‘तुम्हें 8 लाख रुपए का कर्ज लिए हुए दो साल हो चुके हैं। कब तक लौटाओगे? तुम्हारे पास न अब जमीन बची है, न जायदाद। ट्रैक्टर, गाड़ी- सब बिक गए। अब क्या बेचकर पैसे दोगे? तुम ह%$#र सिर्फ कर्ज लेना जानते हो, देना नहीं। जब चुकाने की औकात नहीं थी, तो लिया क्यों? अब इस घर को बेचकर पैसे चुकाओ। नहीं तो…’ इतना कहते हुए साहूकारों ने मेरे गाल पर जोर से दो थप्पड़ जड़ दिए। मैं चिल्लाते हुए गाल सहलाने लगा। तभी एक साहूकार बोला, ‘पूरे पैसे तीन महीने के भीतर चुका दो। कर्ज चुकाने के लिए कुछ भी नहीं बचा है, तो अपनी किडनी बेचकर चुकाओ। किडनी बेचने से हमें पैसे मिल जाएंगे और किसी को जीवनदान।’ यह कहते हुए साहूकारों ने मेरे पेट पर जोर से लात मारी और घर से निकल गए। सितंबर 2023 की इन बातों को दोहराते हुए 36 साल के रोशन कुडे की आंखें डबडबा जाती हैं, मगर आंसू बाहर नहीं आते। रोशन कहते हैं, ‘अगर ये घर बेच देता, तो मेरे दो छोटे-छोटे बच्चे, पत्नी, मां-बाप, भाई- सब कहां रहते? इसलिए आखिर में अपनी किडनी ही बेच दी। फिर भी पूरा कर्ज नहीं चुका पाया। क्या करता? उन साहूकारों ने दूसरा कोई रास्ता छोड़ा ही नहीं था।’ बोलते-बोलते रोशन कुडे अपनी गर्दन दूसरी तरफ घुमा लेते हैं। मानो उन्हें मुझसे आंखें मिलाकर बात करने में शर्म आ रही हो। सामने गाय के दालान में उनकी पत्नी ईंट के चूल्हे पर रोटी पका रही हैं। पिता लकड़ी के सोफे पर बैठे पागल की तरह कुछ बुदबुदा रहे हैं। स्याह कहानियों की सीरीज ब्लैकबोर्ड में आज महाराष्ट्र के रोशन कुडे और उनके परिवार की कहानी। कैसे साहूकारों के चक्कर में पड़कर रोशन को अपनी किडनी बेचनी पड़ी। पूरी कहानी जानने के लिए मैं भोपाल से नागपुर पहुंचा और वहां से करीब 100 किलोमीटर दूर नागभीड़ कस्बे गया। यह इलाका महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में आता है। नागभीड़ के पास स्थित मिंथुर गांव में रोशन कुडे का परिवार रहता है। रोशन अपने आंगन से सटे चबूतरे पर कपड़े उतारकर नहाने की तैयारी कर रहे हैं। तभी उनके पेट की बायीं तरफ एक बड़ा-सा सर्जरी का निशान साफ दिखाई देता है। रोशन बताते हैं, ‘कंबोडिया में मेरे पेट की इसी जगह को चीरकर डॉक्टर ने किडनी निकाल ली थी। वहां से लौटने के बाद से मेरे बच्चे मुझसे पूछते हैं- पापा, आपने किडनी क्यों बेच दी? शर्म के मारे मैं बस इतना ही कह पाता हूं- नहीं, ऑपरेशन हुआ है। कैसे अपने बच्चों से कहूं कि उनके बाप ने कर्ज के बोझ में अपनी किडनी बेच दी।’ नहाते हुए रोशन की आंखें बार-बार उनके पिता शिवदास विस्तारी की ओर चली जाती हैं। विस्तारी सोफे पर लेटे हुए कुछ बुदबुदा रहे हैं। रोशन खीझते हुए कहते हैं, ‘पहले बहुत अच्छे थे। जब से उन्हें पता चला कि मैंने कर्ज चुकाने के लिए अपनी किडनी बेच दी, तब से वह पागल-से हो गए हैं।’ रोशन नहाने लगते हैं। इसी दौरान मैं उनके पिता के पास चला जाता हूं। वह उठकर बैठ जाते हैं। पूछने पर कहते हैं, ‘मैं रेलवे के मैकेनिकल डिपार्टमेंट में था। जब मेरे दो बच्चे हुए और उन्हें पालने-पोसने में दिक्कत आने लगी, तो समय से पहले रिटायरमेंट ले लिया। पता नहीं कैसी किस्मत थी कि बेटा इन साहूकारों के चक्कर में पड़ गया।’ वह आगे कहते हैं, ‘हालात ऐसे हैं कि मेरे नाती-पोते चॉकलेट-बिस्किट के लिए 5 रुपए मांगते हैं, तो दे नहीं पाता। पैसे ही नहीं हैं, तो कहां से दूं। अब कुछ भी बचा नहीं है। 2017 तक सब ठीक था- हंसता-खेलता परिवार। आज सब बर्बाद हो गया।’ उनकी आवाज भर्रा जाती है। कहते हैं, ‘अब कोई जहर पीकर मरना चाह रहा है, तो कोई फांसी लगाकर मरना चाहता है।’ कुछ देर चुप रहने के बाद वह कहते हैं, ‘साहूकारों ने सब लूट लिया। हमें जिंदा रहते हुए मार दिया। अब बेटे ने किडनी क्यों बेची, कैसे बेची- यह तो वही आपको बताएगा।’ नहाने के बाद रोशन सकुचाते हुए बातचीत के लिए खाट खींचकर मेरे सामने बैठ जाते हैं। कहते हैं, ‘2017 की बात है। मैंने 6 गायें पाली थीं। हर 10 दिन में करीब 28 हजार रुपए की आमदनी हो जाती थी। धीरे-धीरे यह संख्या बढ़कर 12 गायों तक पहुंच गई। फिर 2019 आते-आते गायें एक-एक करके बीमार पड़ने लगीं। उन्हें लम्पी वायरस हो गया था। जो पैसे दूध से आ रहे थे, वे गायों के इलाज में खर्च होने लगे। बीमारी की वजह से गायों ने दूध देना बंद कर दिया। आमदनी जीरो हो गई। हर दिन महीनों की तरह गुजरने लगा। इसी तरह दो साल बीत गए। आखिरकार सभी गायें मर गईं। अब सिर्फ पापा की पेंशन पर सब कुछ टिका था। घर किसी तरह चल रहा था।’ रोशन आगे कहते हैं, ‘गांव का ही मेरा एक दोस्त था। मेरे हालात देखकर उसने कहा- रोशन, तुम चाहो तो मेरे जानने वाले किशोर बावनकुडे और मनीष घाटबांदे से कर्ज ले सकते हो। जब पैसे हों, तब चुका देना।’ बोलते-बोलते रोशन माथा पीटने लगते हैं। बगल में बैठी उनकी पत्नी रोहिणी बार-बार अपना मंगलसूत्र निहारती हैं। उनकी आंखों से आंसू टपक रहे हैं। रोशन कहते हैं, ‘फरवरी 2021 की बात है। मैं इन दोनों साहूकारों के पास गया और अपनी पीड़ा बताई। दोनों 50-50 हजार रुपए देने के लिए राजी हो गए। बदले में पहले 15 दिन का 10 प्रतिशत ब्याज तय हुआ और भुगतान में देरी होने पर हर दिन 5 से 10 हजार रुपए तक का जुर्माना।’ ‘मैंने हामी भर दी। धीरे-धीरे उनका कर्ज बढ़ता गया। इसके बाद वे हर हफ्ते घर आकर धमकियां देने लगे।’ वह आगे बताते हैं, ‘2022 की बात है। मेरी दादी की मौत हो गई थी। उनकी तेरहवीं थी। उसी दिन सुबह-सुबह एक साहूकार मेरे घर आया और पापा को गालियां देते हुए धमकाने लगा।’ ‘मां उनके पैर पकड़कर गिड़गिड़ाने लगीं कि दादी की तेरहवीं के बाद वह कर्ज चुका देंगी। जाते-जाते उसने कहा- जमीन बेचकर पैसे चुकाओ, वर्ना…’ कर्ज लेने का कोई कागज बनवाया था? आवाज में तल्खी लाते हुए रोशन बोल पड़ते हैं, ‘साहब, सब कुछ बातचीत में ही हुआ था। जो उसने कहा, वही मुझे मानना पड़ा। चार महीने बाद साहूकार ने मुझे यहां से करीब 15 किलोमीटर दूर ब्रह्मपुरी बुलाया। उस दिन उसने कहा- अगर तुम मेरा कर्ज नहीं चुका पा रहे हो, तो मेरे एक जानने वाले हैं। उनसे पैसे लेकर मेरा कर्ज लौटा दो।’ ‘उन साहूकारों ने मुझे लक्ष्मण नाम के एक साहूकार से मिलवाया। उसने कहा- पैसे तो दे दूंगा, लेकिन 40 प्रतिशत मासिक ब्याज के साथ चुकाने होंगे। मैंने हामी भर दी। उससे मैंने 3 लाख रुपए ले लिए और पहले वाले साहूकार का कर्ज चुका दिया।’ रोशन आगे कहते हैं, ‘अब इस 3 लाख पर हर महीने 1 लाख 20 हजार रुपए ब्याज लगने लगा। इतना पैसा मैं कैसे चुका पाता? डेटा एंट्री ऑपरेटर की नौकरी करके बमुश्किल 10-12 हजार रुपए महीना कमाता था।’ रोशन कहते हैं, ‘अब साहूकार फिर से धमकी देने लगे। कहने लगे- तुम अपनी जमीन बेचकर पैसे चुकाओ। हर हफ्ते सुबह उठते ही सभी साहूकार मेरे घर आ जाते थे। गुस्से में चीखते हुए घर में घुस आते। मेरे बच्चे और पत्नी डर के मारे रोने लगते। पैसे न देने पर वे गालियां देते हुए वापस लौट जाते।’ यह कहते हुए रोशन के पेट में दर्द होने लगता है। खाट पर बैठे-बैठे वह बेचैन हो उठते हैं। थोड़ा ठहरकर कहते हैं, ‘सर, थोड़ा रुक जाइए। किडनी जब से निकाली गई है, तब से इस हिस्से में दर्द बना रहता है। ज्यादा बोलता हूं तो यहां दबाव पड़ता है और बेचैनी होने लगती है।’ मैं हामी भरते हुए रुक जाता हूं। रोशन उठकर आंगन की ओर चले जाते हैं। पत्नी रोहिणी कुडे उसी खाट पर आकर बैठ जाती हैं। गोद में डेढ़ साल के बच्चे को उठाते हुए कहती हैं, ‘ये मेरे पेट में था। साहूकार हर दिन पैसे मांगने के लिए आते थे। भद्दी गालियां देते थे। कहते थे- पैसे नहीं हैं, तो पत्नी के गहने बेचकर चुकाओ।’ वह आगे कहती हैं, ‘मेरे पास करीब एक तोला सोना था। मेरे पति ने मेरा मंगलसूत्र समेत सारी ज्वेलरी बेच दी। कभी-कभी मन होता था कि सभी को जहर देकर मर जाऊं, या इसे (पति को) छोड़कर चली जाऊं। लेकिन क्या करती? दो-दो बच्चे हैं, कहां जाती।’ कहती हैं, ‘गहने बेचने के बाद भी हम साहूकारों का कर्ज नहीं चुका पाए। फिर अपने रिश्तेदारों और आसपास के लोगों से पैसे लेने लगे। ऐसा करते-करते 15 से 20 लोगों से कर्ज ले लिया। बैंक से भी कर्ज लिया। कुल मिलाकर 74 लाख रुपए का कर्ज हो गया। इसके बाद साहूकार जमीन बेचने का दबाव बनाने लगे।’ यह कहते-कहते रोहिणी फूट-फूटकर रोने लगती हैं। रोशन वापस आकर बगल में बैठ जाते हैं। कहते हैं, ‘पापा जमीन बेचना नहीं चाहते थे। उन्होंने खेती-किसानी करके ढाई एकड़ जमीन खरीदी थी। साहूकार कहने लगे- जमीन बेचकर पैसे लाओ, नहीं तो सभी को मार देंगे।’ वह आगे कहते हैं, ‘डर के चलते पापा करीब दस दिनों तक घर से गायब हो गए। एक रिश्तेदार के यहां जाकर छिपकर रहने लगे। इधर साहूकार रोज घर आकर गाली-गलौज करते थे, पैसे मांगते थे।’ ‘एक दिन जब पापा घर लौटे, तो साहूकार उन्हें जबरन उठाकर कचहरी ले गए और पूरी जमीन बिकवा दी। ढाई एकड़ जमीन थी, वह भी खत्म हो गई।’ रोशन की आवाज भारी हो जाती है। कहते हैं, ‘जमीन बिकने के बाद भी साहूकारों का कर्ज नहीं चुका पाया, तो उन्होंने हमारे ट्रैक्टर और गाड़ी बिकवा दी। उससे भी कर्ज नहीं उतरा, तो मेरी किडनी…’ यह कहते हुए रोशन कुछ देर के लिए सन्न रह जाते हैं। ठहरकर कहते हैं, ‘सितंबर 2023 की बात है। हर दिन सुबह-सुबह साहूकारों के फोन आने लगे। सब मिलाकर कर्ज 74 लाख से ज्यादा हो चुका था।’ ‘एक दिन साहूकारों ने ब्रह्मपुरी स्थित अपने ऑफिस में बुलाया और कहा- अब तुम्हारे पास दूसरा कोई रास्ता नहीं है। अपनी किडनी बेच दो। एक किडनी के सहारे जिंदा तो रहोगे ही। इतना सोच क्या रहे हो?’ किडनी की बात सुनते ही मैं थर-थर कांपने लगा। एक साहूकार ने अपना फेसबुक पेज दिखाते हुए कहा, ‘देखो, कंबोडिया का ये हॉस्पिटल है। यहां दर्जनों पेशेंट भर्ती हैं, जिन्हें किडनी की ज़रूरत है। यहां सभी किडनी दान करते हैं। तुम भी किडनी दान कर दो। बदले में 8 लाख रुपए तो मिलेंगे ही। अगर किसी पेशेंट के परिवार वाले करोड़पति हुए, तो तुम्हारी किस्मत ही बदल जाएगी।’ वह आगे बोला, ‘मुंहमांगी कीमत पाओगे- 50 लाख, एक करोड़… जितना चाहोगे, उतना।’ उसके बाद हर दो-चार दिन में ये साहूकार मुझे बुलाकर घंटों समझाते रहते। मैं करीब छह-सात महीने तक साहूकारों की कही किडनी बेचने की बात टालता रहा। वे हर रोज घर आकर कहते- अब समय नहीं है, जल्दी पैसे चुकाओ। इधर साहूकारों के डर से घर के लोग हर वक्त रोते-बिलखते रहते थे। सुबह होते ही फोन की घंटी बजने लगती थी। सितंबर 2024 की बात है। मैंने मन बना लिया कि अब किडनी बेचनी ही पड़ेगी। सोच रहा था- वैसे भी परिवार भूखा मर रहा था। दिन में खाना बनता, तो रात में नहीं बनता था और रात में बनता, तो दिन में नहीं। जमीन, ज्वेलरी, ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल… सब बेचने के बाद भी 40 लाख का कर्ज बचा था। साहूकारों ने बहुत जल्दी, साढ़े तीन हजार रुपए में मेरा पासपोर्ट बनवा दिया। फेसबुक के जरिए डॉ. कृष्णा नाम के एक डॉक्टर से मेरा संपर्क करवाया और फिर कंबोडिया जाने का प्लान बना लिया। साहूकार को अपनी पत्नी का बैंक अकाउंट नंबर दे दिया था। मन में बस यही चल रहा था- पता नहीं, वहां जाने के बाद जिंदा लौटूंगा या नहीं। 21 सितंबर की रात से एक दिन पहले की बात है। मैंने पत्नी से कहा- कर्ज बहुत ज्यादा हो चुका है। कई लोग विदेश जाकर कमाते हैं। मैं भी जा रहा हूं, शायद किस्मत पलट जाए। मन ही मन डर भी था- कंबोडिया जाने के बाद अगर मुझे कुछ हो गया, तो मेरी पत्नी विधवा हो जाएगी, बच्चे अनाथ हो जाएंगे। खैर, दो जोड़ी कपड़े और खाने-पीने का थोड़ा सामान लेकर मैं नागपुर से कोलकाता के लिए निकल गया। कोलकाता से हम लोगों की कंबोडिया के लिए फ्लाइट थी। हम लोगो की? ‘हां, मेरे साथ और भी छह लोग थे। सभी किडनी बेचने जा रहे थे। जब एयरपोर्ट पहुंचे, तो साहूकारों ने साफ कह दिया- अगर यहां से कोई वापस जाना चाहता है, तो पहले 5 लाख रुपए जमा करे। वरना कोई किसी से कोई बात नहीं करेगा और अपने बारे में किसी को कुछ नहीं बताएगा। 26 सितंबर की रात 8 बजे हम लोगों की कोलकाता से बैंकॉक के लिए फ्लाइट थी। उससे पहले साहूकारों ने कोलकाता की ही एक लैब में हमारी मेडिकल जांच करवाई, ताकि यह पता कर सकें कि जिन्हें लेकर जा रहे हैं, उनकी किडनियां ठीक हैं या नहीं- उन्हें बेचा जा सकता है या नहीं। इस तरह बैंकॉक के रास्ते 27 सितंबर की सुबह करीब 10 बजे हम कंबोडिया पहुंच गए। वहां से हमें एक हॉस्पिटल ले जाया गया, जिसे लोग मिलिट्री हॉस्पिटल कहते थे। वहां दो कमरों में हम छह लोगों को बंधक बनाकर रखा गया। न कोई फोन कॉल कर सकते थे, न किसी से बातचीत। साथ आए लड़कों में कोई महाराष्ट्र का था, कोई दूसरे शहर का। कुछ राजस्थान के थे और कुछ बांग्लादेश के। वहां हर दिन सभी रोते-बिलखते रहते थे। कहते थे- हमें किडनी नहीं बेचनी है। इसी तरह लगभग दो हफ्ते बीत गए। 14 अक्टूबर की सुबह एक डॉक्टर आया और बोला- आज तुम लोगों का ऑपरेशन होगा। दोपहर करीब 2 बजे वह मुझे ऑपरेशन थिएटर में लेकर गया। एक इंजेक्शन लगाने के कुछ देर बाद मैं बेहोश हो गया। रात करीब 10 बजे होश आया, तो देखा- मेरे हाथ-पैर में कई मशीनें लगी हुई थीं।’ पेट पर गहरा चीरा था। मैं दर्द के मारे कराह रहा था। उस वक्त लगा कि इससे अच्छा तो मर ही गया होता। पूरी रात जागता रहा, नींद नहीं आई। तीसरे दिन जब पत्नी के खाते में 8 लाख रुपए पहुंचे, तब उसने मुझे फोन किया। वह चौंकते हुए बोली- अकाउंट में 8 लाख रुपए आए हैं। इतने पैसे कहां से आए? मैं रोते हुए बोला- हां, एक किडनी बेच दी है। 26 अक्टूबर को साहूकारों ने कंबोडिया से विशाखापट्नम की फ्लाइट से मुझे वापस घर भेज दिया। घर पहुंचा, तो मेरी पत्नी कलेजा पीटकर रोने लगी। मैं रात-रात भर करवट नहीं बदल पाता था। जिधर से किडनी निकाली गई थी, उस तरफ करवट लेते ही तेज दर्द होने लगता था। कुछ महीनों तक मैं बाथरूम में चुपके से नहाता रहा, ताकि पेट का चीरा कोई देख न ले। उस समय तक किडनी निकालने की बात सिर्फ मेरी पत्नी को ही पता थी। ठंड बढ़ने लगी, तो मैं आंगन में धूप में जाकर नहाने लगा। तभी सबको पता चल गया कि मेरे पेट पर चीरा लगा है। किडनी बेचने के बाद भी करीब 40 लाख रुपए का कर्ज बचा था। साहूकार अब भी हर रोज मेरे घर पैसे मांगने आते थे। 15 दिसंबर की बात है। शाम का वक्त था। अचानक कमरे से जोर की आवाज आई। भागकर देखा, तो पत्नी जमीन पर गिरी पड़ी थी। उसकी गर्दन में रस्सी बंधी थी। वह फूट-फूटकर रो रही थी। कह रही थी- अब जीने का कोई फायदा नहीं। वह फांसी के फंदे से लटकने जा रही थी, लेकिन अलमारी से टकराने के कारण रस्सी टूट गई और वह नीचे गिर गई। नहीं तो उस दिन सब खत्म हो जाता। तब मैंने कहा था- कल शहर जाकर एसपी के सामने पूरी रिपोर्ट दर्ज कराऊंगा। अगले दिन मैंने साहूकारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। अब सभी साहूकार जेल में हैं।’ कहते-कहते रोशन अपना माथा रगड़ने लगते हैं। खीझते हुए कहते हैं, ‘अभी भी 30–40 लाख रुपए का कर्ज है। कैसे जिंदगी कटेगी, यही सोच-सोचकर नींद नहीं आती।’
ब्लैकबोर्ड-साहूकारों ने कंबोडिया ले जाकर किडनी बेच दी:1 लाख का कर्ज 74 लाख हुआ, घाव देख बच्चे पूछते हैं- पापा ने किडनी क्यों बेची
📅 Published: January 22, 2026 |
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