ने कई बार ये बात कही कि अंतरिम सरकार में बैठे लोग जनता के लिए जवाबदेह नहीं बचे हैं। उस्मान की राजनीति का ही असर था कि NCP अपना आधार खोने लगी। उस्मान हादी बांग्लादेश की सरकार में बैठे लोगों के लिए आंख का कांटा बन चुके थे, जो चुनाव करीब आने के साथ ज्यादा चुभने लगा था। वे बांग्लादेश के कट्टरपंथी इस्लामिक गुट हिफाजत-ए-इस्लाम के बारे में भी खुलकर बात करते थे। ग्रेटर बांग्लादेश का नक्शा जारी किया, जिसमें भारत के राज्य भी शामिल
दक्षिण एशिया में भारत के दबदबे वाली बातों से आगे बढ़कर हादी ने ग्रेटर बांग्लादेश को बढ़ावा दिया। उस्मान हादी का मानना था कि बांग्लादेश का इतिहास 1971 से नहीं, इससे काफी पहले का है। उन्होंने ग्रेटर बांग्लादेश का एक नक्शा भी जारी किया था। इसमें पश्चिम बंगाल, असम और नॉर्थ ईस्ट राज्यों का भी कुछ हिस्सा शामिल किया था। एक्सपर्ट बोले- हादी ने पार्टियों का विरोध कर नया विजन रखा
जिंदल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर और साउथ एशिया मामलों की जानकार श्रीराधा दत्ता कहती हैं कि हादी की विचारधारा भारत की आलोचना से भरी थी, लेकिन उसने अपनी राजनीति लोकतांत्रिक तरीके से की। मुझे ऐसा लगता है कि बांग्लादेश में कुछ ऐसे तत्व थे, जो राजनीति को हिंसक बनाना चाहते थे। ये तत्व चुनाव समय पर नहीं होने देना चाहते। प्रशासन को ऐसे तत्वों के खिलाफ एक्टिव रहना चाहिए था। हादी की राजनीति पर प्रोफेसर दत्ता कहती हैं, ‘वे अपनी मदरसे वाली पहचान को खुलकर सामने रखते थे। नए बांग्लादेश को लेकर अपने विचार रखते थे। मैंने कभी नहीं सुना कि उन्होंने खुलकर बांग्लादेश को इस्लामिक मुल्क बनाने की बात कही हो।’

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