जमात के पहले हिंदू कैंडिडेट बोले- शरिया नहीं लाएंगे:रैली में महिलाओं को पर्दे के पीछे बैठाया, कैश बांटते कैमरे में कैद

📅 Published: February 9, 2026 | 📂 Category: Uncategorized

बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद 12 फरवरी को आम चुनाव हैं। छात्र आंदोलन के बाद सत्ता से बेदखल हुई शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग चुनाव का हिस्सा नहीं है। वहीं 2014 और 2024 के चुनाव में शामिल नहीं हुई बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी पार्टियां जोरशोर से चुनाव लड़ रही हैं। बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद से ही माहौल हिंदुओं के खिलाफ है। जबकि शरिया कानून की वकालत करने वाली जमात की छवि हमेशा कट्टरपंथी पार्टी की रही है। हालांकि इस बार जमात ने पहली बार चुनाव में हिंदू कैंडिडेट उतारा है। ऐसे में जमात के लिए चुनाव में हिंदुओं की सुरक्षा कितना बड़ा मुद्दा है, ये समझने के लिए दैनिक भास्कर की टीम पार्टी की चुनावी रैली में पहुंची। हम खुलना जिले की उसी दाकोप सीट पर पहुंचे, जहां से पार्टी के पहले और अकेले हिंदू कैंडिडेट कृष्णा नंदी चुनाव लड़ रहे हैं। वे दावा करते हैं कि जमात बांग्लादेश में शरिया नहीं लाएगी। हालांकि उनकी रैली में महिलाएं पर्दे के पीछे बैठी दिखीं। नंदी रैली में वोटरों को खुलेआम कैश बांटते कैमरे में भी कैद हो गए। ये सब रिपोर्ट करने के दौरान न सिर्फ हमें डराया धमकाया गया बल्कि वीडियो डिलीट करने का भी दवाब बनाया गया। जमात की रैली में और क्या हुआ, पार्टी के पहले हिंदू कैंडिडेट क्या दावे कर रहे और रैली में आए समर्थकों का क्या कहना है। पढ़िए इस रिपोर्ट में… जमात की रैली में महिलाओं को पर्दे के पीछे बैठाया
भारत के बॉर्डर पर पड़ने वाले खुलना जिले के दाकोप में 55% हिंदू आबादी है। ये इलाका गंगा के डेल्टा और सुंदरबन के पास है। इस छोटे-छोटे टापुओं वाले इलाके तक पहुंचने के लिए हमें नदी पार करनी थी। लिहाजा पहले हमने फेरी के जरिए नदी पार की। फिर कुछ दूर पैदल चले और यहां से बाइक पर सवार होकर उबड़-खाबड़ रास्ते से होते हुए दाकोप पहुंचे। यहां 1 फरवरी को जमात कैंडिडेट कृष्णा नंदी की चुनावी रैली थी। कृष्णा पेशे से व्यापारी हैं और इलाके में उनका दबदबा है। जब हम रैली में पहुंचे तो गांव में धार्मिक नारों के साथ यात्रा निकाली जा रही थी। वैसे दाकोप हिंदू बहुल इलाका है, लेकिन रैली में ज्यादातर मुस्लिम ही दिखे। इस रैली में सबसे चौंकाने वाली बात ये थी कि महिलाओं को मंच के किनारे पर्दा लगाकर बैठाया गया था। ताकि पुरुष और महिलाओं को अलग-अलग रखा जा सके। रैली में ज्यादातर मुस्लिम महिलाएं ही पहुंचीं। जमात शरिया नहीं लाएगा, सबको साथ लेकर चलेंगे
दाकोप से कैंडिडेट कृष्णा नंदी से बात करके हमने समझने की कोशिश की कि आखिर हिंदू कम्युनिटी से होते हुए भी वो इस्लामिक कट्टरपंथी पार्टी से चुनाव क्यों लड़ रहे हैं? इसके जवाब में नंदी कहते हैं, ‘मैं जमात की विचारधारा से सहमत हूं। ये ईमानदारी, सच्चाई और न्याय के लिए लड़ने वाली पार्टी है। इसलिए मैं जमात से जुड़ा।‘ वे आगे कहते हैं, ‘दाकोप, हिंदू आबादी वाला इलाका है। मैं यहां सभी लोगों के लिए काम करना चाहता हूं। मैंने लोगों से वादा किया है कि हिंदुओं को बराबरी का सम्मान दिया जाएगा। हमारे यहां सभी धर्म के लोग मिलकर रहते हैं। यहां लोग जबरन वसूली और प्रोटेक्शन मनी की धमकियों से आजादी चाहते हैं। मैंने वादा किया है कि मैं इसके खिलाफ लड़ाई लड़ूंगा।’ क्या जमात इस्लामिक कानून लाना चाहता है? नंदी कहते हैं, ‘नहीं, जमात शरिया नहीं लाएगा। हम सभी को साथ लेकर चलेंगे।’ फिर आपकी रैली में महिलाओं को अलग क्यों बैठाया गया है। हमने पहले किसी रैली में ऐसा नहीं देखा। आप खुद हिंदू होकर ये कैसे स्वीकार कर रहे हैं? इस पर नंदी कहते हैं, ‘जमात के राज में महिलाएं सम्मान और गरिमा के साथ रहेंगी। ऐसा नहीं है कि महिला-पुरुष रैली में साथ शरीक नहीं हो सकते। हम मिलकर महिलाओं को सुऱक्षा देंगे। हमने महिलाओं के बैठने के लिए अलग सेक्शन भी बनाया है।’ हमारा भी यही सवाल है कि अलग बैठाने की क्या जरूरत है, क्या महिलाएं साथ नहीं बैठ सकतीं? ‘हमें यहां के समाज के हिसाब से व्यवस्था करनी होती है।’ ये कहकर नंदी बात टालने लगे। वो कहते हैं कि अगर जमात की सरकार बनी तो भारत से बेहतर संबंध बनाने में अहम भूमिका निभाएंगे। जमात कैंडिडेट ने प्रचार के दौरान बांटा कैश
हमारी बातचीत के मुश्किल से 10 मिनट बाद ही ईमानदारी के दावे कर रहे जमात कैंडिडेट कृष्णा नंदी एक वोटर को कैश बांटते हमारे कैमरे में कैद हो गए। दरअसल पार्टी के लोगों ने कृष्णा नंदी को घेर रखा था और हम कुछ दूरी से उनका वीडियो शूट कर रहे थे। इसी बीच एक महिला आई और उसने नंदी को एक फोटो दिखाई। नंदी ने नोट निकाले और करीब एक हजार टका महिला को थमा दिए। कैमरा देखते ही जमात समर्थक घबरा गए। उन्होंने कैंडिडेट कृष्णा नंदी को इशारा किया कि कैमरे में सब कुछ शूट हो रहा है। नंदी को जब इन सबका आभास हुआ तो वो भी अलर्ट हो गए। इसके बाद जमात समर्थकों ने हमें घेरने की कोशिश शुरू कर दी। एक ने हमें धमकाने के लहजे में पूछा- भारत से हो क्या? अपना नंबर दो ? हम पर वीडियो डिलीट करने का भी दबाव बनाया गया। कैश लेने वाली महिला बोली- जमात के साथ हम ज्यादा सेफ
इन सबके बीच हमने उस महिला को तलाशा, जिसे कृष्णा नंदी कैश बांट रहे थे। महिला का नाम माधवी महालदार है। जमात के बारे में पूछने पर वे कहती हैं, ‘मुझे लगता है कि यहां महिलाएं, पुरुषों से ज्यादा सुरक्षित हैं। हम जमात के साथ सेफ महसूस करते हैं। हम बिना किसी परेशानी के जीना चाहते हैं इसलिए मुझे लगता है कि जमात ही शांति से देश चलाएगी।’ जमात की रैली में पहुंची सुष्मिता मंडल कहती हैं, ‘हमें यहां कोई दिक्कत नहीं है। जमात के लोगों का जिस तरह का बात, व्यवहार है, वो अच्छा है। मैं एक अच्छे देश का सपना देखती हूं। मुझे जमात पर पूरा यकीन है।’ हमने हिंदू कैंडिडेट उतारा, ताकि वो कम्युनिटी की तकलीफें समझे
इस रैली में दाकोप के ही एक किसान जीएम नईम पहुंचे। वे जमात के कट्टर समर्थक हैं। नईम कहते हैं, ‘जमात सांप्रदायिक सौहार्द्र के आधार पर देश को फिर से बनाने की कोशिश कर रहा है। ये इस बात से पता चलता है कि हमने यहां से चुनाव में हिंदू कैंडिडेट उतारा है। मेरा मानना है कि हमारे हिंदू बहुल इलाके के मुद्दे, हिंदू उम्मीदवार बेहतर तरीके से संसद में उठा सकता है।’ हमने नईम से पूछा कि फिर महिलाओं को अलग बैठने की व्यवस्था क्यों गई है? वे कहते हैं, ‘हम महिलाओं की सुरक्षा चाहते हैं इसीलिए उन्हें बैठने के लिए बेहतर इंतजाम किए गए हैं। अभी हमारे देश में ऐसे हालात नहीं हैं कि पुरुष और महिलाएं हर जगह एक साथ बैठ सकें।’ हमने कट्टरपंथ का रास्ता छोड़ा, हम महिलाओं के समर्थक
जमात की रैली में पहुंचे चलना म्युनिसिपल कमेटी के प्रेसिडेंट नजरूल इस्लाम कहते हैं, ‘जमात धर्म के आधार पर बनी पार्टी है लेकिन हमारा मानना है कि हम हर धर्म के लोग मिल जुलकर रह सकते हैं। हमने कट्टरपंथ का रास्ता छोड़ दिया है। इसका प्रूफ यही है कि हमने इस सीट से हिंदू कैंडिडेट को टिकट दिया है। हमारे साथ हर तरह के लोग हैं। हम कतई कट्टरपंथी नहीं है।‘ नजरूल महिलाओं को अलग बैठाने के सवाल पर कहते हैं, ‘महिलाओं को राजनीति करने के लिए जमात कोई रोक-टोक नहीं करती।’ हालांकि रैली की कवरेज के दौरान हम जमात के निशाने पर आ गए। पार्टी कैंडिडेट कृष्णा नंदी के सिक्योरिटी अफसर ने कवरेज को लेकर हमारे कैमरा सहयोगी को बुलाया और अकेले कमरे में बात की। उससे कहा गया कि तुम्हारे साथ जो भारतीय आया है, साहब ने उसका पासपोर्ट और वीजा मंगवाया है, भेज दो। हम समझ गए थे, अब इस रिवर आईलैंड पर रुकना सेफ नहीं। हम तुरंत रैली से निकले और बोट लेकर लौटने लगे। हम वहां से निकल तो आए लेकिन रास्ते भर अलग-अलग अफसरों के फोन आते रहे। एक पुलिस अधिकारी ने हमसे फोन कर पूछा कि बांग्लादेश कब आए, कहां से आए और कब लौटोगे? फिर एक और अधिकारी का फोन आया, उसने खुद को आर्मी इंटेलिजेंस का अफसर बताया। उसने भी हमसे कई तरह के सवाल किए। करीब 1 घंटे तक हमें लगातार कॉल पर कॉल आते रहे।
स्टोरी में सहयोग: बांग्लादेश से अरिफुल शब्बीर इस्लाम
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