ब्लैकबोर्ड-पापा को फांसी दिलाकर आत्महत्या कर लूंगी:कहते थे ब्राह्मण होकर नीच से शादी कैसे की, गोली मारकर बोले- अब मैं बहुत खुश हूं

📅 Published: January 8, 2026 | 📂 Category: India National

‘हम दोनों की लव मैरिज को तीन महीने बीत चुके थे। लग रहा था कि अब घर वाले शांत हो गए हैं और हमारी जिंदगी से उन्हें कोई लेना-देना नहीं रह गया है, लेकिन 5 अगस्त 2025 की शाम, करीब 5 बजे, सब कुछ बदल गया। मेरे पति राहुल क्लास में अटेंडेंस लगाकर कॉलेज के मेन गेट की ओर जा रहे थे। वहीं उनकी काली बुलेट खड़ी थी। मैं नर्सिंग डिपार्टमेंट से क्लास खत्म कर बाहर निकली ही थी, तभी कॉलेज के मेन गेट पर मुझे पापा दिखाई दिए। वे उजले रंग का मास्क और नीले रंग का कोट पहने हुए थे। कमर में कट्टा खोंसे वे बुलेट के पास खड़े हो गए। उन्होंने आसपास खड़े छात्रों से पूछा- ‘ये काली बुलेट किसकी है?’ छात्रों ने जवाब दिया- ‘राहुल मंडल की।’ कुछ ही देर बाद जैसे ही राहुल बुलेट लेने पहुंचे, पापा ने कट्टा निकाला और उसके सीने में दो गोलियां दाग दीं। राहुल का सीना खून से सना हुआ था। उस वक्त मैं राहुल से बस कुछ कदम की दूरी पर थी। वह लड़खड़ाकर जमीन पर गिरने ही वाला था कि मैं चीखते हुए उसकी ओर भागी। बदहवासी में वह मेरे सीने से आकर लग गया। पापा चीख-चीखकर कह रहे थे- ब्राह्मण होकर बेटी ने नीच से शादी कैसे की? मर गया, अब मैं बहुत खुश हूं। अब बेटी को भी मारूंगा।’, तनुप्रिया झा स्याह कहानियों की सीरीज ‘ब्लैकबोर्ड’ में आज कहानी इंटरकास्ट मैरिज करने वाली बिहार की तनुप्रिया की। जिसके पिता ने जाति की वजह से अपनी 20 साल की बेटी को विधवा बना दिया… तनुप्रिया आगे बताती हैं, ‘मैं और आसपास के दोस्त राहुल को लेकर इमरजेंसी वार्ड की ओर भागे। भागते हुए मैं बार-बार पापा से चिल्लाकर पूछ रही थी- ‘तुमने मेरे पति को क्यों मारा? तुमने मेरा सुहाग क्यों उजाड़ दिया, हत्यारे?’ पापा कट्टा हाथ में लिए मेरे पीछे-पीछे इमरजेंसी वार्ड की ओर दौड़ रहे थे। तभी मेरे कुछ दोस्तों ने उन्हें पकड़ कर पीटना शुरू कर दिया। कुछ ही देर बाद राहुल मेरी गोद में हमेशा के लिए सो गया। वह मर गया। डॉक्टर चाहकर भी कुछ नहीं कर पाए। यह कहते हुए 20 साल की तनुप्रिया झा की बड़ी-बड़ी आंखों में आंसू भर आते हैं। गला भर जाता है, शरीर कांपने लगता है। लड़खड़ाती आवाज में वह कहती हैं- ‘ऐसे आदमी को मैं अपना बाप नहीं कहना चाहती। अब उससे मेरा कोई रिश्ता नहीं। प्रेम शंकर झा मेरे पति राहुल मंडल का हत्यारा है। मेरी आखिरी इच्छा है कि उस हत्यारे को फांसी पर झूलते हुए देखूं।’ बिहार के सुपौल से 15 किलोमीटर दूर तुलापट्टी गांव के रहने वाले राहुल मंडल क्रिकेट और बुलेट के शौकीन थे। इसी वजह से दोस्त और तनुप्रिया उन्हें महेंद्र सिंह धोनी के निकनेम पर प्यार से ‘माही’ कहते थे। आज यह गांव राहुल से ज्यादा तनुप्रिया को जानता है। गांव में किसी से भी पूछिए, इशारों में ही लोग राहुल के घर का रास्ता बता देते हैं। राहुल मंडल के घर जाने वाली सड़क के दोनों ओर जूट की टहनियों पर गोबर का लेप लगा है। ठंड के मौसम में यहां के लोग सूखने के बाद इसी गोबर के उपलों से खाना पकाते हैं। राहुल के घर के ठीक सामने कई बकरियां और गायें बंधी हुई हैं। घर पहुंचते ही पहली मुलाकात उनके पिता गणेश मंडल से होती है। वे मुझे बैठने के लिए कुर्सी लाकर देते हैं और फिर चुप्पी साधे इधर-उधर देखने लगते हैं। टोकने पर दबी जुबान में कहते हैं- ‘एक ही तो बेटा था। वह भी चला गया। अब किसी से क्या कहना, सब खत्म हो गया। जाते-जाते अपनी जगह दूसरा बेटे (तनुप्रिया) को दे गया है। अब उसी को देखकर जी रहा हूं।’ यह कहते हुए गणेश मुंह फेर लेते हैं और अपनी वीरान पड़ी दुकान की ओर चले जाते हैं। कभी यहां उनकी किराने की दुकान हुआ करती थी। अब वह सिर्फ लकड़ी की एक गुमटी भर रह गई है। इस दौरान मैं राहुल के घर के बाहर खड़ा था, तभी एक दुबली-पतली, लंबी लड़की बाहर निकलती है। देखते ही मैं पूछ बैठता हूं- ‘आप तनुप्रिया हैं?’ इशारों में वह हामी भरती हैं- ‘हां’। पीछे से उनकी सास और राहुल की मां अनिता देवी भी आ जाती हैं। वे दोनों मुझे घर के भीतर बरामदे में ले जाते हैं। तनु सिहरती हुई आवाज में कहती हैं- ‘सास के लिए अब मैं ही राहुल हूं। इनका बेटा हूं। बहू की तरह नहीं, बेटे की तरह इनके साथ रहती हूं। अगर बहू बनकर रहती, तो घर से बाहर आकर आपको बुला न पाती। ये जो डेनिम की जैकेट मैंने पहनी है, राहुल की ही है।’ घर में चारों ओर नजरें घुमाने के बावजूद मुझे राहुल की एक भी तस्वीर दिखाई नहीं देती। पूछने पर तनु मुझे एक कमरे की ओर ले जाती हैं। ऊपर छज्जे से दो तस्वीरें उतारती हैं। दोनों तस्वीरें राहुल की हैं। तस्वीर पर हाथ फेरते हुए, रुंधे गले से तनु कहती हैं- ‘ये दिसंबर 2024 की फोटो है। मैंने ही इसे कॉलेज कैंपस में खींचा था। अब तो बस इसी फोटो का सहारा है। राहुल का एक ऑडियो मैसेज भी है, जिसे मैं हर रात सुनकर सोती हूं। कोई ऐसी रात नहीं, जब यहां ससुराल में हम लोगों में से कोई रोता न हो। पहले जब यह तस्वीर घर में टंगी रहती थी, तो पापा… यानी हमारे ससुर इसे देखते ही फूट-फूटकर रोने लगते थे। एक दिन उन्होंने कहा- इसे छुपाकर कहीं रख दो। तब से यह तस्वीर इसी छज्जे पर रखी है।’ कमरे के सामने एक बैंगनी रंग की, धूल से सनी ट्रॉली बैग रखी हुई है। उसका रंग अब मटमैला हो चुका है। तनु उसकी ओर इशारा करते हुए कहती हैं- ‘इसी में हमारे कपड़े, शादी का जोड़ा, किताबें… सब कुछ है। जब से यह ट्रॉली बैग दरभंगा से आया है, तब से इसे खोलकर देखा नहीं है। देखने की हिम्मत नहीं होती।’ इसे दिखाकर तनु वापस बरामदे में रखे तख्त पर आकर बैठ जाती हैं। फिर बताने लगती हैं- ‘12वीं के बाद मैंने दरभंगा के DMCH कॉलेज में नर्सिंग कोर्स में एडमिशन लिया था। राहुल मुझसे सीनियर थे। दिसंबर 2024 में हमारी पहली मुलाकात हुई। धीरे-धीरे हम साथ उठने-बैठने लगे। पढ़ाई, घूमना-फिरना सब चल रहा था। उस वक्त हम सिर्फ अच्छे दोस्त थे। एक-दूसरे को प्रपोज भी नहीं किया था।’ राहुल के पास बुलेट बाइक थी। कभी-कभी हम दरभंगा के श्यामा माई मंदिर घूमने चले जाते थे। मुझे भी बुलेट चलाने का शौक है, तो मैं उसे चला लेती थी। एक दिन यह बात कॉलेज की प्रिंसिपल गुड़िया को पता चल गई। अगले दिन उन्होंने क्लास के करीब 60 छात्रों के सामने मुझे बुलाया और कहा- ‘तुम राहुल मंडल से बात करती हो? उसके साथ बुलेट पर घूमती हो? उसका सरनेम पता है? क्लास के बाद मेरे चैंबर में आकर मिलना। तुम्हें पता है कि वह छोटी जाति का है?’ यह कहकर प्रिंसिपल अपने ऑफिस चली गईं। क्लास खत्म होने के बाद जब मैं उनके चैंबर में पहुंची, तो वे मुझ पर चिल्लाने लगीं- ‘राहुल SC-ST जाति से है। तुम ब्राह्मण परिवार की हो। अपने मां-बाप की नाक कटाओगी क्या? कुल-खान-दान की इज्जत मिट्टी में मिलाना चाहती हो? तुम उसके साथ घूमती हो, बात करती हो। तुम्हारा उससे चक्कर चल रहा है न? आज के बाद तुम उससे बात नहीं करोगी।’ उस दिन मैं सिर झुकाए चैंबर से निकल आई। सोचने लगी- राहुल तो मेरा दोस्त है। दोस्ती में जाति का क्या मतलब? उस वक्त तो मुझे यह भी नहीं पता था कि ‘मंडल’ किस जाति का सरनेम होता है। मैंने प्रिंसिपल की बात नहीं मानी और पहले की तरह राहुल के साथ रहती रही। धीरे-धीरे हमारे बीच प्यार हो गया। एक दिन दरभंगा घूमते हुए राहुल ने मुझसे कहा- ‘तनु, हम दोनों कुछ बनने के बाद ही शादी करेंगे। अभी पढ़ाई पर फोकस करते हैं। जब अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे, तब घर वालों को बताएंगे। हम दोनों एक-दूसरे की फेमिली को मना लेंगे।’ क्या बनना चाहती थीं आप? तनु कहती हैं- ‘राहुल नर्सिंग ऑफिसर बनना चाहते थे। मैं यूपीएससी की तैयारी करना चाह रही थी। मैंने ऑनलाइन क्लासेज भी जॉइन कर ली थीं। स्टडी मटेरियल खरीदकर लाई थी। अब वो सारी किताबें तहखाने में धूल फांक रही हैं। राहुल की मौत के बाद कभी हिम्मत नहीं हुई उस कॉलेज में जाने की। उसके बाद उन किताबों के पन्ने भी नहीं पलटे मैंने। क्या ही पलटूं। अब तो जिंदगी का कोई सपना ही नहीं बचा। यूपीएससी क्रैक भी कर लूं, तो किसके लिए? कौन देखेगा अब? कुछ नहीं बचा। एक बाप ने अपनी ही बेटी को जिंदा लाश बना दिया। उसने यह भी नहीं सोचा कि वह अपनी बेटी की मांग उजाड़ने जा रहा है।’ यह कहते-कहते तनु फिर से फूट-फूटकर रोने लगती हैं। कुछ देर बाद मैं धीरे से उनके बचपन के बारे में पूछता हूं। लंबी सांस लेते हुए वह कहती हैं- ‘हम दो बहनें, एक भाई हैं। सहरसा के मेरे बनगांव में घर-घर ब्यूरोक्रेट्स यानी आईएएस-पीसीएस बने हैं। मैं भी बचपन से सिविल सर्विसेज में जाना चाहती थी। घर पर जो टीचर पढ़ाने आते थे, वे कहते थे- तनु पढ़ाई में होशियार है, इसे सिविल सर्विसेज की तैयारी ही करानी चाहिए। छठीं क्लास के बाद मैं सिमुलतला आवासीय विद्यालय चली गई। 12वीं पास करने के बाद DMCH (दरभंगा मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल) में नर्सिंग कोर्स में एडमिशन लिया। यह मेरे करियर का प्लान-बी था। पापा की दवा की दुकान थी।’ वह बताती हैं- ‘यहीं मेरी दोस्ती राहुल से हुई। जब मेरे कॉलेज की प्रिंसिपल ने पापा को बताया कि मैं राहुल के साथ बुलेट पर घूमती हूं, तो पापा ने फौरन मुझे सहरसा बुला लिया। तारीख थी- 28 मार्च 2025। मुझे नहीं पता था कि उन्होंने क्यों बुलाया है। शाम को जब पापा दुकान से लौटे, तो मुझे देखते ही चिल्ला पड़े। पूछा- ‘ये राहुल कौन है?’ मैंने सकुचाते हुए कहा- ‘कॉलेज का दोस्त।’ ‘तुम उसके साथ बुलेट पर घूमती हो?’ यह कहते हुए पापा ने कमर से बेल्ट निकाल लिया। मैं कांपते हुए बोली- ‘हां… मुझे बुलेट चलाना अच्छा लगता है। उसके पास है, तो हम घूमने गए थे।’ इतना सुनते ही पापा ने बेल्ट मेरी पीठ पर बरसानी शुरू कर दी। मैं दर्द से चीखने लगी। बेल्ट से पीटते हुए वह मेरे बाल खींचते हुए बोले- ‘किस जाति का है वह?’ मैं हकलाते हुए बोली- ‘वह अपना नाम राहुल मंडल लिखता है। सब उसे माही कहते हैं।’ ‘मंडल…’ सुनते ही पापा आग-बबूला हो गए- ‘तुम नीच जाति के लड़के के साथ घूमती हो। %$#@… पूरे खानदान का मुंह काला करोगी। कल थाने चलो और उसके खिलाफ रेप केस लिखवाओ।’ मैं रोते हुए बोली- ‘उसने मेरे साथ कुछ गलत नहीं किया है। मैं झूठा केस कैसे दर्ज करवाऊं?’ यह सुनते ही पापा ने फिर से बेल्ट उठाई। ऐसा एक महीने तक रोज हुआ। उन्होंने तीन-तीन बेल्ट के बक्कल मेरी पीठ पर तोड़ दिए। कमर से लेकर पैरों तक पूरी पीठ लाल हो चुकी थी। दर्द बढ़ता तो वही दवा लाकर दे देते। उस दौरान मेरे दोनों भाई कहते- ‘इसे उस लड़के से प्यार हो गया है। दोनों शादी करना चाहते हैं। इसलिए ये शिकायत नहीं लिखवाना चाहती। इसे और मारो।’ एक दिन पापा गुस्से में बोले- ‘लड़के की इंस्टाग्राम आईडी और पासवर्ड दो।’ मैंने मना कर दिया। उस दिन मम्मी, पापा, भाई, दादी- सबने मिलकर मुझे मारा। इतना कि मैं चल नहीं पा रही थी। घर में बेहोश पड़ी रही। अप्रैल में मैंने राहुल को इंस्टाग्राम पर मैसेज किया। लिखा- ‘मुझे यहां से किसी भी तरह ले चलो। नहीं तो घर वाले मुझे मार देंगे।’ एक दिन शाम को घर में सिर्फ मां और दादी थीं। दोनों रसोई में काम कर रहे थे। राहुल अपनी बुलेट से दरवाजे पर आया। मैं कुछ जरूरी डॉक्यूमेंट्स उठाई और तुरंत उसके साथ दरभंगा भाग निकली।’ तनुप्रिया अपने मोबाइल में घर वालों की कुछ तस्वीरें दिखाने लगती हैं। मां की तस्वीर पर उंगली टिक जाती है। वह सरकारी टीचर हैं। तनु कहती हैं- ‘जिस दिन मैं घर से भागी थी, उस दिन जब पापा दुकान से लौटे, तो उन्होंने मेरे खोज-बीन शुरू कर दी। 1 मई को उन्होंने बनगांव थाने में राहुल और उसके परिवार के खिलाफ मेरा अपहरण करने का मामला दर्ज करा दिया। दूसरी तरफ मैंने राहुल के साथ 5 मई को लखीसराय के एक मंदिर में शादी कर ली।’ अचानक शादी कर ली? ‘और क्या करती? वे लोग मेरी शादी मेरे मुंहबोले भाई से कराना चाह रहे थे, जिसके हाथ में मैं राखी बांधती थी। पापा कह रहे थे कि मुझे उसी से शादी करनी होगी।’ तख्त पर तनुप्रिया के बगल में उनकी सास अनिता देवी बैठी हैं। तनु की बात सुनते ही अनिता रोने लगती हैं। तनु आगे कहती हैं- ‘5 मई को शादी के बाद हम दोनों एक किराए के कमरे में रहने लगे थे। सब कुछ सामान्य हो गया था। हम दोनों पहले की तरह पढ़ाई कर रहे थे। 9 अगस्त को रक्षाबंधन आने वाला था। राहुल ने कहा कि तुम भाइयों के लिए राखी कूरियर कर दो। 4 अगस्त को मैंने अपने दोनों भाइयों के लिए राखी भेज दी। अगले ही दिन, 5 अगस्त को, मेरे भाइयों और पिता ने मिलकर मेरे पति की जान ले ली और मुझे विधवा बना दिया। राखी शायद रास्ते में ही रह गई होगी। सब कुछ एक जाति की वजह से खत्म हो गया।’ वह ठहरकर कहती हैं- ‘अब मैं उस हत्यारे बाप की बेटी नहीं कहलाना चाहती। मैंने अपने मायके से सारे रिश्ते खत्म कर लिए हैं। मेरी आखिरी इच्छा है कि अपने बाप को फांसी के फंदे पर झूलते देखूं। उसके बाद खुद को खत्म कर लूंगी। राहुल के जाने के बाद मैंने आज तक आईने में अपना चेहरा नहीं देखा।’ यह कहते हुए तनुप्रिया की आंखें डबडबा जाती हैं। उनकी सास अनिता बीच में टोकती हैं- ‘अब रहने दीजिए। जितनी बार ये बातें दोहराती हैं, कई-कई दिन खाना-पीना नहीं खा पाती। घर में खुद को बंद कर मूर्ति की तरह बैठी रहती है। उस डाकू बाप ने मेरे बेटे को मार दिया। उसे तो फांसी दिलवाकर रहूंगी। बेटे के बदले अब यही तनु मेरा बेटा है। इसी को देखकर हम जी रहे हैं। मैं घर से बाहर नहीं निकलती। डर लगता है कि लोग कहेंगे- देखो, जिसने बेटे की हत्या की, उसी की बेटी को घर में बिठा रखा है। सोचती हूं, बेटी का बाप भला उसका सुहाग कैसे उजाड़ सकता है। अब यह अनाथ हो गई है। जब तक जिएगी, इसी घर में रहेगी। लोग कहते हैं, इसकी दोबारा शादी कर दो। अगर यह मेरी बेटी होती, तो शायद दोबारा शादी की सोचती, लेकिन यह अब मेरे लिए बेटा है। राहुल के बदले तनु है।’ यह कहते हुए तनुप्रिया और अनिता एक-दूसरे को गले लगाकर रोने लगती हैं। तनु सिसकते हुए कहती हैं- ‘कभी इसी हाथ से मैं मांग में सिंदूर भरती थी। उस दिन इसी हाथ से मैंने अपने पति की चिता को आग दी। अब तो भाई, बाप जैसे रिश्तों का नाम सुनकर भी डर लगता है।’ ——————————————– 1- ब्लैकबोर्ड-तलाक हुआ तो अनजान डोनर से स्पर्म लेकर मां बनी:विदेश ले जाकर पति ने घर से निकाला, बिना पति के महिलाओं की कहानियां मेरी चीख सुनकर पड़ोसी जमा हो गए। बिस्तर से उठी तो देखा- मेरी सास ही तौलिए से मेरा मुंह दबा रही थीं। वह जोर-जोर से कह रही थीं- तूने मेरे बेटे को खा लिया। तू मांगलिक है। कुलच्छन है। अब अपने बच्चे को लेकर यहां से भाग जा, नहीं तो तुझे जिंदा नहीं छोड़ूंगी। पूरी खबर यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड- बेटी ने मारा तो घर छोड़ा:बस के नीचे मरने पहुंचे, भाई ने फर्जी साइन से पैसे हड़पे, वृद्धाश्रम में रोज सुबह सोचते हैं- कोई लेने आएगा मेरे बच्चे नहीं हैं। पत्नी की मौत के बाद अकेला हो गया था। मुझे आंख से दिखाई नहीं देता। एक रिश्तेदार के यहां रहने चला गया। वहां बहुत जलील हुआ तो एक दूसरे रिश्तेदार के यहां रहने पहुंचा, लेकिन उन्होंने अपने यहां रखने से साफ मना करा दिया। उस दिन मन में विचार आया कि सब खत्म कर दूं। सोचा कि यमुना में कूद जाऊं। फिर मरने के लिए एक बस डिपो पर गया। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें

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