3 फरवरी को ऑनलाइन डिलीवरी एप्स और प्लेटफॉर्म से जुड़े गिग वर्कर्स ने दिल्ली में हड़ताल की। इसमें शामिल अर्बन कंपनी की वर्कर नेहा (बदला हुआ नाम) 7-8 सालों से गुरुग्राम में काम कर रही हैं। वे कहती हैं, ‘12-13 घंटे काम करने के बाद 20-25 हजार रुपए बचते हैं। कंपनी 250 करोड़ का टर्नओवर कर रही है, लेकिन हम लोगों को नोचा जा रहा है।‘ वहीं अर्बन कंपनी के लिए काम करने वाली भावना कहती हैं कि हमें ऑर्डर कैंसिल करने की भी परमिशन नहीं। हम इंसान हैं, रोबोट नहीं। सिर्फ नेहा और भावना ही नहीं तकरीबन सभी गिग वर्कर्स की यही शिकायतें हैं। उनका कहना है कि हमारे लिए न कंपनी सोच रही न सरकार। किसी को हमारी तकलीफ न दिखाई देती है न सुनाई। वर्कर्स अपनी मांगें लेकर PM मोदी और अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्रियों को मेमोरेंडम भी दे चुके हैं। इसमें गिग और प्लेटफॉर्म से जुड़े काम के रेगुलेशन के लिए कानून बनाने की मांग की गई है। सरकार ने 1 फरवरी को पेश बजट से पहले आए इकोनॉमिक सर्वे में माना कि ज्यादातर गिग वर्कर्स 15 हजार रुपए से भी कम कमा रहे हैं। इनके लिए पॉलिसी बननी चाहिए लेकिन बजट में कोई घोषणा नहीं हुई। हमने दिल्ली और दूसरे शहरों में कुछ गिग वर्कर्स से बात कर उनकी मुश्किलें समझने की कोशिश की। संडे भी काम का प्रेशर, एक्सीडेंट होने पर भी छुट्टी नहीं
दिल्ली में प्रदर्शन में शामिल गिग वर्कर नेहा कहती हैं, ‘कंपनी अपने हिसाब से काम का दबाव बनाती है। हम पर शनिवार-रविवार को भी लगातार काम करने का दबाव बनाया जाता है। ऑटो असाइंड (जिसमें वर्कर की सहमति नहीं हो) बुकिंग मिलती है।‘ ‘हम जिस परिवार के लिए काम करते हैं, उन्हीं के लिए समय नहीं मिल पाता। अगर हमारा एक्सीडेंट हो गया तो हमें AI से चैट करनी पड़ेगी। इसके बावजूद जरूरी नहीं है कि समाधान हो जाए।’ नेहा आगे कहती हैं, ’कंपनी सिर्फ अपना मुनाफा कमा रही है। हमें एक लाख रुपए का इंश्योरेंस देने के लिए भी शर्तें रखती हैं कि हफ्ते के 70-80 घंटे शनिवार-रविवार को पूरे करने होंगे। कोई ऑर्डर कैंसिल नहीं होना चाहिए। कंपनी कहती है कि 4 बजे से 8 बजे तक काम करना कम्पलसरी होगा। अगर 8 बजे बुकिंग आएगी और एक-दो घंटे का काम होगा तो हम 11 बजे घर जाएंगे?’ प्रदर्शन में आईं गिग वर्कर भावना (बदला हुआ नाम) 6 सालों से अर्बन कंपनी के लिए काम कर रही हैं। वे कहती हैं, ‘वर्कर्स को ऑर्डर कैंसिल करने की परमिशन होनी चाहिए क्योंकि वे इंसान हैं रोबोट नहीं। उन्हें भी दिक्कत हो सकती है। कंपनी हर बात पर आईडी ब्लॉक करने की धमकी देती है।’ ’अगर आपने एक बुकिंग कैंसिल की तो पेनाल्टी दो ऑर्डर में लगेगी। अगर चार बार ऑर्डर कैंसिल किया तो हमारी आईडी परमानेंट ब्लॉक कर दी जाती है। बात करने का भी मौका नहीं मिलता। पहले कंपनी बुकिंग पर सिर्फ 10% तक कमीशन लेती थी लेकिन अब 30% तक काटने लगी है। हमें इंश्योरेंस तक नहीं मिलता।’ ’शनिवार-रविवार को काम करना कम्पलसरी कर दिया है, उसमें छुट्टी का कोई ऑप्शन नहीं है। एक बार सर्विस के दौरान ही एक्सीडेंट हो गया। पैर से खून निकल रहा था। कंपनी को बताया तो उधर से कहा गया कि क्लाइंट को कनेक्ट करके पूछता हूं। क्लाइंट ने कहा कि आपको थोड़ी सी चोट लगी है, आ जाओ। काम पूरा कर लो, फिर पट्टी करवा लेना। ऐसे मामलों में भी अगर हम ऑर्डर कैंसिल करते हैं तो पेनाल्टी लगती है।’ 12 घंटे काम, इंसेंटिव भी कम, टीशर्ट-बैग भी खुद खरीद रहे
जोमैटो के लिए डिलिवरी का काम करने वाले मोहम्मद शादाब (बदला हुआ नाम) बताते हैं कि लॉकडाउन में नौकरी छूटने की वजह से मजबूरी में ये काम करना पड़ रहा है। वे इस वर्किंग मॉडल की दिक्कतें गिनाते हुए कहते हैं, ‘कंपनी कौन सा मैप इस्तेमाल करके बताती है, हमें नहीं पता। वो बताती है कि आप पिकअप लोकेशन से 2 मिनट दूर हैं, जबकि गूगल मैप पर 7-8 मिनट दिखाता है। जब ऐसा होता है तो ये हमारे ऊपर आता है। कंपनी सिर्फ परेशान करती है।‘ ‘इंसेंटिव पहले से काफी कम हो गया है। जैकेट से लेकर टीशर्ट-बैग तक खुद खरीदना पड़ता है। अगर हम देरी से डिलीवरी करते हैं, तो कंपनी रेटिंग गिरा देती है। जबकि ये जाम के कारण होता है, कई बार हमें गलियों में घूम कर जाना पड़ता है।‘ सुबह 9 बजे से रात के 10-11 बजे तक काम करता हूं। तब जाकर 700-800 रुपए का काम होता है। उसमें भी 250-300 का पेट्रोल खर्च हो जाता है। शादाब कहते हैं कि वर्कर्स को सही रेट मिलना चाहिए, एक फिक्स रेट हो। बेरोजगारी के कारण ही लोग ऐसी कंपनियों में काम कर रहे हैं, नहीं तो ये काम कोई नहीं करना चाहता। कोई व्यक्ति जोमैटो, स्विगी में काम करके खुश नहीं है। कोलकाता में अर्बन कंपनी के जरिए सफाई का काम करने वाले महेश (बदला हुआ नाम) बताते हैं कि पिछले कुछ समय से कंपनी जबरदस्ती आईडी ब्लॉक कर रही है। वे बताते हैं, ‘हम अगर कुछ बोलने जाते हैं, तो धमकी मिलती है कि हमारी आईडी स्थायी रूप से ब्लॉक कर दी जाएगी। हमने 27 जनवरी और 3 फरवरी को कंपनी के खिलाफ प्रदर्शन किया। हम चाहते हैं कि सरकार सख्त कानून लाए, जिससे कंपनियों की मनमानी रुके।‘ सरकार ने सर्वे में माना कि पॉलिसी बनना जरूरी
केंद्र सरकार ने हाल में जारी इकनॉमिक सर्वे में बताया कि 2025 में देश में गिग वर्कर्स की संख्या बढ़कर 1.20 करोड़ हो गई है। ये देश की कुल वर्क फोर्स का 2% से ज्यादा है। सर्वे में सरकार ने माना है कि गिग इकोनॉमी को मजबूत बनाने के लिए पॉलिसी जरूरी है। ताकि ये प्लेटफॉर्म्स पारदर्शी हो और एल्गोरिदम के आधार पर भेदभाव ना हो। सर्वे में कहा गया है कि 40% गिग वर्कर्स महीने में 15,000 रुपए से कम कमाते हैं। ऐसे में परेशानी सुलझाने के लिए वेटिंग टाइम का मुआवजा, प्रति घंटे के हिसाब से न्यूनतम मजदूरी जैसे सुझाव दिए गए हैं। पिछले महीने सेंट्रल लेबर मिनिस्ट्री ने इन प्लेटफॉर्म कंपनियों से ’10 मिनट डिलिवरी’ का प्रचार या ब्रांडिंग बंद करने का आदेश दिया था। ये फैसला गिग वर्कर्स की हड़ताल के बाद लिया गया था। इसके बाद कंपनियों ने ये एड या टैगलाइन हटा दी। हालांकि सरकार ने इसे लेकर कोई ऑफिशियल बयान जारी नहीं किया था। गिग वर्कर्स की मांगों और प्रदर्शन को लेकर हमने केंद्रीय श्रम मंत्रालय और ऑनलाइन कंपनियों से जवाब मांगा। हालांकि स्टोरी लिखे जाने तक उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला। आगे मिलने पर उनका पक्ष रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा। वर्कर्स के संगठन बोले..
कंपनियां मुनाफा कमा रहीं, गिग वर्कर्स खाली हाथ
गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन (GIPSWU) के राष्ट्रीय संयोजक निर्मल गोराना अग्नि आरोप लगाते हैं कि सरकार ने इन कंपनियों को खुली छूट दे रखी है। इसी छूट की वजह से कंपनियां मनमानी कर रही हैं। निर्मल कहते हैं, ‘अगर सरकार चाहे तो दो मिनट के अंदर कंपनियों से सवाल कर सकती है। जब तक सरकार बोलेगी नहीं तब तक कुछ नहीं हो सकता। कब तक अलग-अलग राज्य इस पर नियम बनाते रहेंगे। एक केंद्रीय कानून बनना चाहिए ताकि सबको सुरक्षा मिल जाए।‘ वर्कर्स की मांगों को लेकर निर्मल कहते हैं, ‘10 मिनट में डिलीवरी खत्म करने को लेकर कोई ऑफिशियल लेटर जारी नहीं हुआ। कानून के साथ इन सभी को वर्कर्स का दर्जा मिले। पार्टनर के नाम पर इन्हें धोखा दिया जा रहा है। कंपनियों को मुनाफे का बड़ा हिस्सा मिल रहा है, जो लोग काम कर रहे हैं उन्हें कुछ नहीं मिल रहा है। इस वर्किंग मॉडल में बदलाव की तत्काल जरूरत है।’ ‘गिग वर्कर्स से जबरदस्ती काम कराया जा रहा है। एक ऑर्डर कैंसिल करने पर उनके पूरे काम का कोई मतलब नहीं रह जाता, रेटिंग खराब हो जाती है। इन्हें सही सैलरी और सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए।‘ गिग वर्कर्स के साथ स्कैम हो रहा, सरकार देखे
GIPSWU की अध्यक्ष सीमा सिंह पहले अर्बन कंपनी की वर्कर थीं। वो कहती हैं कि कंपनी में रहते हुए उन्होंने खुद शोषण का सामना किया। जब इसके खिलाफ आवाज उठाई तो कंपनी ने पुलिस कार्रवाई की धमकी दी। उनकी आईडी ब्लॉक कर दी गई थी। उसके बाद ही उन्होंने इन गिग वर्कर्स के लिए काम करना शुरू किया। सीमा कहती हैं, ‘हम अब भी वही मांग कर रहे हैं कि सरकार एक कानून लेकर आए। उनकी जो असल मजदूरी है, उन्हें वो मिले। एकतरफा तरीके से आईडी ब्लॉक करने पर रोक होनी चाहिए। 13-14 घंटे काम करने पर भी उन्हें कुछ नहीं मिल रहा है। गिग वर्कर्स के साथ ये बहुत बड़ा स्कैम हो रहा है. सरकार को इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए।‘ महिला वर्कर्स की चुनौतियों पर सीमा कहती हैं, ‘कई बार ऐसा होता है कि लड़कियों के साथ मारपीट होती है। उनके साथ रेप और छेड़छाड़ की घटनाएं आई हैं लेकिन कंपनियां इन मामलों को दबा देती हैं। कोई ऐसा प्लेटफॉर्म नहीं हैं जहां वो अपनी आवाज उठा सकती हैं। ज्यादातर लड़कियां 15 हजार रुपए कमा रही हैं लेकिन कंपनी इन्हीं की मेहनत के दम पर अरबों-खरबों का कारोबार कर रही है।‘ एक्सपर्ट: जब कंपनी वर्कर मानेगी हालात तब सुधरेंगे
सोशल एक्टिविस्ट और मजदूर किसान शक्ति संगठन के संस्थापक निखिल डे कहते हैं, ‘इन वर्कर्स को अधिकार तभी मिलेंगे, जब उन्हें ‘वर्कर’ माना जाएगा। भारत में पूरा असंगठित क्षेत्र ही इसी तरीके से बना हुआ है। वे माइक्रो कॉन्ट्रैक्ट, अस्थायी कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे हैं। यूरोपीय यूनियन समेत कई देशों में गिग वर्कर्स के लिए वहां के सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि संस्थान और कर्मचारी का संबंध बनाना चाहिए। यहां कंपनियां अपना डेटा नहीं शेयर करना चाहती है, जबकि सारा डेटा वर्कर्स का ही है।‘ डिलीवरी वर्कर्स को कर्मचारी ना माने जाने पर निखिल कहते हैं, ‘मौजूदा मॉडल को फिलहाल तीन चीजों से सुधारा जा सकता है। पहला, उनकी न्यूनतम मजदूरी तय की जानी चाहिए। दूसरा, उन्हें सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए। तीसरा, काम के दौरान मिलने वाली सुरक्षा।‘ ‘महाराष्ट्र में 60 साल पहले बोरी ढोने वाले मजदूरों (उन्हें हमाल कहा जाता है) के लिए वहां के हमाल यूनियन ने फॉर्मूला निकाला कि हर बोरी पर ये तीन चीजें सुरक्षित हों। इसके तहत एक बोर्ड गठित करके सारे दुकानदारों/व्यापारियों को रजिस्टर कराया गया और मजदूरों की हर बोरी पर लेवी देने का फॉर्मूला लाया गया। जो मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिए इस्तेमाल होता था। इसी तरीके का काम अभी गिग इकोनॉमी में हो सकता है।‘ निखिल आगे कहते हैं कि डेटा से ही पारदर्शिता आ सकती है। अगर कर्मचारी नहीं भी बनाएं लेकिन हर ट्रांजैक्शन पर संस्थान-कर्मचारी का संबंध बना लें और जिम्मेदारी बांध दें तो इस समस्या का हल हो सकता है। केंद्र सरकार को ये करना चाहिए कि पूरे देश में एक मिनिमम स्टैंडर्ड बनाए ताकि शोषण रुक सके।
…………………. ये खबर भी पढ़ें… 10 मिनट में डिलीवरी का प्रेशर, कमाई सिर्फ 700 रुपए ‘ये मेरा आज का 28वां ऑर्डर है। लिफ्ट से कस्टमर को ऑर्डर देने जा रहा हूं। देखो भाई, यहां के 15 रुपए मिले। मेरे 15 घंटे होने वाले है और अब तक 762 रुपए की कमाई हुई है। ब्लिंकिट बहुत कम पैसे दे रहा है। मैं घर जा रहा हूं, अब काम नहीं करना है।’ ब्लिंकिट के डिलीवरी पार्टनर हिमांशु थपलियाल ने 29 सितंबर को ये वीडियो बनाया और इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर दिया। पढ़िए पूरी खबर…
न बजट में कुछ-न कंपनियों ने सुनी; क्या हम रोबोट:गिग वर्कर्स बोले- एक्सीडेंट हो तो भी 12-13 घंटे काम करो; सरकार अंधी-बहरी हुई
📅 Published: February 6, 2026 |
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