पंजाब के अजनाला में एक कुआं है। इस कुएं की खुदाई से 282 सैनिकों के कंकाल निकले। ये कंकाल अब भी कुएं के पास एक लोहे के बक्से में बंद पड़े हैं। ये 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने वाले शहीदों के हैं। केंद्र, राज्य सरकार और ASI में से कोई भी न तो इनके अंतिम संस्कार के लिए वक्त निकाल पाए हैं, न ही इन्हें किसी म्यूजियम में रखा जा सका है। पार्ट-1 में आपने पढ़ा कि कैसे सुरेंद्र कोछड़ नाम के शख्स ने इस नरसंहार को इतिहास के पन्नों से ढूंढा और फिर कुएं की खुदाई करवाकर इसे साबित कर दिया। होना तो ये चाहिए था कि बाकी शहीदों की तरह इनकी पहचान होती, सम्मान मिलता और अंतिम संस्कार होता, लेकिन सरकारें 168 साल गुजरने के बाद भी चिट्ठियां लिखकर खानापूर्ति कर रही हैं। इन कंकालों की वैज्ञानिक जांच और DNA सैंपलिंग की भी कोशिशें हुई हैं। जांच से ये तक साबित हो रहा है कि सैनिक पूर्वी यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड के रहने वाले थे। दो से तीन परिवार भी सामने आए, लेकिन अवशेष लोहे के बक्से में कैद हैं। दैनिक भास्कर ने कंकालों की जांच करने वाले और सैनिकों के संभावित परिवार के लोगों से बात की। कनाडा से आया ईमेल, शायद कंकाल मेरे दादा का है
इन कंकालों और अवशेषों की वैज्ञानिक जांच में शामिल BHU के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे बताते हैं, ‘2023 में सर्दियों की रात थी। मैं किसी रिसर्च वर्क में बिजी था। तभी एक ईमेल आया। ये ईमेल कनाडा से किसी ने भेजा था। इसमें लिखा था कि मेरे दादा ब्रिटिश राज में सैनिक थे और 1857 के आसपास अचानक गायब हो गए थे। कभी नहीं मिले, न लौटे। अंग्रेज सरकार ने हमारे परिवार के खिलाफ वारंट भी निकाला था। हम पहले यूपी में रहते थे, फिर भागकर तमिलनाडु चले गए थे। सिर्फ हम ही नहीं, तमिलनाडु के संथूर में कई ऐसे परिवार हैं, जो 1857 में यूपी से शिफ्ट होकर आए थे।’ ज्ञानेश्वर चौबे बताते हैं, ‘पहली बार ये ईमेल पढ़कर मैं भावुक हो गया। एक नई उम्मीद दिखी कि शायद इन कंकालों की पहचान शुरू हो पाए। हमें इतना पता चल चुका था कि अजनाला के सूखे कुएं में जिन सैनिकों को दफनाया गया, वे उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, झारखंड समेत गंगा घाटी के आसपास के रहने वाले हैं। शायद उनके परिवार मिल जाएं, तो अंतिम संस्कार और सम्मान दोनों मिल सके।’ अंग्रेजों ने सैनिकों की लाशों पर चूना-कोयला डाला, फिर कुआं बंद कर दिया
सुरेंद्र कोछड़ की कोशिशों के बाद 2014 में खुदाई हुई और अवशेष सामने आए। इन कंकालों की जांच के लिए पंजाब यूनिवर्सिटी के एंथ्रोपोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. जेएस सहरावत की लीडरशिप में एक टीम बनी। इस टीम में BHU के प्रोफेसर बीरबल साहनी, प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे और द सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (CCMB) हैदराबाद के एक्सपर्ट शामिल हैं। दैनिक भास्कर ने प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे से साइंटिफिक फाइंडिंग्स पर बात की। वे बताते हैं, ‘मुझे जलियांवाला बाग हत्याकांड की जानकारी थी, लेकिन अजनाला केस कभी नहीं सुना था। अजनाला में कंकाल मिले, तो जांच की जिम्मेदारी अलग-अलग टीम को दी गई। हम लोग हैदराबाद के साथ मिलकर काम करने लगे।’ ‘कुएं की खुदाई सही तरीके से न होने से ज्यादातर सैंपल खराब हो चुके थे। कंकाल से डीएनए निकालने में इसलिए भी दिक्कत हुई क्योंकि अंग्रेजों ने सैनिकों को कुएं में डालने के बाद जानबूझकर उसमें चूना और कोयला डाल दिया था। इसके साथ मिट्टी भर दी थी। इससे हर लाश तक कोयला और चूना पहुंच गया था। ये दोनों चीजें डीएनए को खराब कर देती हैं।’ ‘हमें शुरू में 244 सैंपल मिले थे। 100 के आसपास हैदराबाद लैब भेजे गए थे। केवल 50 सैंपल से ही हम डीएनए अलग निकाल पाए। इसकी जांच आगे बढ़ती गई और रिजल्ट आने लगे। तब पता चला कि अजनाला कुएं में मरने वाले सैनिक तो गंगा घाटी के ही लोग थे। यानी हमारे वाराणसी के आसपास वाले यूपी-बिहार के ही सैनिक थे।’ दांतों की बनावट और गंगा के पानी ने कराई पहचान
प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे के मुताबिक, ‘हमें कंकालों से निकाले गए दांतों के सैंपल से रिजल्ट मिले। ये दांत काफी मजबूत थे। सैंपल की जांच से पता चला कि मरने वाले सैनिक ज्यादातर 21 से 42 साल के थे। उनकी लंबाई काफी अच्छी थी। वे दांतों का काफी ध्यान रखते थे। इसलिए दांत अच्छी हालत में मिले थे।’ ‘दांतों की जांच से ये भी पता चल जाता है कि इंसान किस इलाके का पानी पीता था। हर पानी में कार्बन और ऑक्सीजन की अलग-अलग मात्रा होती है। कंकालों से अलग-अलग डीएनए सैंपल लेकर जांच करने वाली टीम भी अलग-अलग काम कर रही थी। सभी टीम के रिजल्ट एक जैसे ही आए।’ प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे आगे बताते हैं, ‘हमें पहले ये डाउट था कि ये सैनिक पंजाब या फिर पाकिस्तान के इलाके के रहने वाले भी हो सकते हैं। एक शक ये भी था कि कहीं ये कंकाल 1947 में भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के समय हुई किसी घटना से संबंधित तो नहीं हैं। हालांकि जांच से साफ हो गया कि ये 1857 के हैं और गंगा घाटी के आसपास रहने वाले लोग थे।’ ‘हालांकि मरने वाले किसी एक राज्य के नहीं थे। हमारी पड़ताल में ये भी पता चला कि 26वीं नेटिव इन्फैंट्री बटालियन के सैनिक पूर्वी यूपी, बिहार, बंगाल और झारखंड के आसपास के थे। ये पूरा गंगा घाटी वाला इलाका ही है। इनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, मुस्लिम और दलित लोग भी थे।’ ‘न्यूक्लियर DNA जांच से तो हम सैनिकों के जिले भी बता देंगे’
कंकालों की जांच पर प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया, ‘अभी तक की जांच में सैनिकों को अपनी मां से मिले माइटोकॉन्ड्रियल DNA की मदद से जानकारियां मिली हैं। ये DNA मां से बच्चों में ट्रांसफर होता है। 168 साल पहले भी जो माइटोकॉन्ड्रियल DNA था, वही आज भी उस एरिया की महिलाओं के DNA में मौजूद है।’ कई परिवारों ने फोन-मेल किए, ब्रिटेन मदद करे तो आसानी होगी
इन शहीदों के परिवारों को ढूंढने के सवाल पर प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे बताते हैं, ‘हम परिवारों को ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं। हमें ये पता है कि ब्रिटिश हर चीज का हिसाब-किताब लिखित में रखते थे। उनके आर्काइव में इन सैनिकों के नाम जरूर होंगे, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने आज तक गृह मंत्रालय और PMO को जवाब ही नहीं दिया।’ ‘चैलेंज ये है कि ये अब से 6-7 पीढ़ी पहले की बात है। हमें खुशी है कि 2022 में रिसर्च रिपोर्ट मीडिया में सामने आने के बाद अब तक कई लोग हमसे संपर्क कर चुके हैं। इन लोगों के दादा या परदादा ब्रिटिश आर्मी में थे। एकाएक गायब हो गए।’ इन परिवारों के खिलाफ वारंट तक निकले और कुछ देश के अलग-अलग इलाकों में भाग गए थे। ऐसा ही एक केस कनाडा से समीर पांडे का भी है। उन्हें लगता है कि शहीद सैनिकों में उनकी छठी पीढ़ी के दादा प्रकाश पांडे हो सकते हैं। प्रकाश पांडे ने लाहौर की मियां मीर छावनी में विद्रोह शुरू किया
कनाडा से दावा करने वाले समीर पांडे का अंदाजा है कि उनके परदादा प्रकाश पांडे का कंकाल भी इन शहीदों में शामिल हो सकता है। प्रकाश पांडे ने ही लाहौर की मियां मीर छावनी में अंग्रेज अधिकारी स्पेंसर को तलवार से मारकर विद्रोह शुरू किया था। फिर इन्हीं भारतीय सैनिकों को रावी नदी के पास से गिरफ्तार कर अंग्रेजों ने अजनाला के कुएं में दफना दिया था। प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे के मुताबिक, ‘प्रकाश पांडे का पता हम समीर से मिले DNA की जांच से कर सकते हैं। समीर ने बताया है कि उनका परिवार यूपी के रायबरेली से है। वहां से 4 सिपाही थे, जो 26वीं बटालियन में थे। 1857 के बाद ये सैनिक गायब हुए तो परिवार के खिलाफ वारंट निकला और चारों परिवार चेन्नई के पास में संथूर गांव चले गए। हम लोग इस गांव में जाकर भी जांच करने की योजना बना रहे हैं।’ ‘दादा को अंग्रेजों ने मारा, फिर हमें भागने के लिए मजबूर किया’
दैनिक भास्कर ने कनाडा में मौजूद समीर पांडे से भी बात की। समीर वहां जॉब करते हैं, लेकिन अगले एक साल में रिटायर होने के बाद इंडिया लौटने वाले हैं। समीर पांडे बताते हैं, ‘हमें खबरों के जरिए पता चला था कि अजनाला में 1857 क्रांति के सिपाहियों के कंकाल मिले हैं। इसी खबर में ज्ञानेश्वर चौबे का नाम था और मैंने उन्हें ईमेल से संपर्क किया। मेरे पूर्वज भी इसी बटालियन में थे। हमारे परिवार के सैनिक थे, जिन्हें 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी।’ ‘अंग्रेजों ने हमारे परिवार के लोगों को काफी परेशान किया था। मेरे दादा से पहले वाली पीढ़ी इससे परेशान होकर साउथ इंडिया शिफ्ट हो गई। मेरे दादाजी का जन्म भी चेन्नई के पास हुआ था। मेरे कई रिश्तेदार चेन्नई और आसपास रह रहे हैं। ब्रिटिश सरकार 26वीं बटालियन के सभी सिपाहियों के नाम की लिस्ट दे दे, तो नाम और घर की जानकारी मिल सकती है।’ समीर पांडे के अलावा दैनिक भास्कर ने संथूर गांव में रहने वाले उदय कुमार से फोन पर बात की। उन्होंने बताया कि हमारी पीढ़ी यूपी के कन्नौज की रहने वाली थी। 1857 में अंग्रेजों ने वारंट निकाला तो संथूर आ गए। तब से हमारी अगली पीढ़ियां यहीं रह रही हैं।’ ‘दो साल पहले से हम लोग अजनाला कुएं में मिले कंकाल की जांच करने वाली टीम के संपर्क में हैं। अभी हमारा DNA सैंपल नहीं लिया गया है। हम चाहते हैं कि 1857 क्रांति में जो सिपाही थे, उन सभी की पहचान हो। उन सभी परिवारों के साथ इंसाफ हो। उन शहीदों की पहचान हो और उन्हें सम्मान मिल सके। कम से कम उनका अंतिम संस्कार तो ठीक से किया जाए।’
………………………………….. स्टोरी का पहला पार्ट यहां पढ़िए
अंग्रेजों ने कुएं में जिंदा दफनाया, हत्यारे अफसर के नाम पर अमृतसर में सड़क पंजाब के अजनाला में गुरुद्वारा सिंह सभा के कैंपस में एक कुआं है। इसे ‘शहीदों का कुआं या ‘कलियांवाला खोह’ कहा जाता है। यहीं एक लोहे का बक्सा है। इस बक्से में इंसानों की हड्डियां भरकर रखी गई हैं। ये हड्डियां 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने वाले 282 सैनिकों की हैं। इन सैनिकों को इस कुएं में जिंदा दफना दिया गया था। इनकी आज तक पहचान नहीं हो सकी। वहीं मारने वाले अफसर कूपर के नाम पर अमृतसर में आज भी सड़क है। पढ़िए पूरी खबर…
यूपी, बिहार, बंगाल से हैं अजनाला के 282 शहीद:DNA और दांतों से खुलासा, तमिलनाडु-कनाडा से परिवार सामने आए; सरकारें क्यों सोई हैं
📅 Published: January 26, 2026 |
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