संडे जज्बात-मेरे बेटे की लाश कुत्ते नोंचकर खा गए:इतना बदनसीब था कि बच्चे की लाश तक न मिली, अब लावारिस लाशों का संस्कार करता हूं

📅 Published: February 15, 2026 | 📂 Category: Uncategorized

उत्तरप्रदेश के शहर फैजाबाद का रहने वाला मैं मोहम्मद शरीफ। बीते 25 सालों में मैंने 23 हजार से ज्यादा लावारिस और कटी-फटी लाशों का अंतिम संस्कार किया है। मुझे आज भी याद है वो दिन जब बड़ा बेटा रईस काम पर जाने के लिए घर से निकला था। उसकी अम्मी जिद करने लगी कि बिना खाना खाए घर से नहीं जाएगा।अम्मी का मन रखने के लिए उसके ही हाथ से दो निवाले खाकर निकला था। तब हमें क्या पता था कि आखिरी बार उसको देख रहे हैं। हम तो इतने बदनसीब थे कि अपने बच्चे की लाश भी नहीं देख पाए। रईस होमियोपैथी दवाओं का एमआर था। उसे पढ़ने का बहुत शौक था। सात बच्चों में सबसे बड़ा वही था। उसकी कमाई से ही घर चलता था। मैं तो साइकिल मैकेनिक था। घर की सारी जिम्मेदारी वही उठाता था। उस रोज जब शाम तक वो नहीं लौटा तो हमने उसकी दुकान पर पता किया। दुकान खुली थी, लेकिन रईस वहां पहुंचा ही नहीं था। वहां काम करने वाले लड़के को भी कुछ नहीं पता था। हम वापस घर आ गए। सारी रात इंतजार करते रहे। सुबह हम उस साइकिल स्टैंड पर गए ,जहां रईस अपनी साइकिल खड़ी करता था। साइकिल स्टैंड वाले ने बताया कि मेरे पास कल सुबह साइकिल खड़ी करके गए थे। जाते हुए कह गया था कि सुल्तानपुर जा रहा हूं, शाम तक आऊंगा। हमने सुल्तानपुर में भी पता करवाया लेकिन कुछ पता नहीं चला। कई दिन बीत गए, रईस का कुछ पता नहीं चला। हम उसकी तस्वीर लेकर मारे-मारे घूम रहे थे। घर में न खाना बनता था, न ही कोई खाता था। हमने बड़े शहरों में भी उसे तलाशा। जब कोई सुराग नहीं मिला तो थककर घर बैठ गए। रिश्तेदारों और पड़ोसियों से पैसे मांगकर घर का खर्च चला रहे थे। लगभग डेढ़ महीने के बाद लोकल थाने से दो पुलिस वाले आए। उनके हाथ में एक थैला था। मुझे देखते ही उन्होंने थैले से एक मुड़ी हुई कमीज निकाल कर दी। वह कमीज मेरे बेटे की थी, मेरे रईस की। पुलिस वालों ने बताया कि महीने भर पहले सुल्तानपुर में आपके बेटे की हत्या हुई है। उसकी लाश कई दिन तक सड़क किनारे पड़ी थी। कुत्ते उसकी लाश को नोंच-नोंचकर खा गए थे। हमने इसका पता ढूंढने की बहुत कोशिश की। कई दिनों तक इसके बारे में कुछ पता नहीं चला तो उसकी लाश नदी में फेंक दी। पुलिस उसकी शर्ट पर लगे टेलर के टैग के जरिए डेढ़ महीने बाद हम लोगों तक पहुंच पाई थी। पुलिस वाले एक महीने से ये शर्ट लिए आसपास के इलाकों के दर्जियों के पास भटक रहे थे। आखिर वो लोग शेख टेलर के पास पहुंचे, जिसने रईस की शर्ट सिली थी। उसी ने शर्ट पहचान कर पुलिस को हमारे घर भेजा। ये सुनते ही हम लोगों के पैरों तले जमीन खिसक गई। रईस की अम्मी रो-रोकर बेहोश हो जाती थी। कई दिनों तक घर में चूल्हा नहीं जला। घर में किसी को कुछ होश नहीं था। घर के खर्च से लेकर छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई तक सबकुछ रईस देखता था। हमें सारी उम्मीदें उसी से थीं। एक झटके में हमारा सब उजड़ गया। मैं तो 15 दिन तक घर में रह ही नहीं पाया। जैसे ही घर आता उसकी याद आने लगती। ये सोच-सोचकर परेशान हो जाता कि मेरे बेटे की लाश इस तरह फेंक दी गई। लगभग पांच-छह महीने के बाद मैंने फैसला किया कि जैसा मेरे बेटे की लाश के साथ हुआ, वो किसी के साथ नहीं होगा। अब फैजाबाद में किसी की लाश फेंकी नहीं जाएगी। मैं उनके धर्म को अनुसार अंतिम संस्कार करुंगा। इसके लिए मैं एसडीएम साहब से मिला। उन्हें लिखित में दिया कि लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार अब मैं करुंगा। उसके बाद मुझे पुलिस स्टेशन से फोन आने लगे। जिस लाश का 72 घंटे तक कोई दावेदार नहीं होता है उन लाशों को मुझे सौंप दिया जाता है। ये लाशें या तो सड़क दुर्घटना में मारे गए लोगों की होती या फिर जिन्हें मारकर फेंक दिया जाता उनकी। हिंदू लाशों का दाह संस्कार हिंदू रीति-रिवाज से किया जाता है और मुस्लिम लाशों का इस्लाम के अनुसार। हिंदूओं के तमाम रीति-रिवाज मैं पास खड़े होकर अपनी निगरानी में करवाता हूं। आजकल एक लाश के दाह संस्कार का खर्च लगभग दस हजार रुपये लग जाते हैं। पहले ज्यादा खर्च नहीं आता था तो खुद ही कर लेता था या फिर लोगों से चंदा मांगता था। मैंने अपनी सारी पूंजी लाशों के अंतिम संस्कार पर लगा दी। जब लोग मेरे बारे में जानने लगे, सबकुछ मीडिया में आ गया तो मुकेश अंबानी जैसे-जैसे बड़े-बड़े लोगों ने मेरा काम को सराहा। फिर धीरे-धीरे अयोध्या और फैजाबाद के बड़े बिजनेसमैन ने आगे बढ़कर मेरा साथ देना शुरू किया। हिंदू लाशों के दाह संस्कार के लिए लकड़ी का इंतजाम फैजाबाद के बड़े बिजनेसमैन और होटल के मालिक शरद करते हैं। ऐसे ही मुस्लिम कब्रों को खोदने के लिए भी बड़े लोग सामने आए। अब इस काम के लिए पैसे की दिक्कत नहीं होती। जब मैंने इस काम की शुरुआत की तो लोग मुझपर हंसते थे, चिढ़ाते थे। कहते थे कि पागल है, सड़ी-गली लाशें उठाता है। सबने मुझे दावतों और रिश्तेदारी में बुलाना बंद कर दिया गया। मुझे अपने साथ बैठने नहीं देते थे। फिर भी मैंने ये सब छोड़ा नहीं। घंटो पोस्ट मार्टम कमरे के सामने बैठकर इंतजार करता था। ये काम करके मुझे बहुत सुकून मिलता है। हर बार लावारिस लाश का अंतिम संस्कार कर के मुझे मेरा बेटा याद आ जाता है। मैं आज भी किराए के मकान में रहता हूं। लगभग 92 साल उम्र है और सेहत लगातार खराब चल रही है। रईस के जाने के बाद एक सड़क दुर्घटना में छोटे बेटे की भी मौत हो गई थी। अब सिर्फ एक बेटा बचा है उसे भी पिछले साल मुंह का कैंसर हो गया था। वह स्कूल के बच्चों की वैन चलाता है। पूरे घर परिवार की जिम्मेदारी अब उसपर है। घर का इकलौता कमाने वाला भी खुद ही बीमार है। साल 2020 में मुझे मेरे इन कामों के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया। हाल ही में मेरे स्पाइन का ऑपरेशन उत्तर प्रदेश सरकार ने करवाया है। मुझे खुशी है कि मैंने खुद से जो वादा किया था उसे निभाया। मुश्किलें आईं लेकिन रुका नहीं। कसम खाई थी कि अब लावारिस लाशें फेंकी नहीं जाएगी और मैंने उसे कायम रखा। जब बाद में लोगों को पता चलता कि उनके लोगों का अंतिम संस्कार मैंने किया है तो मुझसे मिलने आते। शुक्रिया करते हैं। आज मैं इतना बीमार हूं फिर भी काम जारी है। परसों ही एक मुस्लिम शव का संस्कार किया है , लेकिन इतने साल बाद भी ऐसी लाशें देखकर अपने बेटे का याद करके रोता हूं। (मोहम्मद शरीफ ने अपने जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए हैं) ——————— 1- संडे जज्बात-लोग भैंस, बुलडोजर आंटी कहते थे:30 की उम्र में 92 किलो वजन था- किडनी खराब होने लगी तो 100 दिन में 20 किलो घटाया मैं कानपुर की रहने वाली आभा शुक्ला हूं। भैंस, मोटी, 45 साल की आंटी, चलती-फिरती बुलडोजर, किसी के ऊपर गिर जाए, तो वो दबकर ही मर ही जाए… कभी ये सारे नाम मेरे ही थे। लोग मुझे इन्हीं नामों से बुलाते थे। मेरे असली नाम ‘आभा शुक्ला’ से नहीं। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-दोस्त की प्रेमिका प्रेग्नेंट हुई, रेप केस मुझपर चला:पंचायत ने 6 लाख में सौदा किया, 5 साल जेल में रहा, अब बाइज्जत बरी बिहार के दरभंगा जिले का रहने वाला मैं मुकेश कुशवाहा। मुझ पर 17 साल की लड़की के रेप और पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा चला। वो लड़की मेरे दोस्त की प्रेमिका थी। दोस्त ने उसे प्रेग्नेंट किया था, लेकिन मुकदमा मुझ पर चला। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें

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