फिजिकल हेल्थ- आर्टिफिशियल स्वीटनर्स से ब्रेन जल्दी होता बूढ़ा:‘शुगर फ्री’ से सावधान, जानें इसके हेल्थ रिस्क, बता रहे हैं डॉक्टर

📅 Published: January 19, 2026 | 📂 Category: Uncategorized

आर्टिफिशियल स्वीटनर्स हमारी रोजमर्रा की डाइट का हिस्सा बन चुके हैं। किसी भी शुगर-फ्री प्रोसेस्ड फूड, प्रोटीन पाउडर, फ्लेवर्ड योगर्ट या डाइट सोडा काे उठाकर देखें तो उसके इंग्रीडिएंट्स में कोई-न-कोई आर्टिफिशियल स्वीटनर जरूर मिलेगा। ये स्वीटनर चीनी के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं क्योंकि ये इंसुलिन स्पाइक नहीं करते और कैलोरी के बिना मिठास देते हैं। यही वजह है कि डायबिटिक लोग, वेट लॉस करने वाले लोग और हेल्दी डाइट लेने वाले लोग इसका इस्तेमाल करते हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये वाकई हमारी सेहत के लिए सुरक्षित है। अक्टूबर, 2025 में ‘अमेरिकन एकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी’ के मेडिकल जर्नल में एक स्टडी पब्लिश हुई। इसके मुताबिक, आर्टिफिशियल स्वीटनर्स का ज्यादा सेवन याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता को कम कर सकता है। ऐसे में इसे पूरी तरह बेफिक्र होकर लेना समझदारी नहीं है। तो चलिए, आज फिजिकल हेल्थ में हम आर्टिफिशियल स्वीटनर्स के बारे में विस्तार से बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- एक्सपर्ट: डॉ. साकेत कांत, सीनियर कंसल्टेंट एंडोक्रोनोलॉजी, श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट, दिल्ली सवाल- आर्टिफिशियल स्वीटनर पर हुई नई स्टडी क्या कहती है? जवाब- ये स्टडी ब्राजील के 12,772 लोगों पर हुई, जिनकी औसत उम्र 52 साल थी। रिसर्च में शामिल लोगों को करीब आठ साल तक मॉनिटर किया गया। इस दौरान उनके खानपान की जानकारी ली गई और समय-समय पर ब्रेन टेस्ट किए गए। रिसर्च में एस्पार्टेम, सैकरिन, एससल्फेम-K, एरिथ्रिटोल, जाइलिटोल, सॉर्बिटोल और टैगाटोज जैसे 7 आर्टिफिशियल स्वीटनर्स की जांच की गई। इसमें पाया गया कि जो लोग ज्यादा आर्टिफिशियल स्वीटनर्स ले रहे थे, उनकी सोचने और याद रखने की क्षमता दूसरों के मुकाबले 62% तेजी से कम हुई। यह कमी ऐसी थी, मानो ब्रेन अपनी असली उम्र से 1.6 साल ज्यादा बूढ़ा हो गया हो। स्टडी संकेत देती है कि चीनी के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल होने वाले ये स्वीटनर्स लंबे समय में हमारी ब्रेन हेल्थ को नुकसान पहुंचा सकते हैं। सवाल- आर्टिफिशियल स्वीटनर क्या है? जवाब- ये ऐसे केमिकल या प्रोसेस्ड पदार्थ होते हैं, जिन्हें चीनी के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इन्हें शुगर-फ्री फूड्स, डाइट सोडा और लो-कैलोरी प्रोडक्ट्स में मिलाया जाता है। आर्टिफिशियल स्वीटनर की प्रमुख खासियतें ये होती हैं– इसलिए डायबिटिक लोग और वेट लॉस करने वाले लोग आर्टिफिशियल स्वीटनर चुनते हैं। हालांकि ये नेचुरल शुगर नहीं होते और फैक्ट्री प्रोसेसिंग से गुजरते हैं। इसलिए लंबे समय तक इन्हें खाना नुकसादायक हाे सकता है। अभी इस पर डिटेल रिसर्च की जा रही है। सवाल- ब्रेन के अलावा आर्टिफिशियल स्वीटनर के और हेल्थ रिस्क क्या हैं? जवाब- आर्टिफिशियल स्वीटनर को लेकर लगातार नई स्टडीज हो रही हैं। अब तक की मौजूदा स्टडीज के मुताबिक इसके लंबे सेवन से मेटाबॉलिक सिंड्रोम से लेकर कैंसर तक का रिस्क बढ़ता है। डिटेल नीचे ग्राफिक में देखिए– सवाल- आर्टिफिशियल स्वीटनर और चीनी में क्या अंतर है? जवाब- चीनी एक नेचुरल कार्बोहाइड्रेट है, जो शरीर को तुरंत ऊर्जा देती है। लेकिन ज्यादा मात्रा में लेने पर वजन और ब्लड शुगर बढ़ने का खतरा होता है। हालांकि ये शरीर में स्वाभाविक तरीके से मेटाबॉलाइज होती है। वहीं आर्टिफिशियल स्वीटनर शरीर को मिठास तो देते हैं, लेकिन कोई पोषण नहीं देते। यानी इनमें न तो कैलोरी होती है, न विटामिन, न मिनरल और न ही शरीर के काम आने वाला कोई पोषक तत्व। ब्लड शुगर और इंसुलिन पर भी इनका असर जीरो होता है। हमारी मेटाबॉलिक हेल्थ पर चीनी के नुकसान सामने आने के बाद ये आर्टिफिशियल स्वीटनर इसलिए काफी पॉपुलर हुए क्योंकि ये स्वाद में तो चीनी की तरह ही मीठे थे, लेकिन इन्हें खाने से शुगर नहीं बढ़ रही थी। ये इंसुलिन स्पाइक को रोकते थे। इनमें कैलोरी जीरो थी, जिस कारण वजन नहीं बढ़ता था। कुल मिलाकर डॉक्टरों–वैज्ञानिकों ने माना कि ये चीनी का एक बेहतर हेल्दी विकल्प हो सकता है। लेकिन अब धीरे–धीरे इसे लेकर हो रही स्टडीज कुछ और ही इशारे कर रही हैं। अब ये माना जा रहा है कि अगर लंबे समय तक इसका सेवन किया जाए तो गट हेल्थ, ब्रेन हेल्थ, भूख कंट्रोल और ब्रेन सिग्नलिंग पर नगेटिव प्रभाव पड़ता है। सवाल- लोग आर्टिफिशियल स्वीटनर क्यों खाते हैं? जवाब- अक्सर लोग चीनी के नुकसान से बचने, वजन कंट्रोल करने, डायबिटीज मैनेज करने और फिटनेस ट्रेंड फॉलो करने के लिए आर्टिफिशियल स्वीटनर चुनते हैं। नीचे दिए ग्राफिक से समझिए- सवाल- किन फूड्स में आर्टिफिशियल स्वीटनर हो सकता है? जवाब- रोजमर्रा के कई प्रोसेस्ड फूड्स में आर्टिफिशियल स्वीटनर हो सकते हैं। बाजार में मिलने वाले जितने भी फूड प्रोडक्ट पर ‘शुगर-फ्री’ का लेबल लगा होता है, उन सब में चीनी के विकल्प के रूप में आर्टिफिशियल स्वीटर का इस्तेमाल किया जाता है। ‘लो कैलोरी’ या ‘डाइट’ का लेबल भी इस बात का संकेत है कि उस प्रोडक्ट में चीनी की जगह मिठास के लिए आर्टिफिशियल स्वीटनर का इस्तेमाल किया गया है। इसलिए लेबल पढ़ना जरूरी है। नीचे ग्राफिक में आर्टिफफिशियल स्वीटनर मिले फूड की लिस्ट देखिए- सवाल- कैसे पता करें कि किसी फूड में आर्टिफिशियल स्वीटनर है या नहीं? जवाब- ये पता करने का एकमात्र तरीका यही है कि फूड पर लिखे हुए इंग्रीडिएंट लेबल को ध्यान से पढ़ा जाए। सवाल- फूड लेबल पर आर्टिफिशियल स्वीटनर किन–किन नामों से लिखे होते हैं? जवाब- आर्टिफिशियल स्वीटनर कई तरह के होते हैं और मार्केट में कई नामों से मिलते हैं। किसी फूड में इनकी मौजूदगी का पता लगाने का एकमात्र तरीका ये है कि आपको अलग–अलग तरह के आर्टिफिशियल स्वीटनर्स के नाम पता होने चाहिए। फूड लेबल की इंग्रीडिएंट लिस्ट में नीचे दिए गए नाम दिखें तो समझ लें कि उस फूड में आर्टिफिशियल स्वीटनर मिलाया गया है। जैसेकि- इसके अलावा ‘शुगर फ्री’, ‘नो एडेड शुगर‘ या ‘लो कैलोरी‘ जैसे दावे भी संकेत देते हैं कि मिठास के लिए आर्टिफिशियल स्वीटनर इस्तेमाल किया गया हो सकता है। इसलिए केवल सामने लिखे दावों पर यकीन न करें। फूड लेबल पर दी गई इंग्रीडिएंट्स लिस्ट जरूर देखें। सवाल- जिन आर्टिफिशियल स्वीटनर्स पर यह रिसर्च हुई है, उनमें से कई को भारत में FSSAI की मंजूरी मिली हुई है। ऐसे में एक आम व्यक्ति के लिए ये दोनों बातें कनफ्यूजन पैदा कर सकती हैं। जवाब- ये बात बिल्कुल सही है। लेकिन FSSAI अकेला नहीं है। दुनिया भर की फूड एथॉरिटी एजेंसियों ने इन आर्टिफिशियल स्वीटनर्स को मंजूरी दी क्योंकि पहले इन्हें सेफ माना जा रहा था। लेकिन पिछले एक दशक में एक–एक कर कई ऐसी स्टडीज सामने आई हैं, जो इनके खतरों की ओर इशारा कर रही हैं। रिसर्चरों का मानना है कि अभी इस क्षेत्र में और वैज्ञानिक प्रमाणों की जरूरत है। लेकिन मौजूदा प्रमाण भी हमें सावधान करने के लिए काफी हैं। सवाल- आर्टिफिशियल स्वीटनर के विकल्प के रूप में कौन सी चीजें इस्तेमाल की जा सकती हैं? जवाब- आर्टिफिशियल स्वीटनर की जगह नेचुरल और कम प्रोसेस्ड विकल्प अपनाए जा सकते हैं। सीमित मात्रा में इनका सेवन सुरक्षित माना जाता है। जैसेकि– शहद, खजूर, फल, स्टीविया और मोंक फ्रूट। शहद और खजूर में नेचुरल शुगर के साथ मिनरल्स और एंटीऑक्सिडेंट होते हैं। वहीं फल प्राकृतिक मिठास के साथ फाइबर भी देते हैं, जो ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ने से रोकता है। मोंक फ्रूट और स्टीविया प्लांट-बेस्ड, नॉन-कैलोरिक स्वीटनर हैं। इनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स जीरो होता है। इसलिए ये डायबिटिक लोगों के लिए भी बेहतर विकल्प माने जाते हैं। हालांकि इनका सेवन भी सीमित मात्रा में ही करना चाहिए। सवाल- ब्रेन को हेल्दी रखने के लिए क्या करना चाहिए? जवाब- ब्रेन की सेहत हमारी रोजमर्रा की आदतों से जुड़ी होती है। सही लाइफस्टाइल से याददाश्त, फोकस और सोचने-समझने की क्षमता लंबे समय तक बेहतर बनी रह सकती है। जैसेकि- …………………….. फिजिकल हेल्थ से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए फिजिकल हेल्थ- फास्टफूड खाने से लड़की की मौत: जंक फूड से ब्रेन, लिवर होता डैमेज, फाइबर वाले फल-सब्जी खाएं, हेल्दी रहें यूपी के अमरोहा में 11वीं की छात्रा की ज्यादा फास्टफूड खाने से मौत हो गई। दिल्ली AIIMS में उसका इलाज चल रहा था। डॉक्टर ने बताया कि ज्यादा फास्टफूड खाने से लड़की की आंतें आपस में चिपक गई थीं। पाचन तंत्र पूरी तरह से डैमेज हो गया था। पूरी खबर पढ़िए…

Read more


📱 Share on WhatsApp 🌐 View Original Article

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *