वीडियो गेम्स से बच्चों को बनाया जा रहा आतंकवादी:अमेरिका में 42% मामलों में नाबालिग शामिल, यूरोप में 20 से 30% केस में 12-13 साल के बच्चे

📅 Published: February 15, 2026 | 📂 Category: Uncategorized

माइनक्राफ्ट और रॉबलॉक्स जैसे लोकप्रिय वीडियो गेम्स अब बच्चों को आतंकवादी संगठनों और नफरत फैलाने वाले समूहों में भर्ती करने का जरिया बनते जा रहे हैं। यूनाइटेड नेशंस की काउंटर-टेररिज्म कमेटी के मुताबिक, यूरोप और नॉर्थ अमेरिका में आतंकवाद से जुड़े मामलों में अब 42% आरोपी नाबालिग हैं। 2021 की तुलना में यह आंकड़ा तीन गुना बढ़ा है। नीदरलैंड्स के हेग स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर काउंटर-टेररिज्म के अनुसार, यूरोप में 20 से 30% आतंकवाद विरोधी जांचों में 12-13 साल के बच्चे शामिल हैं। संगठन के डायरेक्टर थॉमस रेनार्ड ने इसे चौंकाने वाला बताया और कहा कि ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया। यूएन के जांचकर्ताओं का कहना है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिए कट्टरपंथी संगठन तेजी से नए सदस्य बना रहे हैं। अब भर्ती की उम्र भी घटती जा रही है। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की इंटेलिजेंस एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि रॉबलॉक्स और डिस्कॉर्ड जैसे प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल बच्चों को ट्रेनिंग देने और भर्ती करने में हो रहा है। गेम्स में हिंसा और नफरत का माहौल गेम्स में ऐसे वर्चुअल वर्ल्ड बनाए जा रहे हैं, जहां खिलाड़ी आतंकी हमलों और गोलीबारी की घटनाओं को दोहरा सकते हैं। 2019 में न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में मस्जिदों पर हुए हमले को भी इन गेम्स में दोहराया गया है। ऑनलाइन ग्रूमिंग से बच्चों के दिमाग में जहर भरते हैं 2022 में ब्रिटेन में एक 15 साल की लड़की को एक टेक्सास के नियो-नाजी ने ऑनलाइन ग्रूम किया। उसने बम बनाने की गाइड डाउनलोड की और एक सिनेगॉग उड़ाने की बात कही। बाद में उसने आत्महत्या कर ली। 2020 में एस्टोनिया में 13 साल का लड़का एक नियो-नाजी ग्रुप का लीडर निकला, जो टेलीग्राम के जरिए हमलों की योजना बना रहा था। फार राइट ग्रुप्स का नया तरीका- एक्टिव क्लब्स फार राइट ग्रुप्स अब लड़कों और युवाओं को आकर्षित करने के लिए ‘एक्टिव क्लब्स’ बना रहे हैं। ये ऑल-वाइट कॉम्बैट ग्रुप्स हैं, जो नस्लीय युद्ध की तैयारी करते हैं। 27 देशों में फैले इन क्लब्स में से 25% ‘यूथ क्लब्स’ हैं, जो 15-17 साल के लड़कों को टारगेट करते हैं। विशेषज्ञों की राय पेरेंट्स ऑफ पीस संस्था से जुड़ी ऑलिजैंड्रा हर्बरहोल्ड कहती हैं कि कई बार बच्चे अकेलेपन या पहचान की तलाश में ऐसे ग्रुप्स की ओर खिंचते हैं। अगर किसी को लगता है कि उसकी गोरी त्वचा ही उसकी सबसे बड़ी पहचान है, तो वह उसी को पकड़ लेता है।

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