हाईकोर्ट ने बदली मर्डर के दोषियों की मौत की सजा:आजीवन कारावास में की तब्दील, नाबालिग का अपहरण कर की थी हत्या

📅 Published: January 7, 2026 | 📂 Category: Uncategorized

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने 16 वर्षीय छात्र के अपहरण व मर्डर के दो दोषियों की मृत्युदंड की सजा को बदल दिया है। अब उन्हें प्राकृतिक जीवन के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। हाईकोर्ट ने माना कि एक नाबालिग छात्र का अपहरण और फिरौती के लिए हत्या किया जाना अपराध अत्यंत जघन्य था लेकिन कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दया याचिका के बाद की कार्यवाही में अपराध की गंभीरता निर्णायक नहीं होती, बल्कि यह देखा जाता है कि क्या दोषी के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। हालांकि, हाईकोर्ट ने दोषियों को सामान्य आजीवन कारावास देकर रिहाई का रास्ता खोलने से इनकार कर दिया। पीड़ित पक्ष और समाज की न्याय की मांग को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने मृत्युदंड के स्थान पर शेष प्राकृतिक जीवन तक कारावास की सजा दी । 2005 में हुआ था मर्डर 14 फरवरी 2005 को 16 वर्षीय छात्र अभि वर्मा उर्फ हैरी का अपहरण कर लिया गया था। अपहरणकर्ताओं ने 50 लाख रुपए की फिरौती की मांग की थी, लेकिन अगले ही दिन छात्र का शव खेतों से बरामद कर लिया गया। इस सनसनीखेज घटना के बाद दर्ज एफआईआर के आधार पर मुकदमा चला और 21 दिसंबर 2006 को सेशन कोर्ट, होशियारपुर ने विक्रम सिंह उर्फ विक्की वालिया और जसबीर सिंह उर्फ जस्सा को दोषी ठहराते हुए उन्हें मौत की सजा सुनाई। हाईकोर्ट ने सजा को बरकरार रखा 2008 में हाईकोर्ट ने दोनों दोषियों की मौत की सजा को बरकरार रखा और इसके बाद 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस सजा को कायम रखा। इसके बाद वर्षों तक दया याचिकाओं, पुनर्विचार याचिकाओं और संवैधानिक याचिकाओं की एक लंबी श्रृंखला चलती रही। इस दौरान दोषियों ने गंभीर आरोप लगाए कि उन्हें लंबे समय तक अवैध एकांत कारावास में रखा गया और उनकी दया याचिकाओं के निपटारे में अत्यधिक देरी की गई। हाईकोर्ट ने कहा कि अगर दया याचिकाओं पर फैसला करने में बेवजह देरी हो, कैदियों को अवैध रूप से अकेले रखा जाए या उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाए, तो इसे गंभीर परिस्थिति माना जाएगा। ऐसे मामलों में मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदला जा सकता है। मानवीय और संवैधानिक तरीके से व्यवहार किया जाए हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखकर पाया कि दोषियों को सुप्रीम कोर्ट के नियमों के खिलाफ, लंबे समय तक दूसरे कैदियों से अलग रखा गया था। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि दया याचिका पर अंतिम फैसला आने से पहले किसी दोषी को फांसी की कोठरी में रखना या अलग-थलग करना कानून के खिलाफ है। हाईकोर्ट ने यह भी माना कि दया याचिकाओं पर फैसले में देरी और उसके बारे में दोषियों को समय पर जानकारी न देना, मानसिक पीड़ा देता है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने कहा कि अपराध भले ही बहुत गंभीर और समाज को झकझोरने वाला हो, लेकिन मौत की सजा के बाद भी राज्य का कर्तव्य है कि दोषियों के साथ मानवीय और संवैधानिक तरीके से व्यवहार किया जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोषियों के अधिकारों की रक्षा करने से पीड़ित का दर्द कम नहीं होता, बल्कि इससे कानून और संविधान की मजबूती दिखती है। इन सभी कारणों को देखते हुए हाईकोर्ट ने दोषियों की मौत की सजा को उनके पूरे जीवन के लिए आजीवन कारावास में बदल दिया। साथ ही यह भी कहा कि इस सजा में उन्हें सामान्य रिहाई या अपने आप छूट मिलने का कोई अधिकार नहीं होगा।

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