किडनैपिंग और पॉक्सो एक्ट के केस में आरोपी को चंडीगढ़ कोर्ट ने बरी कर दिया। बरी करने के साथ कोर्ट ने शिकायतकर्ता पीड़िता की आयु को लेकर कहा कि सिर्फ आधार कार्ड में लिखी हुई उम्र से आयु साबित नहीं होती। फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट की जज याशिका ने थाना मलोया में दर्ज किडनैपिंग और रेप के मामले में आरोपी सुराज कुमार को सभी आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सरकारी पक्ष यह साबित ही नहीं कर पाया कि लड़की नाबालिग थी। इसलिए उस पर पॉक्सो या IPC की गंभीर धाराएं लागू नहीं हो सकतीं। आरोपी सूरज की और केस की पैरवी दिपांशु राणा कर रहे थे। जानिए पूरा मामला क्या था पीड़िता की मां ने 22 अप्रैल 2023 को मलोया थाने में रिपोर्ट दी थी कि उनकी बेटी सुबह 10:30 बजे बिना बताए घर से चली गई। परिवार झुग्गियों में रहता है और 8 बच्चों में यह तीसरे नंबर की बेटी थी। शिकायत में मां ने इसे “किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा बहला-फुसलाकर ले जाने” का मामला बताया था। पुलिस ने मामले में कार्रवाई करते हुए एफआईआर दर्ज कर ली। 29 अगस्त 2023 को पीड़िता मां के साथ थाने पहुंची, जहां उसका मेडिकल, काउंसलिंग और धारा 161 और 164 CrPC के तहत बयान दर्ज किए गए। पुलिस ने जांच के बाद मामले में धारा 366, 376(2)(n) IPC और पॉक्सो की धारा 6 भी जोड़ दी। इसी आधार पर आरोपी सुराज कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया। कोर्ट में पलटी पीड़िता और मां गवाही के दौरान पीड़िता अपने पहले बयान से मुकर गई। कोर्ट में उसने साफ कहा कि वह सुराज के साथ अपनी मर्जी से बिहार गई थी और किसी ने उसका अपहरण नहीं किया। पीड़िता ने बताया कि 27 अप्रैल 2023 को दोनों ने शादी की थी और शादी से पहले उनके बीच किसी भी तरह का शारीरिक संबंध नहीं हुआ था। उसने यह भी कहा कि पुलिस द्वारा केस दर्ज किए जाने के बाद ही वे दोनों वापस आए थे। पीड़िता ने कोर्ट के सामने सुराज को अपना पति बताया और कहा कि उसके साथ कोई जबरदस्ती या गलत काम नहीं हुआ। पीड़िता की मां भी कोर्ट में बयान से मुकर गईं। उन्होंने कहा कि उनकी बेटी सुराज के साथ अपनी मर्जी से गई थी और न ही किसी तरह का अपहरण हुआ और न ही जबरदस्ती। दोनों गवाहों के बयान बदलने के बाद केस की दिशा कोर्ट में पूरी तरह प्रभावित हो गई। कोर्ट में गवाही देते हुए मां भी अपनी पुलिस शिकायत से मुकर गईं। उन्होंने कहा कि उनकी बेटी ने उन्हें फोन करके बताया था कि उसने सुराज के साथ अपनी मर्जी से शादी कर ली है। मां ने यह भी कहा कि बेटी की उम्र 19 साल है, हालांकि सही जन्मतिथि उन्हें पता नहीं है। स्कूल रिकॉर्ड भरोसे योग्य नहीं कोर्ट में सरकारी पक्ष ने स्कूल में लिखी पीड़िता की जन्मतिथि 22.11.2007 बताकर कहा कि लड़की नाबालिग है, लेकिन कोर्ट ने यह बात मानने से साफ मना कर दिया। कोर्ट ने कहा कि स्कूल ने जन्मतिथि आधार कार्ड के आधार पर दर्ज की है, न कि किसी असली जन्म प्रमाणपत्र के आधार पर। आधार कार्ड खुद भी जन्मतिथि का कानूनी प्रमाण नहीं माना जाता। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि न मां और न ही पीड़िता अपनी सही जन्मतिथि बता पाईं। सुप्रीम कोर्ट के नियम के मुताबिक, जब तक वह व्यक्ति कोर्ट में आकर गवाही न दे जिसने स्कूल में लड़की की जन्मतिथि लिखी थी या जिसने आधार कार्ड का डेटा दिया था, तब तक ऐसे कागज़ों को पक्के सबूत नहीं माना जाता। इसी वजह से कोर्ट ने कहा कि लड़की की उम्र नाबालिग होने के हिसाब से साबित नहीं हुई। मुख्य गवाह पलटे, गिर गया केस कोर्ट ने अपने आदेश में साफ लिखा कि इस मामले में 2 सबसे महत्वपूर्ण गवाह पीड़िता और उसकी मां, दोनों ही हॉस्टाइल हो गए। दोनों ने कोर्ट में कहा कि उन्होंने अपनी मर्जी से शादी की थी और शादी के बाद ही शारीरिक संबंध बने। आदेश में यह भी दर्ज है कि पीड़िता जल्द ही गर्भवती भी हो गई थी, जिससे जबरदस्ती या अपहरण की कहानी पूरी तरह कमजोर पड़ गई। कोर्ट ने माना कि मुख्य गवाहों के मुकर जाने के बाद अभियोजन के पास ऐसा कोई ठोस, स्वतंत्र और भरोसेमंद सबूत नहीं बचा, जिससे आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित किए जा सकें।
चंडीगढ़ में पॉक्सो एक्ट का आरोपी बरी:कोर्ट बोला-आधार कार्ड से साबित नहीं होती जन्मतिथि, शादी के बाद बने थे रिलेशन
📅 Published: November 21, 2025 |
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