संडे जज्बात-17 का हूं, टीबी ने मेरा पूरा परिवार छीना:आखिरी सहारा भाई भी मरा, सगे-संबंधी डरकर दूर हुए- एक अजनबी ने गोद लेकर जिंदगी दी

📅 Published: January 18, 2026 | 📂 Category: Uncategorized

मेरा नाम दीपक रावत है। 17 साल का हूं। मैं उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के खनौली गांव का रहने वाला हूं। मैंने कुछ दिन पहले ही अपने बड़े भाई की चिता को आग दी। उस आग में सिर्फ उसका शरीर नहीं जला- मेरा आखिरी सहारा भी राख हो गया। मैं वहां खड़े-खड़े न रो पा रहा था, न चीख पा रहा था। मेरे अंदर जैसे कुछ बचा ही नहीं था। इससे पहले मैंने अपनी मां को खोया था। उससे पहले पिता को। फिर चाचा और अब भाई को। एक-एक करके टीबी ने मेरे पूरे परिवार को निगल लिया। मेरे सगे-संबंधी मुझे छूने से डरने लगे। उन्हें डर था के उन्हें भी टीबी हो जाएगी। इस धरती पर अब मेरा कोई सगा नहीं बचा है। हालांकि, भगवान ने एक-एक करके सब कुछ छीन लिया, लेकिन अंत में एक रिश्ता दे दिया…एक अजनबी विभोर जोशी के रूप में, जिन्हें अब मामा कहता हूं। उन्होंने मुझे गोद लिया है। उनके साथ कभी लगता ही नहीं के वो गैर हैं। दरअसल, हम एक छोटे से पत्थर के बने घर में रहते थे- मैं, मेरे पापा, मां, बड़ा भाई और चाचा। पापा खेती करते थे। उसी खेती से हमारे परिवार की जिंदगी चलती थी। लेकिन उस जिंदगी में सुकून कम, खौफ ज्यादा था। मुझे पापा की शक्ल याद नहीं है। जब उनकी मौत हुई, तब मैं बहुत छोटा था। मेरी मां बताती थीं कि पापा खेत से शराब पीकर घर आते थे। नशे में वह उनको अक्सर पीटते थे। मां एतराज करतीं, तो वह उन्हें पीटकर घर से बाहर निकाल देते। फिर वह रात दूसरे के घर गुजारती थीं। मेरे पास अपने पापा की बस इतनी ही याद है। इसके बाद टीबी ने हमारे घर में दस्तक दी। एक-एक करके सबको निगलती गई। पहले पापा को, फिर मां को, उसके बाद चाचा और आखिर में मेरे बड़े भाई को। मां बताती थीं कि पापा को टीबी हो गई थी। शुरू में सिर्फ खांसी थी। फिर खांसी के साथ खून आने लगा। गांव में कोई अस्पताल नहीं था, कोई डॉक्टर नहीं था। एक दिन अचानक पापा की हालत बहुत बिगड़ गई। खून की उल्टियां होने लगीं। मां घबरा गईं। अस्पताल लेकर भागीं, लेकिन अस्पताल पहुंचते-पहुंचते बहुत देर हो चुकी थी। वहीं पापा की मौत हो गई। आज से करीब 15 साल पहले। उस वक्त मैं मुश्किल से दो साल का था। मुझे अपने पापा की शक्ल तक याद नहीं। मेरे लिए अब मां ही पूरी दुनिया थीं। पापा के जाने के बाद घर की जिम्मेदारी चाचा ने संभाली। खेती-बाड़ी वही देखने लगे। मां पहले की तरह घर चलाती रहीं। लेकिन उस घर में टीबी की बीमारी फिर से लौटने वाली थी। 2017 की बात है। मां को खांसी रहने लगी। शुरू में किसी ने ध्यान नहीं दिया। पहाड़ में खांसी आम बात है, लेकिन तीन-चार महीने बीत गए और खांसी रुकने का नाम नहीं ले रही थी। मां दिन-ब-दिन कमजोर होती जा रही थीं। एक दिन वह हम दोनों भाइयों को बिना बताए अकेले ही शहर के डॉक्टर को दिखाने चली गईं। वहां डॉक्टर ने बताया- टीबी है। मां घर लौटीं, लेकिन उन्होंने हमसे कुछ नहीं बताया। वह बीमारी छिपाकर जीती रहीं। हमारे लिए खाना बनातीं, कपड़े धोती, घर संभालतीं। अस्पताल मीलों दूर था। दवाइयां कभी समय पर मिलतीं, कभी नहीं। मां कभी दवा खाती, कभी छोड़ देतीं। फिर एक दिन सब बिखर गया। मां की हालत अचानक बहुत खराब हो गई। हम उन्हें अस्पताल लेकर भागे। डॉक्टरों ने भर्ती कर लिया। उधर, मां का इलाज चलता रहा और हम कड़ाके की सर्दी में दोनों भाई अस्पताल की कैंटीन के बाहर भूखे बैठे रहते। एक दिन एक विभोर जोशी नाम के अजनबी हमसे मिलने आए। अब उन्हें मामा कहते हैं। दरअसल, कैंटीन का मालिक उनका दोस्त था। उसने ही मामा को बताया कि यहां यह दो बच्चे आए हैं और इनकी मां बीमार है। इन बच्चों के पास पैसे नहीं हैं। ये बिना खाए-पिए कैंटीन के बाहर पड़े रहते हैं। उस दिन मामा पहली बार मेरी मां से मिले। मां बिस्तर पर पड़ी थीं। चेहरा पीला पड़ चुका था। सांस भारी थी। मामा ने देखा और उनका मन पसीज गया। बाहर निकलकर उन्होंने कैंटीन वाले से कहा- इन दोनों बच्चों को रोज खाना देना और मां के लिए रोज दो उबले अंडे। पैसे की चिंता मत करना। उसी दिन से हमारी भूख का इंतजाम हो गया। महीनों बीत चुके थे। हमारा स्कूल छूट गया था। अस्पताल ही हमारा घर बन गया था। एक दिन मां ने मुझसे चाय लाने को कहा। मैं भागकर चाय लेकर आया। चाय का घूंट लेते ही उनको खून की उल्टियां होने लगीं। वह बिस्तर पर तड़पने लगीं। उन्होंने हमें पास बुलाया। आवाज बहुत धीमी थी। कहा- विभोर मामा को बुला लो। मामा आए। मां ने उनकी तरफ देखा और कहा- मेरा एक भाई है, लेकिन वह अब मुझसे मतलब नहीं रखता। आज से आप ही मेरे भाई हैं। अगर मुझे कुछ हो जाए, तो मेरे बच्चों को अकेला मत छोड़ना। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैं डॉक्टर को बुलाने भागा। डॉक्टर ने कहा- आ रहा हूं, लेकिन वह देर से आए। बहुत देर से। जब डॉक्टर कमरे में पहुंचे, तो हमें बाहर कर दिया गया। डॉक्टर ने कुछ दवाएं और इंजेक्शन दिया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। उसके तीसरे दिन ही मां की मौत हो गई। हमें समझ ही नहीं आ रहा था कि अब क्या करें। अस्पताल में मां का शरीर पड़ा था और बाहर हम दो बच्चे खड़े थे- बिल्कुल खाली हाथ। उसी वक्त जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर से आए गुरुद्वारे के कुछ लोग सामने आए। उन्होंने बिना कुछ पूछे मां के अंतिम संस्कार का पूरा खर्च उठाया। मामा ने उस दिन मेरे बड़े भाई के हाथों मां को मुखाग्नि दिलवाई। मां की चिता जल रही थी। आग की लपटें उठ रही थीं। तब मैं सिर्फ 9 साल का था। उसी चिता के पास मैं कंचे खेल रहा था। मुझे यह तक नहीं पता था कि मेरी मां अब कभी वापस नहीं आएगी। मुझे भूख लगी थी। मैंने मामा का हाथ खींचा और कहा- मुझे खाना चाहिए। मामा मुझे खाना खिलाने ले गए। अंतिम संस्कार के बाद मामा हमें अपने घर ले गए। उस दिन मामा के घर रातभर नींद नहीं आई। रात में बार-बार बिस्तर से उठकर बैठ जाता और मां को याद करके रोने लगता। मामा ने अपने ही घर मां की तेरहवीं की। लोगों को खाना खिलाया गया- पूरे रीति-रिवाज के साथ। मामा के घर में पहली बार मुझे अपनापन महसूस हुआ। मामा की पत्नी यानी मामी बैंक में नौकरी करती हैं, लेकिन घर में वह मां जैसी थीं। वह भी हमारा ख्याल करती हैं। नानी गरम-गरम खाना खिलाती और कहती थीं- अब से मैं तुम्हारी नानी हूं, डरने की कोई बात नहीं। धीरे-धीरे मुझे समझ आया- भगवान ने मुझसे एक घर छीन लिया था, लेकिन एक दूसरा घर दे दिया था। मामा के घर मैं कुछ दिन रहा। वह घर, जहां किसी ने पहली बार हमें बोझ नहीं, इंसान समझा। कुछ दिन बाद मामा हम दोनों भाइयों को लेकर मेरे गांव पहुंचे। शायद यह देखने कि अब हम वहां रह सकते हैं या नहीं, लेकिन गांव ने जवाब देने में देर नहीं की। उसी दिन पता चला कि मेरे चाचा को भी टीबी है। यह खबर फैलते ही गांव वालों का व्यवहार बदल गया। गांव के कुछ लोग मामा के लिए चाय बनाकर लाए, लेकिन हमें चाय नहीं दी गई। हम दोनों एक कोने में खड़े रहे। लोगों को डर था- ‘अगर हम उनके बर्तन में चाय पिएंगे, तो उन्हें भी टीबी हो जाएगी।’ उस वक्त मामा ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस हमें देखा। और शायद उसी पल तय कर लिया कि यह गांव अब इन बच्चों का नहीं है। मामा उसी दिन वापस हमें अपने घर ले आए। उन्हें हमारी सिर्फ भूख या बीमारी की नहीं, हमारी पढ़ाई की भी चिंता थी। कुछ दिन हमें अपने पास रखा, हमें संभाला, फिर उन्होंने एक फैसला लिया- ताकि हम रोजमर्रा की जिंदगी में लौट सकें, मामा ने हम दोनों को एक हॉस्टल में रख स्कूल में दाखिला करवा दिया। ऐसी जगह, जहां हमारे साथ काफी बच्चे थे। हम हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करने लगे। जिंदगी जैसे एक नई पटरी पर दौड़ने लगी थी। इन सबके बीच विभोर मामा कभी हमें भूलते नहीं। फोन करके हाल-चाल पूछते हैं, मिलने आ जाते हैं। फिर एक दिन हॉस्टल में मेरे गांव से खबर आई। बताया गया कि मेरे चाचा की भी टीबी से मौत हो गई है। उस खबर ने मुझे अंदर से झकझोर दिया, लेकिन तब तक मैं यह भी नहीं जानता था कि टीबी की बीमारी क्या होती है। हॉस्टल में मुझे नहीं पता था कि मेरी जन्मतिथि क्या है। मामा को पता चला तो उन्होंने सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाए, कागजात ढूंढे, रजिस्टर खंगाले। कई दिनों की भागदौड़ के बाद एक दिन मामा आए और मुस्कुराते हुए बताया- ‘आज से तुम्हारा भी जन्मदिन होगा।’ उस दिन पहली बार मुझे पता चला कि मेरी जिंदगी की भी एक तारीख है। पिता, मां और फिर चाचा के जाने के बाद हॉस्टल में अब मेरा सहारा मेरा भाई ही था। वह मेरे कपड़े धोता, मेरे लिए खाना बनाता और मेरी पढ़ाई का ख्याल रखता। मां मेरे लिए जो करती थीं, वह सब अब मेरा भाई कर रहा था- बिना थके, बिना शिकायत किए। वह मुझसे बहुत प्यार करता था, लेकिन सख्ती भी रखता था। मैं जब कोई गलत काम करता, तो वह मुझे टोकता। मुझे याद है, मैं अक्सर गुस्से में कॉपी के कागज फाड़ देता था। वह यह देखकर भड़क उठता। डांटते हुए कहता- ‘उसी कॉपी में तो तू लिखेगा-पढ़ेगा। अगर कॉपी ही नहीं रहेगी, तो पढ़ेगा कैसे?’ कभी-कभी वह मुझे मार भी देता था। तब मुझे लगता था कि वह मुझसे नाराज है। आज समझ आता है- वह मुझे बचा रहा था। मुझे दूसरों पर पत्थर फेंकने की आदत थी। इस पर भी वह मुझे डांटता, रोकता, कभी हाथ उठा देता। वह चाहता था कि मैं वही न बनूं, जो हालात मुझे बना रहे थे। मेरी बदनसीबी यह थी कि जिस बीमारी ने मेरे मां-पापा और चाचा को छीना, वही बीमारी मेरे भाई के शरीर में भी पल रही थी- और मुझे इसकी भनक तक नहीं थी। एक दिन हॉस्टल की ओर से हमें घुमाने के लिए ले जाया गया। मेरा भाई भी मेरे साथ था। हम दोनों ने साथ-साथ कचौड़ियां खाईं। रात में हॉस्टल लौटकर हमने दाल-चावल खाया और सोने की तैयारी कर रहे थे। तभी अचानक मेरा भाई बेचैन होने लगा। अगले ही पल उसे तेज उल्टियां होने लगीं। शोर सुनकर एक टीचर भागती हुई पहुंचीं। वह तुरंत उसे लेकर अस्पताल भागीं। जाते वक्त उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखते हुए कहा- ‘डरो मत, भाई ठीक होकर जल्दी आ जाएगा। तुम यहीं हॉस्टल में रहो।’ भाई अस्पताल में भर्ती था। उस रात हॉस्टल का कमरा मुझे पहले से कहीं ज्यादा सूना लग रहा था। मैं पहली बार भाई के बिना सोने जा रहा था। डर लग रहा था। टीचर ने मेरी हालत देखी और उस दिन मुझे अपने साथ सुला लिया। उस रात मैं सोया तो था, लेकिन पहली बार अपने भाई के बिना। अगली सुबह डॉक्टरों ने कहा- सब ठीक है। उस दिन भाई अस्पताल से लौट आया। मुझे लगा- सब टल गया। कुछ दिन बीते। एक रात हम खाना खाने जा रहे थे। थाली उठाने ही वाले थे कि भाई अचानक झुक गया। फिर उल्टियां होने लगीं। वही डर, वही घबराहट। इस बार उसे श्रीकोट के अस्पताल ले जाया गया। मुझे भरोसा था- पिछली बार की तरह वह फिर लौट आएगा, लेकिन अगली सुबह हॉस्टल के कमरे में एक अजीब सी हलचल थी। मेरे भाई के कपड़े उठाए जा रहे थे। अलमारी खाली की जा रही थी। मैंने घबराकर टीचर से पूछा- ‘ऐसा क्यों कर रहे हैं?’ उन्होंने मुझे सीने से लगा लिया। देर तक कुछ नहीं बोलीं। फिर कहा- ‘तुम्हारे भाई की मौत हो गई है।’ मैं सुन्न सा हो गया। मां के जाने के बाद वही मेरा सब कुछ था। अब वह भी चला गया था। उस पल मुझे लगा- अब इस दुनिया में मेरा कोई नहीं। मैं रोते हुए अस्पताल पहुंचा। मेरा भाई सामने एक सफेद चादर में बंधा हुआ था। वही भाई, जो मुझे जगाता था, मेरा होमवर्क देखता था, रात में मेरे साथ सोता था। अब वह कुछ नहीं बोल रहा था। उस पल मुझे समझ आ गया- अब मेरे आगे-पीछे कोई नहीं बचा। मामा के साथ भाई का अंतिम संस्कार कर मैं वापस हॉस्टल लौट आया, लेकिन उस रात नींद मुझसे बहुत दूर थी। सच तो यह है कि कई रातों से मैं सोया ही नहीं था। मुझे मां की एक बात बार-बार याद आ रही थी। मरने से एक दिन पहले मां ने भाई के हाथ में मेरा हाथ दिया था और कहा था- छोटे का ख्याल रखना। उसे कभी अकेला मत छोड़ना। भाई उस वादे को निभा रहा था, लेकिन अब वह भी चला गया था। मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं अपने भाई की चिता को आग दूंगा। जब मामा को पता चला कि मैं हॉस्टल में रात भर जागता रहता हूं, तो वे एक दिन चुपचाप आए। मेरा हाथ पकड़ा और कहा- अब तुम अकेले नहीं रहोगे। और मुझे अपने घर लेकर चले आए। उस दिन के बाद से मामा ने मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ा। वे मुझे हर जगह अपने साथ रखते हैं। अपने साथ बैठाकर खाना खिलाते हैं। मेरे सोने से लेकर जागने तक की हर चिंता करते हैं। वे मुझे जीना सिखा रहे हैं। उनसे मेरा कोई खून का रिश्ता नहीं है। फिर भी अब वही मेरी मां, मेरे पिता और मेरे भाई हैं। भगवान ने मुझसे बहुत कुछ छीन लिया, लेकिन एक रिश्ता ऐसा दिया, जिसने कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं अकेला हूं। (दीपक रावत ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर नीरज झा से साझा किए हैं) ————————————————— 1- संडे जज्बात- किन्नर हूं, लड़के ने मेरी मांग भर दी:पिता ने बाजार में पीटा, बाल काट डाले, लेकिन लड़का पीछे नहीं हटा- मुझे दुल्हन बनाया मेरा नाम सोनी है। पश्चिम बंगाल के बनगांव की रहने वाली हूं। मैंने खुद को हमेशा एक लड़की ही माना, लेकिन लोगों ने मुझे पहचान दी- किन्नर, हिजड़ा जैसे शब्दों से। लोग कहते थे, ‘न मां बन पाएगी, न किसी की दुल्हन… फिर इसके जीने का क्या मतलब?’- पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-दोस्त की प्रेमिका प्रेग्नेंट हुई, रेप केस मुझपर चला:पंचायत ने 6 लाख में सौदा किया- 5 साल जेल रहा, अब बाइज्जत बरी बिहार के दरभंगा जिले का रहने वाला मैं मुकेश कुशवाहा। मुझ पर 17 साल की लड़की के रेप और पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा चला। वो लड़की मेरे दोस्त की प्रेमिका थी। दोस्त ने उसे प्रेग्नेंट किया था, लेकिन मुकदमा मुझ पर चला। पूरी खबर यहां पढ़ें

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