जरूरत की खबर- कहीं आपको टेलिफोबिया तो नहीं:फोन बजते ही होती घबराहट, बढ़ती दिल की धड़कन, न्यूरोलॉजिस्ट से जानें कैसे कोप करें

📅 Published: January 8, 2026 | 📂 Category: Uncategorized

कुछ लोगों के लिए फोन कॉल एक उम्मीद की तरह होता है। जबकि कुछ लोगों को फोन की घंटी बजते ही घबराहट होने लगती है। उनकी हार्ट बीट बढ़ जाती है, पसीना आने लगता है। वे फोन नहीं रिसीव कर पाते हैं। अगर किसी के साथ ऐसा हो रहा है तो ये टेलिफोबिया के कारण हो सकता है। यह एक तरह का सोशल एंग्जाइटी डिसऑर्डर है, जिसमें शख्स सोशल लाइफ से दूरी बनाने लगता है। टेलिफोबिया होने पर फोन कॉल करने और रिसीव करने दोनों में डर लगता है। आज जरूरत की खबर में टेलिफोबिया के बारे में बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- एक्सपर्ट: डॉ. एम.एस. पांडुरंग, सीनियर कंसल्टेंट, न्यूरोलॉजी, धर्मशिला नारायणा हॉस्पिटल, दिल्ली सवाल- टेलिफोबिया क्या होता है? यह फोन पर बात करने की सामान्य झिझक से कैसे अलग है? जवाब- टेलिफोबिया को फोन एंग्जाइटी भी कहा जाता है। इसमें व्यक्ति को फोन कॉल करने या उठाने से डर लगता है। यह डर सिर्फ असहजता नहीं है, बल्कि मेंटल स्ट्रेस से जुड़ा होता है। सामान्य झिझक में व्यक्ति थोड़ी हिचक के बाद कॉल कर लेता है। सवाल- टेलिफोबिया के लक्षण क्या हैं? इसे कैसे पहचानेंगे? जवाब- इसमें आमतौर पर फोन की घंटी बजते ही घबराहट महसूस होती है। सभी लक्षण ग्राफिक में देखिए- सवाल- टेलिफोबिया क्यों होता है? जवाब- इसमें शख्स किसी पुरानी घटना या बात को लेकर इतना डर जाता है कि उसे कुछ गलत हो जाने का डर सताता रहता है। किसी से बात करते समय कुछ गलत बोल देने या गलत हो जाने का डर ही इसकी बड़ी वजह है। इसके और भी कई कारण हैं- सवाल- क्या इस फोबिया का कोई कनेक्शन कोविड, वर्क फ्रॉम होम और सोशल मीडिया से है? जवाब- कोविड के दौरान लोगों की बातचीत पूरी तरह डिजिटल हो गई। फोन कॉल और वीडियो कॉल अचानक बहुत बढ़ गए। इससे कई लोगों की एंग्जाइटी ट्रिगर हो गई। इस तरह की आदतें अक्सर आगे चलकर टेलिफोबिया में बदल जाती हैं। सवाल- क्या टेलिफोबिया कोई मेंटल हेल्थ कंडीशन है? जवाब- नहीं, हर मामले में टेलिफोबिया मेंटल हेल्थ कंडीशन नहीं होता है। अगर टेलिफोबिया के कारण रोज के काम और रिश्ते बिगड़ रहे हैं तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। जरूरत पड़ने पर एक्सपर्ट से सलाह जरूर लें। सवाल- क्या टेलिफोबिया एक तरह की एंग्जाइटी है? जवाब- हां, टेलिफोबिया एंग्जाइटी से जुड़ी समस्या है। सवाल- क्या टेलिफोबिया आज की युवा पीढ़ी में कॉमन है? जवाब- हां, यह युवाओं में काफी तेजी से बढ़ रहा है। सवाल- टेलिफोबिया से रिश्ते, दोस्ती, परिवार और ऑफिस पर क्या असर पड़ता है? जवाब- सबसे पहले तो कॉल अवॉइड करने से रिश्तों में दूरी आती है। दोस्त और परिवार खुद को इग्नोर्ड महसूस कर सकते हैं। सवाल- युवा फोन कॉल से ज्यादा मैसेज और चैट पर बात करना पसंद करते हैं? क्या ये भी एक तरह का टेलिफोबिया ही है? जवाब- मैसेज पसंद करने वाला हर व्यक्ति टेलिफोबिक नहीं होता है। यह टेलिफोबिया है या नहीं, इसे समझने के लिए कॉल आने पर उभरे इमोशंस और उस समय शख्स का व्यवहार, दोनों को देखना जरूरी है। सवाल- टेलिफोबिया को कैसे कंट्रोल किया जा सकता है? जवाब- इसमें सबसे जरूरी ये है कि आप धीरे-धीरे कॉल की आदत डालें। अगर टेलिफोबिया बहुत एडवांस लेवल पर नहीं है तो खुद की कोशिश से ही सुधार हो सकता है। सवाल- क्या प्रोफेशनल हेल्प से टेलिफोबिया में मदद मिलती है? प्रोफेशनल हेल्प लेना कब जरूरी है? जवाब- हां, एंग्जाइटी और किसी भी तरह की मेंटल हेल्थ कंडीशन में प्रोफेशनल हेल्प सबसे सही रास्ता होता है। प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी ……………… ये खबर भी पढ़िए जरूरत की खबर- प्रोटीन शेक पीने से लड़के की मौत:जानें प्रोटीन क्या है, शरीर के लिए कितना जरूरी, प्रोटीन सप्लीमेंट लेना क्यों खतरनाक हाल ही में उत्तर प्रदेश के कन्नौज में एक 19 साल के लड़के की प्रोटीन शेक पीने से मौत हो गई। शेक पीने के बाद लड़के के लंग्स ने काम करना बंद कर दिया। शरीर में ऑक्सीजन की कमी हुई और मौत हो गई। आगे पढ़िए…

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